खुला बाज़ार प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत पर टिका है पर प्रतिस्पर्धा में नैतिकता क्षीण हो जाए तो?  

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जितेन्द्र राजाराम/

भारत में चीनी उत्पादों का विरोध हमेशा से ही राष्ट्रवादी विचार का प्रतीक रहा हैं। हालाँकि जिस तरह से चीनी व्यापार भारतीय बाज़ार में हावी है, भारतीय नागरिकों का ख़ास तौर से मध्य-वर्गीय राष्ट्र प्रेमियों का दैनिक जीवन भी इन उत्पादों के बिना नामुमकिन हैं।

भारत की 4जी टेक्नॉलजी केवल दो चीनी कंपनियों के इन्फ़्रस्ट्रक्चर पर निर्भर है। हुवावे (Huwai) और जीटीई (ZTE)- इन दो कंपनियों ने ना सिर्फ़ भारत की निजी टेलिकॉम कम्पनियों का नेट्वर्क तैनात किया है बल्कि सरकारी कामकाज के लिए उपयोग में लाए जा रहे नेट्वर्क का हार्डवेयर भी इन्हीं कंपनियों ने बनाया है। भारतीय जवानों की वर्दी, सुरक्षा कवच और जूते भी चीनी मिलों से बन के आते हैं। सीमा सुरक्षा से लेकर भारतीय रेलवे तक लगभग सभी सरकारी एवं ग़ैर सरकारी कम्पनियाँ चीन से आयातित मशीनों का उपभोग करती हैं ऐसे में तीज-त्योहारों में बिकने वाली झालरें और सज सज्जा की सामग्री में राष्ट्रवादी ग़ुस्सा उतारना केवल भारतीय कुटीर उद्योगों का ही नुक़सान करता है।

जैसे-जैसे अमेरिकी मूल के इलेक्ट्रोनिक उत्पाद जैसे ऐपल और माइक्रसॉफ़्ट आदि मुक्त बाज़ार की प्रतिस्पर्धा में चीन के हुवावे और जिओमी जैसी कम्पनी से लगातार मात खा रहे हैं, अमेरिका की ज़्यादती चीनी कंपनियों पर बढ़ती जा रही है। हुवावे कम्पनी के मालिकों पर अमेरिका का दबाव एक उदाहरण है।

अमेरिकी शेयर बाज़ार में लिस्ट होने वाली भारत की सबसे पहली कम्पनी इनफ़ोसिस के संस्थापक नरयाणमूर्ति ने मुक्त-बाज़ार के सिद्धांत की विवेचना अपने शब्दों ऐसे की थी मानो वो कोई धर्मग्रंथ की इबारतें पढ़ रहें हों। उनके मुताबिक़, कच्चा माल वहाँ से ख़रीदो जहाँ सबसे अच्छी क्वालिटी का मिले, उत्पादन वहाँ करों जहाँ सबसे सस्ती मज़दूरी मिले और फिर गढ़े हुए माल को वहाँ बेचो जहाँ सबसे अच्छी क़ीमत मिले।

दुनिया भर में, मुक्त बाज़ार की इस परिभाषा को बेहद सराहा गया था। हालाँकि, सिवाय सॉफ़्ट्वेर के भारत इस सिद्धांत पर कभी अमल नहीं कर पाया वहीं चीन ने अपनी सरहद के अंदर ही ऐसी व्यवस्था कर ली कि कच्चे माल, मज़दूरी और उत्पादन तीनों काम वहाँ बेहद किफायती ढंग से होने लगे।

ठीक उसी वक़्त जब भारत मंदिर मस्जिद के फ़साद में रोज़गार तबाह कर रहा था चीन अपना माल दुनिया भर में बेच रहा था। एक ज़माना था जब चीन अमेरिकी पूँजीपतियों के लिए माल बनाता था, तब ऐपल और माइक्रसॉफ़्ट जैसी कम्पनियाँ अरबों की कमाई छाप रहीं थी, लेकिन अब वही कारख़ाने चीनी पूँजीपतियों के लिए माल तैयार कर रहीं हैं और इसलिए अमेरिका सदमे में हैं।

यह भी बताना ज़रूरी है कि चीन निर्मित सोशल मीडिया एप टिकटोक अमेरिका की तीन बड़ी सोशल मीडिया एप यूटूब, ट्विटर और टम्ब्लर को पछाड़ कर बहुत आगे निकल चुकी हैं। आज भारत में टिकटोक एप के उपभोगता ट्विटर और यूटूब के उपभोगता से कहीं अधिक है।

ये बात तो लगभग सभी को पता है कि अमेरिकी कंपनी गूगल जिसे भारत में हँसी मज़ाक़ में ही सही लेकिन ईश्वर का दर्जा दिया जाता हैं, चीन में वो आज भी घुस नहीं सका। लेकिन ये बात शायद ही सबको पता होगी की टिकटोक, टेंसेंट, ब्लूमबर्ग और ऐसी ढेरों चीनी कम्पनियाँ हैं, जो ना सिर्फ़ भारत में बल्कि अमेरिका और यूरोप के बाज़ारों में भी अपनी धाक जमा चुके हैं। इसके अलावा चीनी पूँजीपति जैसे अलीबाबा, सोफ्टबैंक आदि ने भारत में इतने स्टार्ट-अप्स में निवेश कर चुके हैं की उनके लिए भारतीय परिवारों का डाटा चुराना बच्चों का खेल लगने लगा है। जबकि चीन अपने देश के सभी ऑनलाइन ग्राहकों का डाटा अपनी शरहद से बाहर नहीं जाने देता।

2015 में विश्व मुक्त-बाज़ार सम्मेलन में ये क़ानून पास हुआ था कि सभी देश अपने डेटा के संरक्षण का अधिकार रखते हैं, और वो अपनी शरहद में ही अपने डेटासेंटर रख सकते हैं। इस क़ानून के पारित होने के पहले से चीन अपना डेटा अपनी शरहद में रखता था लेकिन भारत आज भी अपने इस अधिकार की रक्षा नहीं कर पा रहा है। इस क़ानून के बाद भी भारत का 50 प्रतिशत डेटा सिंगापूर और होंगकोंग के डेटासेंटर में हैं और जो कुछ भारत में है उसका 98 प्रतिशत डेटासेंटर अमीरिकी कम्पनी के अधीन हैं।

हैरानी यहाँ समाप्त नहीं होती, दुनिया भर में तेल क़ी क़ीमतें घट रहीं हैं लेकिन भारत में नहीं, क्यूँ की भारत अमेरिका की धमकी के बाद इरान से तेल ख़रीदना कम करता जा रहा है और उन देशों से तेल ख़रीद रहा हैं जिन देशों के तेल बाज़ार अमेरिका के अधीन हैं। ग़ौरतलब हो की सद्दाम हुसैन की हत्या के बाद ओपेक नेशंस और अमीरात के तेल का व्यापार अमेरिका के देख रेख में चलता है। जहाँ एक ओर अमेरिका ने अपने ही मूलनिवासियों को हराकर दकोता संधि का उलंघन कर के अपने देश के भीतर कच्चे तेल का उत्पादन शुरू कर चुका है, वहीं खाड़ी देशों के तेल का व्यापार परोक्ष रूप से अमेरिका के क़ब्ज़े में हैं।

दिलचस्प ये है कि बाज़ार ने भारत को कई ऐसे मौक़े दिए हैं जब वो अपने देश में निवेश बढ़ाकर सम्पूर्ण रोज़गार की क्रांति ला सकता था लेकिन भारतीय चेतना कभी भी फूहड़ता और धर्मांधता से ऊपर नहीं उठ पायी। आज अमेरिकी निवेश में पलाबढ़ा चीन अमेरिकी बाज़ार की नब्ज़ पकड़ रखी है और दुनिया को नैतिकता की सीख देने वाला अमेरिका आज बुज़दिली की हर हदें तोड़ने में आमादा है।

शायद मुक्त बाज़ार की सत्ता चरमरा रही है, शायद बाज़ार, धर्मांधता और आतंकवाद का खेल उजागर होने वाला है।

(जितेन्द्र राजाराम आजकल मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

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