नक्सली बताकर पलामू में मारे गए 12 लोगों का सच धीरे धीरे सामने आ रहा है

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मिथिलेश प्रियदर्शी/

झारखंड के पलामू में ढाई साल पहले 12 लोगों को एक पुलिस मुठभेड़ में मरा हुआ दिखाया गया था. तब कई फैक्ट फाइंडिंग में इस मुठभेड़ के फर्जी होने की बात सामने आई थी. मामला खुल जाने पर जांच की कारवाई शुरू की गयी और अब जाकर उसकी परतें एक-एक कर खुल रही हैं.

हाल ही में उस ह्त्याकांड में अहम गवाह और वहां के तत्कालीन सदर थाना प्रभारी हरीश पाठक ने सीआइडी को दिए लिखित बयान में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किये हैं. उन्होंने बताया, मुझे पलामू के एसपी साहब कन्हैया मयूर पटेल ने बुलाया और कहा, ‘जल्दी से इंक्वेस्ट तैयार कर सभी शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दो. मामले का वादी भी तुम बन जाओ. तुम अपनी फायरिंग दिखा देना. मैंने कहा, ‘मुठभेड़ मैंने किया ही नहीं, तो वादी कैसे बन जाऊं? कल जब मामले की जांच होगी,  मेरे मोबाइल का लोकेशन सदर थाने पर दिखेगा. तब मैं फंस जाऊंगा. एसपी साहब बोले, ’15 दिन में केस का सुपरविजन हो जायेगा. फिर कोई दिक्कत नहीं होगी. जब मैंने इनकार किया, तो वे नाराज हो गये. बोले, तुमको सस्पेंड कर देंगे. और सचमुच मैं सस्पेंड कर दिया गया.  

कुछ जगहों पर खून के निशान थे लेकिन शव नहीं था. इससे लग रहा था कि शवों को कहीं और से किसी वाहन से लाकर यहाँ लिटाया गया हो.

हिंदी अखबार प्रभात खबर के समाचार के मुताबिक़ हरीश पाठक ने मुठभेड़ को लेकर कई सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा,  नक्सलियों से जब्त हथियारों को उन्हें मुठभेड़ में चला हुआ दिखाने के लिए औजारों से ठीक किया गया था. बैरल को अलग से साफ किया गाया. उनसे फायर किया गया. लाशों और मुठभेड़ की जगह को देखकर यह साफ़ लग रहा था, सब सजाया गया है. कुछ जगहों पर खून के निशान थे लेकिन शव नहीं था. इससे लग रहा था कि शवों को कहीं और से किसी वाहन से लाकर यहाँ लिटाया गया हो. सबके शरीर पर खून सूखे हुए थे. जबकि मुठभेड़ को तुरंत का बताया गया था. कई मृतक के शर्ट और शरीर में गोलियों से हुए छेद में कोई तालमेल नहीं था. उनके शर्ट के बटन सिलसिलेवार नहीं लगे थे, जैसे जबरदस्ती शर्ट पहनाया गया हो. एक मृतक के शरीर में गोली का निशान था. लेकिन जो वर्दी उसने पहन रखा था, उसमें कोई छेद नहीं था़. कुछ मृतकों के पास रखा हथियार प्लास्टिक के तार से बना था, जिसका वोल्ट खोलने से ट्रिगर, गार्ड और मैगजीन गिर जाता था. एक मृतक के पास रखे 30.06 रायफल में बोल्ट और मैगजीन नहीं था. एक अन्य .303 रायफल में भी मैगजीन नहीं था. यह कई बड़े सुराख थे, जिनसे इस मुठभेड़ के फर्जी होने का पता चलता है.

(बाकी मुठभेड़ की पुरी कहानी नीचे पढ़िए, जो एक फैक्ट फाइंडिंग टीम का हिस्सा बनकर मैंने लौटकर लिखी थी.)

हत्याओं की कहानियों का कोई शीर्षक नहीं होता

हत्याओं के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसका सम्पूर्ण सच अमूमन दो पक्षों को ही पता होता है. एक जिसकी हत्या होती है, दूसरा हत्यारा. हत्याएं जहाँ खत्म होती हैं, सवाल वहीं से शुरू होते हैं.

मरने वाले ने क्या किया कि उसे मरने की हद में आना पड़ा,मारने वाले का हासिल क्या रहा?  वह आखिरी बात जो मार दिए जाने के पहले मरने वाले ने कहना चाहा, वह आखिरी बात जिसे कह लेने के बाद हत्यारे ने अपना काम ख़त्म किया. ये तमाम बातें मर जाने वाला मर जाने की वजह से नहीं बता पता और हत्यारा अपने हित में इन्हें जमींदोज रखना चाहता है.

बाद में हम, आप इन हत्याओं की बाबत अनुमानों के पुल पर चढ़कर पानी में बस कंकड़ मार रहे होते हैं. पर कई मर्तबा हत्यारे या तो जल्दिबाजी में, अपने घोर आत्मविश्वास में या काहिली में कई गड़बड़ियाँ कर जाते हैं. इन्हीं गड़बड़ियों की उंगली पकड़कर उस सच के आसपास जाया जा सकता है, जिसे हत्यारे पूरी ताकत और शातिरपने से छुपाना चाह रहे होते हैं.

9 जून 2015 को बैठे-बिठाए देश के अखबारों-चैनलों को एक बड़ी खबर मिलनी थी. क्योंकि 8 जून की रात  पलामू के सतबरवा (बकोरिया) में 12 लोगों को कथित मुठभेड़ में मरना था. हमेशा की तरह मीडिया में एक ‘रे डीमेड’ वाक्य के साथ खबर चलनी थी- ‘और पुलिस को देखते ही नक्सलियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी. जवाबी कारवाई में ‘इतने’ नक्सली मारे गए.’ और 9 जून को ‘इतने’ की जगह पर ‘12’ भरा गया था.

पलामू के सतबरवा थाना के दायरे में आने वाली जगह भलुवाडीह में 12 लाशें पड़ी थीं. पुलिस ने एक एकमुश्त सबको नक्सली बताया था. पर घटना के तुरंत बाद कई ऐसी अहम बातें सामने आने लगीं, जिससे इस कथित मुठभेड़ की कहानी संदिग्ध होती चली गई. मुठभेड़ को लेकर गाँव-कस्बे के बीच से उठते सवालों ने जल्द ही बहुत सारी दूरियाँ तय कर लीं और दुनिया को इन हत्याओं की कहानी किसी ‘बी’ ग्रेड फिल्म सरीखी लगने लगी. मानवाधिकार सुरक्षा के लिए कार्यरत करीब एक दर्जन संगठनों के साझा मंच कोर्डिनेशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक राइट्स ओर्गनाइजेशन (सीडीआरओ) का हिस्सा होकर जब मैं सतबरवा मुठभेड़ की ‘फैक्ट फाइंडिंग’ के लिए इन इलाकों का दौरा शुरू किया, कई चौंकाने वाले तथ्य मिले.

21 जून की दोपहर हम पुलिस द्वारा बताई गई मुठभेड़ वाली जगह के ठीक बीचों-बीच खड़े थे. वहां, जहाँ 9 जून की सुबह मीडिया की फोटोग्राफी के लिए लाशें सजाकर रखी गईं थीं. लाशों को बेहद तरतीब तरीके से सजाकर पेश करने का मनोविज्ञान ठीक उसी तरह से काम करता है जैसे बरामद बंदूकों और कारतूसों के रचनात्मक प्रदर्शन के साथ. वह एक सपाट सा मैदान था. फुटबॉल सरीखे खेल के लिए बिल्कुल माकूल, जहाँ सिर्फ एक बुराई थी, कि अगर खेल के बीच बारिश शुरू हो जाए तो वहां माथे को गिला होने से बचाने के लिए मरगिल्ला, बीमार सा कोई एक पेड़ भी नहीं था. पुलिस के मुताबिक़ नेशनल हाइवे-75 से करीब 150 मीटर दूर इसी मैदान में उन्होंने नक्सलियों को गाड़ियों से जाते देखा और फिर आगे अख़बार का वह ‘धर्मग्रंथीय’ वाक्यजोड़कर पाठक खुद इसे पूरा कर लें कि ‘पुलिस को देखते ही नक्सलियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दी. जवाबी कारवाई में ‘इतने’ नक्सली मारे गए.’

यह सचमुच अजूबे वाली बात है कि धूल उडती उस नंगी सी जगह पर, जहाँ सिर छुपाने की कोई जगह न हो, कोई मुठभेड़ कैसे संभव है. आखिर अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद चाक-चौबंद रहने वाले नक्सली एक बड़ी सी गाड़ी लेकर उस खुले में क्या करने जाएंगे. जबकि वहीं, काली मुख्य सड़क की दिशा में मैदान के शुरुआत में ही एक एक स्टोन क्रशर प्लांट पत्थर तोड़ता रहता है. गाँव-कस्बे जैसी जगह में रात में प्लांट ‘अगोरने’ के लिए वहां जरुर कुछ लोग रहे होंगे. सड़क से महज 150 मीटर दूर इतनी असुरक्षित स्थितियों में नक्सली क्योंकर इकट्ठा होंगे, सोचने वाली बात है. तब और, जब वह रास्ता मैदान से आगे गुम होने लगता है, तब तो और, जब उनके पास विकल्प के रूप में घने जंगल मौजूद हों. यूं भी जंगल से अटे पड़े झारखंड-छत्तीसगढ़-उड़ीसा आदि के इलाकों में मैदान में हुए ऐसे किसी मुठभेड़ का कोई इतिहास नहीं मिलता है. तो खैर, किसी सस्ते डिटेक्टिव की तरह भी सोचा जाए तो बहुत संभव है, इन्हें वहां आराम से खड़े करके, आत्मसमर्पण की हालत में लाकर लाइन से मार दिया गया हो और यकीन कर लिए जा सकने लायक एक कहानी प्लांट कर दी गयी हो, या कहीं और मारा गया हो और यहाँ लाकर लाशें सजा दी गई हों.

जिस गाड़ी में 12 लोगों को गोली लगेगी, बारह लोग मरेंगे, वहां खून का तालाब बन जाएगा. गाडी खून से रंग जाएगी.

उदय यादव, जिसने करीब बत्तीस होलियाँ देखी थी, मृतकों की पुलिसिया सूची में अब महज एक नाम के तौर पर दर्ज है. वह एक पारा शिक्षक था. मनिका पुलिस थाने के करीब की ही एक गली में उसका घर है. दुनिया मानती है कि थाने के आसपास के घर सुरक्षित होते हैं. पर उदय को यह लाभ नहीं मिला.मनिका एक कस्बे की हैसियत के साथ अनमना पसरा पडा है. थोक में हुई मौतों ने इसके मिज़ाज़ के अनमनेपन को बढ़ा दिया है. डर और आशंका से सब शांत पड़े हैं. सूजी आँखें और पीले पड चुके चेहरे वाली उदय की पत्नी, हाहाकार में डूबी मां, और आंसू छिपाकर खुद को सम्भला हुआ दिखाने वाले पिता के बीच केवल उदय का छोटा भाई हृदयनाथ ही है, जो हमें कई सारी बातें लगातार बताए जा रहा है.

“जिस गाड़ी में 12 लोगों को गोली लगेगी, बारह लोग मरेंगे, वहां खून का तालाब बन जाएगा. गाडी खून से रंग जाएगी. लेकिन गाडी में तो बस नाममात्र का खून था. ये कैसे हुआ?”

“और पुलिस क्या उस रोज निशानेबाजी की प्रैक्टिस कर रही थी कि सबको गोली कमर के ऊपर ही लगी? किसी को छाती के आसपास लगी तो किसी को सिर के आसपास. उन्हें गोलियां ऐसी जगहों पर मारी गयी कि किसी के बचने की कोई गुंजाइश न हो. ये कैसा संयोग था? मुठभेड़ में आपाधापी में गोली कहीं भी लग सकती थी न?”

“पुलिस में से किसी को कुछ नहीं हुआ. आश्चर्य वाली बात नहीं है?’’

“यहाँ मेला में बन्दुक से बैलून फोड़ने वाला खेल जब एक चार साल का बच्चा खेलता है तो पांच गोली में एक बैलून वो भी फोड़ देता है. आम तोड़ने जाता है तो दस ढेला में एक-दो आम गिरा ही देता है. तोक्या माओवादिओं की गोलियां हवा मिठाई की बनी थी कि सारी की सारी हवा में बिला गई?’’ हृदयनाथ के सवाल का जवाब उसी के घर के पास का एक लड़का गुस्से में देता है. पर इस आगाह के साथ कि मेरा फोटो मत छाप दीजियेगा. मैंने उसे बताया कि पलामू के एसपी मयूर पटेल का कहना है कि कुछ को मामूली चोटें आयी हैं. वो बोला, “इतने बड़े मुठभेड़ में मामूली चोट का मतलब कुछ नहीं होता है. इसका मतलब उनके घुटने भी नहीं फूटे हैं. ये सब बस मीडिया को बताने वाली बात है.’’

“भाई को मार दिया, पर लाश पर भी उनका ही हक़ होगा? यह सब सोमवार की बात है, और इनलोगों ने गुरूवार को लाश दिया. इस भयानक गर्मी में जानबूझकर लाश को सड़ जाने दिया गया. पत्रकारों को फोटो तक बढ़िया से नहीं लेने दिया गया. पुलिस ही पत्रकारों को फोटो का एंगल भी बता रही थी, कि सीधे नहीं तिरछे से लो. इतने नजदीक से नहीं, दूर से लो. लाश को लेकर भी इतनी सावधानी क्यों बरत रहे थे ये लोग? क्या ये सब सवाल पूछने लायक नहीं हैं?’’ हृदयनाथ ने शायद ये बात कईयों से हुबहू कही हो, इसलिए वह एक ही सांस में यह सब कहे जा रहा था.

मृतकों के घर नहीं सिर्फ कब्रें होती हैं

पर हम उनके घर में बैठे हैं. यह कस्बाई घरों की तरह एक आम घर है, जिसकी छत ढाल कर तुरंत इसमें रहना शुरू कर दिया गया है, यह सोचकर कि प्लास्टर, फर्श आदि का काम बाद में होता रहेगा. घर के सारे सदस्य घर की दीवारों की तरह शांत पड़े हैं. मौत के बाद का घर ऐसा ही होता है. स्पन्दन्हीन. तीसरी कक्षा में पढने वाला उदय यादव का बेटा, 8 वीं में पढने वाली अपनी बहन के साथ लू-लहर में पतियाँ खो देने वाले किसी इकहरे पौधे की तरह चुपचाप खड़ा है. इन बारह दिनों में अब उसके सिर पर खूंटियों की शक्ल में थोड़े-थोड़े बाल आने शुरू हुए हैं.

“उदय एक शिक्षक था, उसे लोग क्यों मारेंगे?” मैंने पूछा.

इस बार उदय यादव के पिता जवाहर यादव कहते हैं, “नेवार जो हमलोगों का गाँव है, माओवादी पार्टी के लोग कहते थे, हमलोग गाँव में क्यों नहीं रहते. उनलोगों ने हमारे साथ मारपीट की थी, इसलिए हमलोग नेवार छोड़  यहाँ मनिका में रहने लगे थे, पर उदय का स्कुल छूट रहा था. बीओ वेतन रोक दिया था. उदय इसी मामले को सुलझाना चाहता था. शायद इसीलिए वह नक्सली लीडर अनुराग से मिलने गया होगा, और ये सब हो गया.”

“और नीरज? वह तो उदय का फुफेरा भाई था. उसके साथ क्या हुआ?”

“वह उस दिन हमारे घर आया था. रिश्तेदारी में आना-जाना लगा रहता है. हो सकता है, वह भी उदय के साथ उन लोगों से मिलने गया हो.” कहकर जवाहर यादव चुप हो जाते हैं.

बस उनके पास यही कहानी है.

हमलोग उन्हें ढाढ़स बंधाने के लिए कुछ भी झूठ नहीं कहते हैं और नमस्ते कहकर मातम वाली एक और जगह की ओर निकल पड़ते हैं.

हम दुसरे मृतकों के घर जाने वाले रास्ते पर हैं. मनिका कस्बे से काफी दूर गाँवों की ओर जाने वाले रास्ते मोरम से बने हैं. मुर्गे-मुर्गियां इन सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही के अभ्यस्त नहीं हैं, इसलिए चौंक कर शोर मचाते हुए इधर-उधर दौड़ रहे हैं. घास में मशगुल बकरियों के लिए इन सबका कोई मतलब नहीं है, पर कुत्तों को दिन में भी फर्क पड़ रहा है और वो लगातार भौंक रहे हैं.

“संयोग से उस रात वह उदय के पास गया हुआ था. ठीक उसी तरह जैसे आपस में फुफेरे-ममेरे भाई कभी-कभार एक-दुसरे के घर आते जाते रहते हैं. गेहूं के साथ घुन भी पीस गया.”

कुई. यह उदय यादव के फुफेरे भाई नीरज यादव का गाँव है. सूचि का एक और नाम. यहाँ लगभग लोग नीरज की बात निकलने से पहले ही उसके निर्दोष होने की कसमें खा रहे थे. नीरज के चाचा जनेश्वर बोले, “संयोग से उस रात वह उदय के पास गया हुआ था. ठीक उसी तरह जैसे आपस में फुफेरे-ममेरे भाई कभी-कभार एक-दुसरे के घर आते जाते रहते हैं. गेहूं के साथ घुन भी पीस गया.”

“इसमें गेंहूँ कौन था?” मैंने पूछा.

“डाक्टर अनुराग, नक्सली लीडर. ये नक्सलियों का इलाज भी करते थे. पर नीरज तो नक्सली नहीं था..बताइये?” इस बार सवाल उनका था.

हमलोग महुआ पेड़ के नीचे छाँव में अपने जूत्ते-चप्पलों पर बैठे थे.

“हाँ, नीरज यादव के खिलाफ किसी थाने में नक्सली होने का कोई रिकार्ड मौजूद नहीं है.” मैंने जोड़ा.

“बिना खता-कसूर के किसी को ऐसे मारा जाता है…बताइए?’’

यह एक आसान सा सवाल था, जिसका उत्तर उन्हें पता था, इसलिए हमलोगों ने उन्हें नहीं बताया.

कुछ स्थानीय साथियों ने उसी गाँव में हमलोगों के लिए भोजन बनवाया था. सखुआ पत्तलों पर गरम भात-दाल परोसा गया था. आगे के लम्बे रास्ते को देखते हुए हमने संग्रह करने की तरह खाया था. ‘कुई’ गाँव तक सबकुछ एक सुदूर इलाके के गाँव की तरह ही लगा था. खुला मैदान, खाली खेत, दो कमरों का एक प्राथमिक विद्यालय, ऊँचे चबूतरे पर फहराता हनुमान का झंडा आदि. यह गाँव कस्बे से भले ही दूर था, पर कस्बे से इसके जुड़ाव का पता साफ चल जाता था.

जिनके खाते की हत्याएं जुर्म नहीं होती

आगे हम बेतला के घने जंगलों की ओर जा रहे थे. कुछ मृतक इन्हीं जंगलों के बीच के रहवासी थे. धीरे-धीरे जंगल और उसकी हरियाली, उसका घेराव, सन्नाटा सबकुछ हमारे करीब आता जा रहा था. बारह मौतों के बाद इलाके में एक अजीब सी डरावनी खामोशी पसरी हुई थी. हमारी गाड़ियों के आगे-आगे इन इलाकों के दो जानकार साथी मोटरसाइकिल से रास्ता बताते हुए चल रहे थे. जिस मोरम बिछी सड़क का हम पीछा कर रहे थे, एक सूनी नदी के उस पार जाकर वह थोड़ी धुंधली होने लगी. बरसात के पानी ने मोरम को धोकर उसमें गड्ढे बना दिए थे. गाड़ियों की रफ़्तार धीमी हो गई थी. हम पैदल थे. गाड़ियाँ हमें उतारकर खाली ही इन कच्ची सड़कों को पार कर रही थी. शाम होने को थी. गाड़ियों के ड्रायवर क्लच-ब्रेक करते हुए इस बात से डरे हुए थे कि इस बियाबान में अगर क्लच-ब्रेक कुछ फूंका, तो रात यहीं बितानी पड़ेगी. वे मिनट-मिनट में अपनी टायरों, पट्रोल और इंजन की स्थिति याद कर रहे थे, सब ठीक तो है.

पुरी दुनिया में सड़कों को विकास का पर्याय बताया जाता है. पर इन जंगलों में सड़कों की उपस्थिति तनिक संदिग्ध थी. शहर-कस्बे से कई घंटे दूर जंगल के इन आदिवासियों के पास न तो उस मोरम सड़क पर चलने के लिए गाडी थी, न साइकिल. पैदल चलने के लिए यूँ भी वे पगडंडियों का इस्तेमाल किया करते. बहुत संभव है, इसे पुलिस ने अपनी सुविधा के लिए बिछाया था, ताकि वे आसानी से इन इलाकों तक अपनी पहुँच बना सकें. टूटी-फूटी जंगल की ये कच्ची सड़कें अगर गवाही की स्थिति में होतीं तो बताती, उसका किसने और किन वजहों से इस्तेमाल किया है.

आगे जहाँ हम रुके 20-25 घरों वाला एक गाँव था, कुडुमखेता. मरने वाला बुधराम उरांव साबर पहाड़ के नीचे बसे इसी गाँव का था.

“तो कैसे पता चला कि बुधराम उरांव मर गया?’’ हमने बुध्रराम उरांव, जिसकी उम्र 32-35 बरस के आसपास थी, के भाई बीरबल उरांव से पूछा.

“ऊपर घाट के मुखिया ने बताया.’’

“लाश देखने शहर नहीं गए?’’

“नहीं?”

“क्यों?’’

“सबको झूठ का फंसा दिया तो?’’

“उसकी पत्नी कहाँ है?’’

“वो शादी नहीं किया था.” बीरबल बोला.

“बुधराम माओवादी पार्टी में कैसे शामिल हो गया?’’

“पहले बरवाडीह में कोयला तोड़ने जाता था. कुछ समय पहले इस बार महुआ चुनने आया तो कोयला तोड़ने वापस नहीं गया, पार्टी में चला गया.” बीरबल बोला.

उसने एक टूटे-फूटे घर की ओर इशारा किया, जिसके चारों ओर पेड़ की पतली टहनियों से बना बाड़ा लगा हुआ था. हमलोग जिस पेड़ के नीचे खड़े थे, वह पूरी तरह पककर काले हो चुके जामुनों से लदा था. वहीं खड़े एक नंग-धडंग चार साल के बच्चे से मैंने पूछा, “खाए हो?” “हां.” उसने सकुचाते हुए कहा. “क्या खाए?’’ “जामुन.” “कल क्या खाए थे?’’ “जामुन.” “और परसों?’’ “जामुन.”

आप एक महीना बाद जाएंगे और उससे यही सवाल करेंगे तो अबकी उसका जवाब होगा, पका कटहल. मौसम बदलेगा, उसका जवाब बदलेगा, कभी बेर, कभी केंदु, कभी आम. उसके यहाँ शायद रोटियों का मौसम कभी नहीं आता.

यह एक अलग दुनिया थी, जहाँ सरकार और आधुनिक सुख-सुविधा एक हैंडपंप के रूप में खड़े थे.

यह एक अलग दुनिया थी, जहाँ सरकार और आधुनिक सुख-सुविधा एक हैंडपंप के रूप में खड़े थे. सरकार की बनाई दुनिया और इनकी दुनिया में हैंडपंप को छोड़कर कुछ भी ‘कॉमन’ नहीं था. ये डोरी चुनते हैं, मुर्गियां-बकरियां पालते हैं, टांड़ में मकई उगाते हैं. केंदु पत्ता तोड़ते हैं. घंटों पैदल चलकर कस्बे में मुर्गियां, बकरियां, डोरी, मकई, महुआ, जामुन, कटहल आदि बेचकर नमक, तेल, कपड़े खरीदते हैं. बहुत सीधा सा अर्थशास्त्र है इनका. तो ऐसे में मुझे लगता है, हमें यहाँ थोड़ा ठहरकर विकास के इस प्रतीक, हैंडपंप के लिए सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए. और उससे थोड़ी बातचीत भी.

“तो सरकार महोदय, किसी रोज बिदककर इस दुनिया के लोग अगर कहें, हमें आपसे कोई मतलब नहीं है. कृपया इधर की ओर रुख न करें. यह हमारी दुनिया है. चूँकि हम आपकी दुनिया में दखल नहीं देते, हमें बख्श दें. तो?’’

तो शायद वह आदिवासी समुदाय जिसने कभी हवाई जहाज नहीं देखा है, अपने जंगल के ऊपर पहली और आखिरी बार हवाई जहाज देखेगा और उससे गिरे आग के गोलों से मारा जाएगा. भारत की सरकार आदिवासियों के इस प्रस्ताव पर पता नहीं क्या रुख अपनाए, पर ऐसे प्रस्तावों के बाद देश-दुनिया के इतिहास के पन्ने मूलनिवासियों का कम से कम यही अंजाम हुआ बताते हैं.

हम कुडुमखेता, बीरबल, बुधराम के विकलांग बड़े भाई और उस बच्चे को उसके हाल पर छोड़ आगे बढ़ गए थे. शाम लगभग करीब थी. बीच-बीच में पेड़ों-झुरमुटों से घिरे दस-पंद्रह घरों वाले गाँव दिख जाते थे. हमारी गाड़ियां जब उन गाँवों से तेज़ी से निकलती, किनारे खड़े बच्चे ख़ुशी से चिल्लाने लगते. अगर वो संख्याओं से परिचित होते तो गाड़ियाँ गिनने का खेल खेलते. हमलोग कुल पांच गाड़ियों में थे. गाड़ियों के ये काफिले गाँव वालों के लिए लम्बे समय तक उनकी रोजमर्रा की बातों में शामिल होने वाली थीं. वे ऐसी घटनाओं को उस समय को बताने के लिए कैलेण्डर की तरह इस्तेमाल करते हैं. जैसे वे कह सकते हैं, ‘ये घाव का निशान उस समय का है, जब कई गाड़ियाँ एक साथ इधर से गयी थीं.’ हमारी गाड़ियाँ अपने पीछे धूल-धुआं-शोर के साथ कई शंकाएं और अफवाह छोडती जा रही थीं. शायद उनके लिए सादे कपड़ों में हम पुलिस वाले थे, या शायद जेजेएमपी के लोग, या हो सकता है वे हमें एमसीसी वाले समझ रहे हों.

इलाके में लोगों का साफ़ पर दबी जुबान में मानना है, जेजेएमपी इन इलाकों में पुलिस की शह पर काम करने वाला एक हथियारबंद दस्ता है. इसमें वो लोग हैं जो या तो कभी एमसीसी में थे और अनुशासनहीनता या पैसों में गड़बड़ी करने की वजह से दंड के डर से पार्टी से भाग खड़े हुए या स्वतन्त्र रूप से लेवी की राशि उगाहने की महत्वाकांक्षा इनको हथियार सहित इस नए लुटेरे गिरोह में ले आयी. विभिन्न जिलों में काम कर रहे पत्रकारों के मुताबिक पुरे झारखंड में इस तरह के कई गुंडे गिरोह सक्रीय हैं, जिन्हें अघोषित रूप से पुलिस का संरक्षण हासिल है. टीपीसी, जेजेएमपी, जेएलटी, पीएलएफआइ, पहाड़ी चित्ता इन सबके अलग-अलग क्षेत्र  हैं. वे बताते हैं, माओवादियों के सफाए का पुलिस ने ये परखा हुआ तरीका अपनाया है. पुलिस की रणनीति ये है कि एक बार ये दस्ते इलाके से माओवादियों को साफ़ कर दें, फिर इनसे बाद में अलग-अलग जब चाहे निपट लिया जा सकता है.

झारखंड के बड़े मीडिया संस्थानों का रवैया और भी अजीबोगरीब है. कहीं किसी भी लूटपाट, आगजनी या हत्या की घटना होने पर ये बगैर यह पता किये कि इसमें किस दस्ते का हाथ है, सीधे इसे नक्सली वारदात बता देते हैं.

झारखंड में आए दिन माओवादियों और इन गिरोहों के बीच खूनी संघर्ष होता रहता है. ऐसा लगता है मानों, पुलिस इनकी ओर से आँखें बंद किये हुए हो. इन गिरोहों के नेताओं-सदस्यों की गिरफ्तारी न के बराबर होती है. इनसे पुलिस की मुठभेड़ की खबरें भी शायद ही सुनी गई हों. झारखंड के बड़े मीडिया संस्थानों का रवैया और भी अजीबोगरीब है. कहीं किसी भी लूटपाट, आगजनी या हत्या की घटना होने पर ये बगैर यह पता किये कि इसमें किस दस्ते का हाथ है, सीधे इसे नक्सली वारदात बता देते हैं. स्थानीय मीडिया से निकली यह खबर बाद में पुरे देश-दुनिया के लिए नक्सली वारदात बन जाती है.

झारखंड के कई जिले बेहद संवेदनशील हैं. यहाँ कोई बंद के नाम पर ढंग से कोई खांस भी देता है तो दुकानों के शटर गिर जाते हैं, बसों-ट्रकों के पहिये थम जाते हैं. 12, 13, 14 जून को तीन दिन झारखंड बंद रहा था. बंदी के दायरे से बाहर सिर्फ दूध गाड़ी, मरीज गाड़ी और बारात गाड़ी थे. एक मीडिया संस्थान को माओवादी प्रवक्ता गोपाल के नाम से बंद सम्बंधित फोन आया था और इसके बाद झारखंड बंद हो गया था. 14 जून को माओवादी प्रवक्ता गोपाल ने सार्वजनिक बयान जारी कर इस बात का खंडन किया कि यह बंद माओवादियों की ओर से बुलायी गयी थी. तब सवाल है, माओवादियों के नाम पर बंद की साजिश किसकी थी. इससे किसको फायदा होने वाला था. झारखंड में सतह के भीतर-बाहर ऐसे कई खेल लगातार चलते रहते हैं.

जंगलों में वेधशालाओं के निर्धारित समयों के मुताबिक अँधेरा नहीं घिरता, पहले घिर आता है. ऊँचे पेड़ों के कारण रौशनी कम हो गयी थी. आगे काफी अन्दर जाकर अमवाटिकर गाँव था, जहाँ गाड़ियाँ नहीं जा सकती थीं. उस गाँव तक जाने के लिए पेड़ों के बीच से गई पगडंडियां के पीछे-पीछे ही पहुंचा जा सकता था. मारे गए 12 लोगों में सबसे कम उम्र का बच्चा इसी गाँव का था. नाम चरकू तिर्की, पिता विजय तिर्की, वय 12 साल. तय हुआ, मोटरसाइकिल वाले दोनों स्थानीय साथी जाएं और चरकू के घर के किसी सदस्य को साथ ले आएं. काफी देर बाद जब वे लौटे, उनके साथ चरकू का भाई अमित तिर्की था. उसने बताया, वह मजदूरी के लिए  रांची गया हुआ था. संयोग से वह लौट ही रहा था कि उसने किसी से सुना, पलामू में 12 माओवादी मारे गए. वह घर पहुंचा तो पता चला 12 में एक उसका भाई भी था.डाक्टर अनुराग घटना के एक दिन पहले ही चरकू को लेने आया था. मां बोली थी, अभी 24 को एक शादी है. चरकू को उसमें रहना है. डाक्टर बोला, 24 अभी बहुत दूर है. तब तक चरकू आ जाएगा. पर चरकू का अब तक लाश भी नहीं आया. मां डालटेनगंज गयी थी, लेकिन उसको लाश भी देखने को नहीं मिला. सबने भगा दिया.

जहाँ खड़े हम सब बात कर रहे थे, यह वही जगह थी, जहाँ कुछ साल पहले पुलिस और माओवादियों के बीच एक भीषण मुठभेड़ हुई थी, जिसे कटिया का मुठभेड़ कहा गया था. उस समय के केन बम के कुछ टुकड़े हमारे पैरों के आसपास अब भी पड़े थे.

“तो अमित यह सब कैसे हुआ, कुछ पता है?’’ उसने इंकार में सर हिला दिया.

सभी सच्चाइयाँ मृतकों के पास सुरक्षित हैं

हमने उससे विदा ली और आगे की ओर चल पड़े. चौतरफा अँधेरा पसर गया था. गाड़ियों को हेडलाईट जलानी पड़ गई थी. एक सबसे बड़ी बात जो अब मुझे स्वीकार लेनी चाहिए. हम सब भीतर से डरे हुए थे. यह डर अँधेरे के पहले से मौजूद था, पर अब रात में ज्यादा बढ़ आया था. सम्भावित मुसीबत जेजेएमपी की ओर से आ सकती थी. फरवरी महीने में ही जेजेएमपी वालों ने झारखंड में मानवाधिकार के मोर्चे पर काम करने वाले संगठन जेसीडीआर के एक सदस्य शशिभूषण को घेर लिया था. वे बताते हैं, उस रोज उन्होंने लगभग अपनी हत्या होते देख ली थी. पर वे बच गए. इन इलाकों में हत्याओं के बाद माहौल गर्माया हुआ था. पुलिस इस मुठभेड़ के फर्जी करार दिए जाने से सुलगी हुई थी. जनपक्षीय पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से पुलिस की चीढ़ यूं भी जगजाहिर है. 12 मौतों का जिम्मा जेजेएमपी पर आया हुआ था, जिसकी कहानी आगे खुलेगी. ऐसे में बहुत संभावना थी, इस किस्म की खोजबीन से खार खाए जेजेएमपी वाले हमला कर दें. बावजूद हम चाह रहे थे, कुछ और लोगों से मिल लिया जाए.

हमारी गाड़ियाँ पौन घंटे तक भागती रहने के बाद सीआरपीएफके एक कैम्प के पास पहुंची. यह बेतला नेशनल पार्क में घुसने का एक तरह का चेकपोस्ट था, जिसपर लिखा था, कृपया रुकिए, सुरक्षा कारणों से नाका स्वयं खोले और बंद करें, धन्यवाद. एकाएक पांच गाड़ियों को कैम्प के पास रुकता देख भीतर के लोग सजग हो गए थे. कैम्प असल में किसी किले सरीखा था. लोहे के घुमावदार कंटीले बाड़ों से घिरा हुआ. अन्दर से पूछा जा रहा था, हम कौन हैं और कहाँ जा रहे हैं. हमलोगों ने जब कई बार अपना परिचय दिया, तब स्थिति सामान्य हुई. कैम्प के दाएं और बाएँ दो सड़कें जाती थीं. उनलोगों ने बताया हमें बायीं ओर की सड़क लेनी चाहिए, क्योंकि दायीं ओर हाथियों का खतरा है.

हमारी गाड़ी में बैठे एक आदिवासी साथी ने बताया, दिन में सीआरपीएफ कोबरा बटालियन के ये जवान इस चेकपोस्ट पर जंगल में प्रवेश करने वाले और उधर से लौटने वाले शख्स को रोककर उसकी पूरी छानबीन करते हैं. वे किसी भी आदिवासी से जो कस्बे से कुछ ला रहा है, पूछेंगे, “क्या है?’’ अगर वह चावल, आलू, टमाटर आदि लिए हुए है, वो कहेंगे, कितना किलो है, वह कहेगा, पांच किलो, वे कहेंगे, इतना किसलिए ले जा रहे हो, माओवादिओं के लिए? वह कहेगा, नहीं..खुद खाने के लिए, वे धमकाएंगे, आइंदा दो किलो से ज्यादा कुछ नहीं ले जाना है, वह धमक जाएगा और कुछ नहीं कहेगा.

सारी कहानियाँ सुनकर जो निष्कर्ष सामने आ रहे थे,उसमें सबसे ‘कॉमन’ था कि यह मुठभेड़ नहीं एक सामूहिक हत्याकांड था. यह पुलिस द्वारा नहीं जेजेएमपी द्वारा अंजाम दिया गया था.

दुसरे साथी के पास भी दो महीने पहले घटा एक वाकया था. उन्होंने कहा, “उनके मामा भी सीआरपीएफ कोबरा बटालियन में हैं. हम जब भी मिलते हैं, हमारे झगड़े होते हैं. एक रोज मैंने उनसे कहा, आप आदिवासियों को डराने और उनपर मनोवैज्ञानिक बढ़त लेने के लिए कोबरा, ग्रीन हंट टाइप के जो खूंख्वार और आक्रामक नाम रखते हैं, आपलोगों को पता भी है, वो लोग इनका मतलब नहीं समझते. मैंने एक आदिवासी बुजुर्ग सेपूछा था, कोबरा माने? उन्हें लगा था, मैं किसी फल या जड़ी-बूटी का नाम गलत उच्चार रहा हूँ जो मुझे चाहिए. जब मैंने उन्हें पूरी बात बताई और कहा कि पुलिस ने अपना ये नाम आपलोगों को डराने के लिए रखा है तो वो हँसे और बोले, उनको बोलना इससे बढ़िया अपना नाम मलेरिया रख लें, हम डर जाएँगे.

रात आठ बजे के आसपास हम हरातु गाँव में थे. यह मृतक महेंद्र खरवार का गाँव था. महेंद्र महज 15 साल का था. उस रोज अनुराग हरातु गाँव भी आया था. महेंद्र एक-दो दिन बाद बाहर मजदूरी के लिए जाने वाला था. उसने महेंद्र से कहा, चलो एक जगह से होकर आते हैं. और महेंद्र चल पड़ा. दुसरे दिन सुबह वह अख़बार और टीवी की तस्वीरों में गोलियां खाए पड़ा था. महेंद्र नक्सली नहीं था, यह बात गाँव के लोग हँड़िया के चरम नशे में भी कह सकते हैं और पवित्र सरहुल की पूजा करते हुए भी. हाँ, पुलिस एसएलआरों के सामने भी वे यही बात कहें, मैं इसका दावा नहीं कर सकता. हालांकि वह पुलिस रिकार्ड में भी कहीं नक्सली के रूप में नहीं दर्ज था. मैं फिर सोचता हूँ, कुछ मिनट पहले महेंद्र ने क्या सोचा होगा, जब सेकेण्ड के सौंवे हिस्से के दौरान गोलियां हवा में उसकी ओर लहराई होंगी, उस वक्त उसने मारने वालों से क्या कहा होगा, क्या ये कि उसे जाने दिया जाए, वो पार्टी का आदमी नहीं है, वह तो कमाने बाहर जा रहा था.

अब तक इस कथित मुठभेड़ की कई कहानियाँ सामने आ चुकी थीं. उदय यादव के पिता जवाहर यादव की कहानी अलग थी. उदय का भाई हृदयनाथ अलग सवाल उठा रहा था. हरातु में कुछ और बातें पता चली थीं. कुछ स्थानीय पत्रकारों के सूत्रों ने अलग खबर दी थी. माओवादियों के दावे अलग थे, पुलिस के अलग.

सारी कहानियाँ सुनकर जो निष्कर्ष सामने आ रहे थे,उसमें सबसे ‘कॉमन’ था कि यह मुठभेड़ नहीं एक सामूहिक हत्याकांड था. यह पुलिस द्वारा नहीं जेजेएमपी द्वारा अंजाम दिया गया था. और एक अहम बात यह कि मरनेवालों का परिवार हमसे सारी बातें तो कर रहा था, पर एक अदृश्य दवाब में वह घटना की कहानी बताने से बच रहा था.

तो आखिर में अटकलों, अनुमानों, झूठ, दावों आदि के बीच 12 मौतों के रेशों को उघाड़ने में तुरुप का पत्ता साबित हुआ वह माओवादी लड़का, जो उस रात उन बारहों के साथ था, पर धोखे की भनक लगते ही बचकर भागने में सफल हो गया, जिसका जिक्रउस समय के किसी अख़बार-चैनल में नहीं आया.

माओवादी पार्टी के मुताबिक़ डाक्टर आरके उर्फ़ अनुराग पर पार्टी के भीतर कुछ आतंरिक अनुशासनहीनता के आरोप लगे थे. उस पर पैसों में हेराफेरी का भी आरोप था. इस कारण वह जेजेएमपी में शामिल होना चाहता था. पार्टी के अनुसार उदय यादव जेजीमपी का दलाल था. डाक्टर आरके उर्फ़ अनुराग इसी के संपर्क में था. उदय यादव ही अनुराग को जेजेएमपी से मिलाने वाला था. अनुराग के पास उस वक्त माओवादी पार्टी के लेवी का पैसा था, जिसको लेकर अलग-अलग दावे हैं, यह रकम शायद 12 लाख थी या शायद 28 लाख. अनुराग जेजेएमपी वालों से मिलने के पहले इन पैसों को अपने बेटे को सौंप देना चाहता था. इसलिए उसने अपने बेटे संतोष यादव (25 वर्ष) और भतीजे योगेश यादव (25) को गाड़ी लेकर बुलाया था.अनुराग के पास पैसे होने की बात उदय यादव और पप्पू लोहरा दोनों जान गए थे. अनुराग जो अमवाटिकर, कटिया वाले इलाके में था, जेजेएमपी के लीडर पप्पू लोहरा को वहीं बुला रहा था. पर पप्पू लोहरा उसको भालुआडीह बुला रहा था. इस बीच अनुराग ने बुधराम उरांव, चरकू तिर्की, महेंद्र खरवार आदि लोगों को यह कहकर बुला लिया था कि एक जगह चलना है. इन सारे लोगों को यह कतई पता नहीं था कि अनुराग पप्पू लोहरा से हाथ मिलाने जा रहा है. मिलने की जगह को लेकर चल रही अनुराग और पप्पू लोहरा के बीच की खींचतान इस बात पर ख़त्म हुई कि अनुराग भलुआडीह ही आये, पप्पू लोहरा गाड़ी भेज देगा. सब के सब दो गाड़ियों में भलुवाडीह पहुंचे.      जिसमें एक जेजेएमपी की गाड़ी थी, और दूसरी अनुराग कि जिसको ड्रायवर मो. एजाज अहमद चला रहा था. वहां पहुंचकर अनुराग और पप्पू लोहरा ने एक दुसरे से हाथ मिलाया और लाल सलाम कहा. उसके बाद पप्पू लोहरा ने अनुराग के पैसे अपने कब्जे में लिए और सबको गोली मार दी. अपने लिए काम करने वाले उदय और उसके साथ आये उसके भाई नीरज यादव को भी मार दिया. ताकि कोई सबूत नहीं रहे. फिर पप्पू लोहरा ने इसकी जानकारी पुलिस को देदी. अब यह कहानी आगे पत्रकारों की कहानी से जाकर मिल जाती है, कि 1 बजे के आसपास सतबरवा पुलिस ने पत्रकारों को बुलाया और बताया कि एमसीसी के साथ एक मुठभेड़ हुई है, जिसमें 12 माओवादी मारे गए हैं.

एक सुनियोजित हत्याकांड की बात सामने आ गई है, हमने पुलिस अधिकारियों से इस बाबत जानना चाहा पर उनके पास हमें कहने के लिए एक ही बात थी, ‘हम किसी भी जाँच के लिए तैयार हैं.’

स्थानीय पत्रकारों की भी कहानी लगभग इसी के आसपास है. घटनाएं, समय और जगह को लेकर कुछ फेरबदल जरुर है. जैसे कि अनुराग ने कुई गाँव में कुछ लोगों को कहा था कि वे खाना बनाकर रखें, वह जल्दी ही लौटेगा. जेजेएमपी की गाड़ी उसे कुई गाँव ही लेने आयी थी. बहरहाल, कुल जमाबात ये कि स्थानीय पत्रकार और लोग इस बात पर एकमत हैं कि यह पुलिस के साथ मुठभेड़ का मामला नहीं था.

तो जब एक सुनियोजित हत्याकांड की बात सामने आ गई है, हमने पुलिस अधिकारियों से इस बाबत जानना चाहा पर उनके पास हमें कहने के लिए एक ही बात थी, ‘हम किसी भी जाँच के लिए तैयार हैं.’

इतनी कहानियाँ जानने के बाद मैं फिर से अपनी ऊपर की लाइन दुहराऊंगा, किसी भी हत्या का सम्पूर्ण सच अमूमन दो पक्षों को ही पता होता है. एक जिसकी हत्या होती है, दूसरा हत्यारा.

हत्यारा जो भी हो, पर इस मामले में सुराख़ ही सुराख़ है. चूँकि तथ्यों से यह जाहिर होता है कि यह मुठभेड़ नहीं था, आराम से की गयी हत्याएं थीं. तो अगर इसे पुलिस ने अंजाम दिया, कहना होगा, यह घोर अमानवीय था. जब वो आत्मसमर्पण की स्थिति में थे, उन्हें पकड़कर अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिए था. सात लोगों का कोई पुलिस रिकार्ड नहीं था, उनमें तीन नाबालिग थे, कोई इनकी हत्या का बचाव कैसे कर सकता है? अगर इसे जेजेएमपी ने अंजाम दिया, तो क्या इसकी खबर पुलिस को थी? पप्पू लोहरा और पुलिस के बीच हुई बातचीत की डिटेल्स से इसका जवाब आसानी से मिल जाएगा.

पर क्या मौजूदा न्याय व्यवस्था में इस किस्म के ‘इफ-बट का कोई मतलब है?

(मिथिलेश प्रियदर्शी कहानीकार हैं और सामाजिक विषय खासकर कमजोर तबके के पक्ष को लेकर काफी सचेत हैं. अभी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से जुड़कर शोधकार्य में लगे हुए है.)

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