चुनाव अभियान के लिए बड़े परदे का ऐसा इस्तेमाल इससे पहले किसी ने नहीं किया होगा

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उमंग कुमार/

सरहद पर तनाव है क्या?

कुछ पता करो चुनाव है क्या!

राहत इन्दौरी की ये पंक्तियाँ एक इशारा हैं इस और कि भारत के अरबों लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनितिक दल चुनाव जीतने के लिए किस तरह के मुद्दों का सहारा लेते हैं. लेकिन वर्तमान में सत्तारूढ़ दल तो इससे भी दो कदम आगे निकल गया है. यहाँ युद्ध भी परदे पर किया जा रहा है और लोगों को अपने बहादुरी के किस्से भी सुनाये जा रहे हैं. भारत के चुनावी इतिहास में बड़े परदे का ऐसा इस्तेमाल नहीं हुआ है जैसा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कर रही है.

चुनाव जीतने के लिए तमाम अन्य तीन-तिकड़म के साथ-साथ इस दल बड़े परदे को भी अपने कैंपेन का हिस्सा बना लिया है. इसके माध्यम से जनता को बताया जा रहा है कि पुरानी सरकार बेकार थी  और यह सरकार बड़े काम की है. लोकसभा चुनाव सर पर है और दनादन ऐसी फ़िल्में रिलीज़ हो रहीं हैं.

इस श्रंखला में हालिया रिलीज़ तीन फिल्मों को देखें. इसमें ‘दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, ‘उरी’ और रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित ‘मणिकर्णिका’ शामिल हैं. अब चौथी फिल्म भी कतार में है जो रिलीज़ तो बाद में होगी लेकिन चुनाव के मद्देनज़र इसका इस्तेमाल होने लगा है. इस फिल्म में विवेक ओबरॉय नरेन्द्र मोदी की भूमिका में हैं. इसके पोस्टर का विमोचन भाजपा के नेता और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने किया.

वैसे कहने वाले कहेंगे कि फिल्मों को सत्तारूढ़ दल के प्रोपगंडा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए पर इन चारों फिल्मों में अगर ‘मणिकर्णिका’ को छोड़ दिया जाए तो यह महज़ संयोग नहीं है कि बाकी के तीनों फिल्मों में भाजपा के नेता सीधे तौर पर शामिल हैं. ‘दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में जहां अनुपम खेर (इनकी पत्नी किरन खेर भाजपा सांसद हैं) पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के किरदार में हैं और इस फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे हैं जिनके पिता रत्नाकर गुट्टे भाजपा से जुड़ी राष्ट्रीय समाज पक्ष के नेता हैं. यह निर्देशक पहले ही 34 करोड़ रुपये के फ्रॉड में जेल तक जा चुके हैं. दूसरी तरफ ‘उरी’ फिल्म में भाजपा से जुड़े एक और अभिनेता परेश रावल, जो  कि फिलहाल भाजपा  सांसद हैं ने अभिनय किया है. वे फिल्म में प्रधानमंत्री के करीबी अजीत डोभाल की भूमिका में नज़र आये. मोदी पर बन रही फिल्म का तो विमोचन ही भाजपा के बड़े नेता फडनवीस ने किया.

अगर गौर से इन फिल्मों को देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि ये फ़िल्में वही कहना चाह रहीं हैं जो वर्तमान में भाजपा के नैरेटिव को सूट करेगा.

सिनेमा के माध्यम से प्रचार और दुष्प्रचार

पहली फिल्म ‘दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दस साल के कार्यकाल का मजाक उड़ाया गया है. इसमें दुनिया के गिने-चुने अर्थशास्त्रियों में शामिल मनमोहन सिंह को एक मजबूत राजीतिक घराने की कठपुतली बनाकर दिखाया गया है. सिंह के चाल-ढाल और उनके साथ के अधिकारियों को बेबस और लाचार दिखाया गया है. यही स्थिति राहुल गाँधी के चरित्र के साथ भी है. जिस पत्रकार की किताब पर यह फिल्म आधारित है उनका नाम है, संजय बारू. उनकी भूमिका अक्षय खन्ना ने की है. वे फिल्म में हमेशा दीनहीन प्रधानमंत्री पर तंज कसने वाली मुस्कान के साथ हैं. हाल ही में, द वायर वेबसाइट के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को साक्षात्कार देते हुए संजय बारू ने कहा कि इस फिल्म में जो कुछ भी दिखाया गया है, सबकुछ उनकी पुस्तक में नहीं है. इसके बावजूद भी किरदारों के नाम असली हैं. अगर चुनावी माहौल में कांग्रेस के पास बड़प्पन दिखाने की मजबूरी नहीं रहती तो इस फिल्म से जुड़े लोगों पर सीधे मानहानि का दावा किया जा सकता था.

इसके ठीक उलट ‘उरी: दी सर्जिकल स्ट्राइक’ नाम की फिल्म में पूरी गंभीरता बरती गई है. यह फिल्म युद्ध पर आधारित है पर यह सिर्फ बॉर्डर और सिपाहियों तक ही सीमित नहीं रहती. इसमें प्रधानमंत्री और उनके सुरक्षा सलाहकार को वृहत्तर तौर पर जगह दी गई है. इसमें प्रधानमंत्री को गंभीर, साहसी, काफी ज़िम्मेदार और बड़े निर्णय लेने वाला दिखाया गया है. एकदम मनमोहन सिंह के ‘दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में दिखाए गए चरित्र से उलट. फिल्म में जहां मोदी की भूमिका रजित कपूर कर रहे हैं, वहीँ  परेश रावल उनके  सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की भूमिका में हैं

सनद रहे कि उरी के सर्जिकल स्ट्राइक घटना के बाद इससे सम्बंधित पोस्टर उत्तर प्रदेश में कई जगह लगाए गए थे जिसमें लिखा गया था ‘हम तुम्हे मारेंगे और जरुर मारेंगे’. साल 2017 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत पायी थी.  ट्रेलर में  डोभाल बने परेश रावल कुछ ऐसे संवाद बोलते देखे गए कि आम आदमी देश प्रेम से ओत-प्रोत हो जाए जैसे ‘यही मौका है उनके दिल में डर बैठाने का,’ या ‘यह वह भारत नहीं है जो चुप बैठ जाएगा’ इत्यादि.

तो इन दोनों फिल्मों को अगर साथ में देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि भाजपा का जो चुनावी मसाला होगा वह सब इनमें मौजूद है. इससे भी आगे बढें तो पता चलेगा कि सारे बड़े मुद्दों पर फेल हुई भाजपा के लिए राष्ट्रप्रेम ही आखिरी हथियार है. पाकिस्तान से लड़ सकते नहीं क्योंकि अव्वल तो इसका आर्थिक नुकसान बहुत है और दूसरी तरफ पड़ोसी मुल्क का वर्तमान शासक अमेरिका से पिटने और चीन के व्यापार-साथी होने की वजह से भारत से दोस्ती चाहता है. ऐसे में देश प्रेम का राग अलापने के लिए फिल्म लाई गई है ‘मणिकर्णिका’. यह फिल्म बात बेबात राष्ट्रभक्ति का झंडा उठाती है. खासकर तब जब इस फिल्म से एक गंभीर विषय के साथ न्याय करने की अपेक्षा थी. इसमें उन अंग्रेजों को जिन्होंने पूरी दुनिया को गुलाम बना लिया था उन्हें कमजोर दिखाया गया है.

चौथी फिल्म जो नरेन्द्र मोदी के जीवन पर आधारित है उसका तो उद्देश्य ही वही है जो खुद नरेन्द्र मोदी मीडिया में फीड करते रहे हैं. चाय बेचना, मगरमच्छ के दांत गिनना, जंगल में संन्यास के लिए जाना और देश की सेवा.

इस तरह आपको मोदी की तारीफ करनी पड़ेगी कि यह शख्स कब से चुनाव की तैयारी कर रहा था और इसकी प्लानिंग में क्या क्या शामिल था. लेकिन इसी के साथ इसका भी रोना रोया जाना चाहिए कि जिन कलाकारों और फ़िल्मी हस्तियों को समाज का पहरु समझा जा रहा था उन्होंने सत्तारूढ़ का पालतू बनना पसंद किया बजाय कि आपके प्यार की कीमत चुकाने के.

 

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