एक महान क्रांतिकारी को सारी दुनिया तक पहुचाने वाला फोटोग्राफर – अल्बर्टो कोर्डा

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विवेक/

महान क्रांतिकारी चे गुवेरा की इस तस्वीर से कौन वाकिफ नहीं होगा. गाहे बगाहे लोग इस तस्वीर को आंदोलनों में, दीवार पर और अब सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपने प्रोफाइल तस्वीर की तरह इस्तेमाल कर अपने खून में गर्मी महसूस कर लेते हैं. लेकिन कभी आपने सोचा है कि इस तस्वीर के पीछे की कहानी क्या है?

दिन था 5 मार्च, 1960 जब क्यूबा के हवाना में एक शोक सभा और विरोध प्रदर्शन हो रहा था. यह शोकसभा उन 130 लोगों के लिए थी जो एक दिन पहले एक हमले में मारे गये थे. इस सभा का नेतृत्व कर रहे थे विश्व प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो और उनके साथ थे उनके जिगरी दोस्त और क्यूबा की क्रांति के महानायक चे गुवेरा.

रेवोलुशन नाम की एक पत्रिका के लिए काम कर रहे फोटोग्राफर अल्बर्टो कोर्डा उस वक़्त फिदेल कास्त्रो की फोटो खींच रहे थे और तभी अचानक पीछे खड़े चे गुवेरा पर उनकी नजर गई जो ज्या पॉल सार्त और सिमोन दी बुवा जैसे मशहूर लोगों से घिरे हुए थे. चे गुवेरा की आँखों में उस वक़्त ऐसी प्रबल तीव्रता थी और चेहरे पर ऐसी दृढ़ता कि कोर्डा एक पल के लिए ठिठक गये. लेकिन अगले ही पल उन्होंने उस लम्हे का एक वर्टीकल और एक होरिजोंटल शॉट ले लिया.

ये तस्वीर पहले से प्लान नहीं की गई थी बल्कि ये तो एक क्रांतिकारी के प्रभावशाली व्यक्तित्व की ओर एक कुशल फोटोग्राफर की प्रतिक्रिया थी. कोर्डा ने इस तस्वीर को नाम दिया ‘गुरिलेरो हीरोइको’ यानि एक हीरो गुरिल्ला फाइटर, मगर उस वक़्त उन्हें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था की उन्होंने इतिहास में अपनी जगह बना ली हैं.

अल्बर्टो कोर्डा का जन्म हवाना में हुआ था.उनके पिता एक रेलवे कर्मचारी थे और उन्हीं के कोडेक कैमरे से कोर्डा ने जब अपनी गर्ल-फ्रेंड की तस्वीरे खीची तो फोटोग्राफी में उनकी रूचि जगी और अपनी मेहनत से वो एक सफल फैशन फोटोग्राफर बन गये. उन्हें खुबसूरत औरते और महँगी कारें बहुत पसंद थी, उनके पास एक बढ़िया स्टूडियो भी था लेकिन एक दिन उन्हें क्यूबा की क्रांति से प्यार हो गया और उन्होंने सबकुछ छोड़कर क्रांति के लिए काम करने का निर्णय लिया.

कोर्डा कहते हैं – “क्यूबा की क्रांति ने मेरा जीवन बदल लिया.एक दिन मैंने एक छोटी बच्ची की तस्वीर ली जिसने गुडिया की जगह एक लकड़ी का टुकड़ा कस कर पकड़ा हुआ था. ठीक उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ की अपनी जिंदगी उस क्रांति को समर्पित करना है जो इन असमानताओं को खत्म करना चाहती है.”

कोर्डा ने अगले एक दशक तक फिदेल कास्त्रो के साथी फोटोग्राफर की तरह काम किया और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बहुत सारी नायाब तस्वीरें खीचीं.

खैर अब आते हैं चे गुवेरा की तस्वीर पर. उस वक़्त मैगजीन ने उस तस्वीर को छापने से मना कर दिया क्योंकि  पूरा ध्यान फिदेल कास्त्रो पर था लेकिन कोर्डा को ये तस्वीर बहुत पसंद थी. उन्होंने प्रिंट निकाल कर इस तस्वीर को अपने स्टूडियो में टांग दिया.

इसके सात साल बाद इटालियन प्रकाशक फेल्तेर्नेली ने इस तस्वीर को देखा और कोर्डा से इसकी कॉपी मांगी क्योकि स्टूडियो में टंगे हुए तस्वीर खराब हो चली थी. कोर्डा ने दो तस्वीरे दी और एक भी पैसा नहीं लिया क्योकि उनके अनुसार ये क्रांति का काम था. इसके कुछ दिनों बाद चे गुवेरा को अमेरिकन एजेंसी सीआईए ने बोलीविया में बंदी बनाकर मार दिया.जब इटली में इस फोटो की कॉपियां  बनी और बांटी गयीं तो रातों-रात ये तस्वीर और मशहूर हो गयी.

ऐसा माना जाता है की ये तस्वीर यूरोप में ज्या पॉल सार्त के द्वारा आई और जब आयरिश आर्टिस्ट जिम फित्ज़पैट्रिक ने इसी तस्वीर से एक कलात्मक पोस्टर बनाया तो ये तस्वीर हर विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बन गयी और दुनिया भर के क्रांतिकारियों के लिए ये साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के खिलाफ ये पोस्टर एक बहुत बड़ा हथियार बनी. लेकिन आज ये तस्वीर शायद दुनिया भर के पूंजीवादियो के पैसा कमाने का बहुत बड़ा जरिया है जिसे हर चीज पर बेचने के लिए छापा गया. ये बात कोर्डा को कभी पसंद नहीं आई और एक बार तो वोडका कंपनी स्मिर्नोफ ने जब इस तस्वीर का इस्तेमाल किया तो कोर्डा ने नाराज़ होकर मुकदमा कर दिया और हर्जाने के तौर पर मिले पचास हजार डॉलर को क्यूबा हेल्थकेयर के लिए दान कर दिया. ये कहते हुए कि, “अगर चे जिन्दा होते तो वो भी यही करते.” इस तस्वीर का वाजिब श्रेय कभी कोर्डा को नहीं दिया गया और उन्होंने कभी कोई रोयल्टी भी नहीं मांगी. उनके लिए क्रांति का संदेश लोगो तक पहुचाना अधिक जरुरी था.

अल्बर्टो कोर्डा की मृत्यु 2001 में हुई. जिस लाइका कैमरे से उन्होंने चे की तस्वीर खीची थी वो नीलामी में करीब 14 लाख रूपये में बिका.

आज इस तस्वीर को इस्तेमाल करने वाले अधिकतर लोग अल्बर्टो कोर्डा को नहीं जानते, बहुत से चे गुवारा की कहानी से परिचित नहीं और बहुतों ने तो उसका नाम भी नहीं सुना होगा. लेकिन फिर भी कोर्डा और चे गुवेरा का ये मिलन हमेशा प्रतीक बना रहेगा हर उस लम्हे का जब भी किसी युवा ने दुनिया में असमानता, अत्याचार, दुःख देखा तो पूरी व्यवस्था पर कठिन सवाल खड़े किये. अपने आदर्शो के लिए पूरा जीवन क्रांति को समर्पित कर दिया. हर क्रांतिकारी के हाथ में बन्दूक हो ये जरुरी नहीं, कुछ के हाथ में कलम हो सकती है तो किसी के हाथ में काफी है सिर्फ एक कैमरा.

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स में कार्यरत है और नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन पर कार्य कर रहे हैं. आप सामजिक मुद्दों से गहरे जुड़े हैं.)

3 COMMENTS

  1. …अच्छा लेख है भाई…वाकई बोहोत सारे युवाओं को प्रेरित भी करेगा। ना सिर्फ फिदेल कास्त्रो या चे ग्वेरा जैसे क्रांतिकारी व्यक्तियों से मगर अल्बर्टो जैसे फोटोग्राफर से भी प्रेरणा मिलेगी…

  2. बहुत ही उत्तम लेख है , कॉमरेड चे को तो काफी पढ़ा था, पगोटोग्राफर अल्बर्टो को भी जानने का1 मौका मिल गया। और पूंजीपति वर्ग द्वारा चे का नाम मुनाफे के लिए इस्तेमाल करना सच में चिंतनीय है।

  3. That was awesome!!! Great info. Last sentence was epic… Har krantikari ke hath me bandook ho ye zaruri nhi, kuch ke hath me qalam ho sakti hai to kisi ke hath me sirf ek camera.

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