सरदार सरोवर परियोजना- हर जोर जुल्म की टक्कर में….

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उमंग कुमार/

सरदार सरोवर परियोजना ने देश को बहुत कुछ दिया है. सबसे लम्बे समय में पूरी होने वाली इस परियोजना ने सबसे ऊँचे बाँध के साथ-साथ देश को शायद सबसे लम्बा चलने वाला अहिंसात्मक आन्दोलन भी दिया है.

कुछ मामूली  अहिंसात्मक हथियारों से लैश मध्य प्रदेश से उपजे इस आन्दोलन न केवल महाराष्ट्र, गुजरात बल्कि विश्व भर के लोगों को अपने साथ जोड़ा. इनके हथियारों पर गौर फरमाईये, ‘विकास चाहिए विनाश नहीं,’ ‘राजनीति धोखा है:धक्का मारो मौका है, हम अपना अधिकार मांगते! नहीं किसी से भीख मांगते,’ ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है,’ ‘नर्मदा की घाटी में अब संघर्ष जारी है; चलो उठो, चलो उठो, रोकना विनाश है”, ‘हिंदी मराठी या गुजराती लड़ने वाले एक ही जाती (जाति).’

मध्यप्रदेश में जलसत्याग्रह कर रहे एक व्यक्ति का पैर

इन्ही सब के बूते इस आन्दोलन ने भारत में कितना प्रभाव डाला इसपर विवाद हो सकता है पर इसने विश्व के पटल पर अपनी पहचान ज़रूर बनाई. विश्वबैंक के निर्णय को प्रभावित किया जिसका असर अन्य देशों पर भी पड़ा.

शायद यही वजह थी कि आजादी के पहले इस परियोजना की अवधारणा बनी थी जवाहार लाल नेहरु ने शिलान्यास किया और अब जाकर नरेन्द्र मोदी इसको देश को समर्पित कर रहे हैं.

सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए नर्मदा का पानी के इस्तेमाल करने की अवधारणा आजादी के पहले ही वर्ष 1946 में बन गई थी. इसका शिलान्यास देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने 5 अप्रैल 1961 में किया. अस्सी के दशक में जब तीन हजार छोटे-छोटे और 135 मंझोले और 30 बड़े बाँध और कनाल के बनाने का सिलसिला शुरू हुआ तो तीन राज्यों–मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात– के लोग लामबंद होना शुरू हुए ताकि वे 1312 किलोमीटर लम्बी नदी की इस परियोजना की अतार्किकता का विरोध कर सकें.

अस्सी के दशक में शुरू हुआ यह आन्दोलन भाषा, सीमा के सारे बंधन तोड़ते हुए विश्व समुदाय को तो यह समझाने में सफल हुआ कि इस परियोजना में तमाम खामियां है पर भारत सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ जो ठहरा.

दो बड़े बाँध जिसमें नर्मदा सागर और सरदार सरोवर बाँध शामिल है से हजारों गाँव डूबने वाले थे. वर्ष 1985 में विश्वबैंक ने कुल छः बिलियन डॉलर (तब के आकलन से) की इस परियोजना के लिए 450 मिलियन डॉलर जारी कर दिया. लेकिन नर्मदा बचाओं आन्दोलन का वैज्ञानिक विरोध ही था कि 1991 आते-आते विश्वबैंक को एक कमिटी बनानी पड़ी जिसका उद्देश्य इस पूरी परियोजना का अध्ययन करना था.  ब्रैडफोर्ड मोर्स के अगुवाई में जब कमिटी ने अध्ययन किया तो पाया कि इस परियोजना के प्लानिंग में बहुत सारे जरुरी पहलूओं को नज़रअंदाज किया गया है.

वर्ष 1992 में रिपोर्ट आई और विश्वबैंक ने अगले साल इस परियोजना से अपने हाथ खींच लिए. लेकिन भारत सरकार नहीं मानी. इस परियोजना से सबसे अधिक फायदा गुजरात को होना है सो यह राज्य बांड के जरिये इस रकम की व्यस्था में लग गया.

शनिवार को मध्य प्रदेश के छोटा बरदा में जलसत्याग्रह स्थल की तस्वीर

‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ और कुछ देशों में ऐसे ही परियोजना को देखते हुए एक ‘वर्ल्ड कमीशन ओन डैम्स’ की वर्ष 1998 में स्थापना हुई, जिसमे मेधा पाटकर को सदस्य बनाया गया. विश्वबैंक और एशियाई डेवलपमेंट बैंक इस कमीशन का खर्चा उठाने वाले थे. इसमें लगभग सारे विकसित देश शामिल थे. इस कमीशन का उद्देश्य था बड़े-बड़े बांधों का अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर अध्ययन करना.  इसकी आखिरी रिपोर्ट वर्ष 2000 में आई जिसका नाम था ‘डैम एंड डेवलपमेंट: अ न्यू फ्रेमवर्क फॉर डिसिज़न’ सरकार ने इस रिपोर्ट के सुझाव को नहीं माना और बड़े बाँध का बनना जारी रहा. एक तरफ सरकार बाँध बनवा रही थी और गाँव के गाँव डूबने के खतरे में आते जा रहे थे दूसरी तरफ यह आन्दोलन ज़मीन पर तो चलता ही रहा, साथ ही सरकार को न्यायलय में भी घेरता रहा. बड़ी हस्तियाँ जैसे अरुंधती राय, आमिर खान इसके समर्थन में आये वहीं ‘तथाकथित विकास’ के लिए लालायित मीडिया इन सबकी अनदेखी करता रहा.

लोगों के पुनर्वास को लेकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन अभी भी ज़मीन पर सक्रिय है. रविवार को जब प्रधानमंत्री इस परियोजना को देश को समर्पित कर रहे थे तो उधर मेधा पाटकर अपने साथियों के साथ जल सत्याग्रह कर रही थी. हाल ही में उनके प्रदर्शन से घबराई राज्य सरकार ने उनको जेल में डाल दिया था. उनकी मांग बस इतनी थी कि जो लोग विस्थापित हुए है उनका भारत के न्यायलय के आदेशानुसार पुनर्वास हो.

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