टीवी के राष्ट्रवाद में नदारद है आपका पक्ष

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सौतुक डेस्क/

मैं उस दिन ऑफिस से घर लौट रहा था. रात के करीब नौ बज रहे थे. निजी एफएम चैनलों पर वही रोज की बकवास चल रही थी. मैंने उबकर सरकारी एफएम चैनल लगा दिया. समाचार का समय था. पता चला कि कर्नाटक सरकार ने भी किसानों के कर्ज माफ़ करने का फैसला किया है. इस फैसले के तहत सरकार किसानों के पचास हजार तक के कर्ज माफ़ करेगी. समाचार वाचक ने इस समाचार को पढने के बाद वहाँ के विपक्षी दल (भाजपा) के नेताओं से बात की और बताया कि सरकार को 50 हजार की जगह एक लाख रुपये की कर्ज माफ़ी करनी चाहिए थी. इस तरह इस चैनल ने राज्य में सरकार के साथ न होकर विपक्ष का साथ चुना. सनद रहे कि मीडिया जिसको बोलने का मौका देता है या जिसकी बात आप तक पहुंचाता है मानिए कि वह उसके साथ को चुना है. इस रेडियो चैनल के पास पूरा मौका था कि वह वहाँ की सरकार (कांग्रेस) के नेताओं से बात करता और उनके माध्यम से यह बताता कि यह बहुत महान फैसला है. नियम से इसे दोनों पक्ष से बात करना चाहिए. (इस लेख को पढ़ते हुए आपको ध्यान में रखना चाहिए कि केंद्र में भाजपा की सरकार है. सारे सरकारी चैनल अमूमन केंद्र सत्तासीन दल की राजनितिक फायदा ध्यान में रखते हैं. फिर भी हमलोग इस खबर के स्थानिय महत्व को ध्यान में रखकर आगे बढ़ेंगे.)

उसके ठीक दूसरे दिन अल्लसुबह मेरे वाट्सएप पर एक सुचना आई. जिसमे एसपी उदयकुमार जो पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लीयर एनर्जी के समन्वयक है ने एक पत्र लिखा था. यह पत्र प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन चंद्रमौली कुमार प्रसाद को लिखा गया था. इसमें  रिपब्लिक टीवी की शिकायत की गई थी. रिपब्लिक टीवी ने उदयकुमार का स्टिंग किया है जिसमे उनपर आरोप लगाया गया है कि वह विदेशी खासकर चर्च से पैसा लेकर देश में आन्दोलन चला रहे हैं.  उदयकुमार का कहना है कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा है. सरकार ने पहले ही इनके संगठन पर विदेशो से पैसा लेने पर रोक लगा रखा है. खैर इस बात को आगे बढ़ाना यहाँ विषयांतर हो जायेगा.

हमारा मुद्दा यह है कि रिपब्लिक टीवी यहाँ किसके साथ खड़ा है. सरकारें चाहती है कि देश में परमाणु सयंत्र बने. इन सरकारों का  तर्क हैं कि इससे देश के बढ़ते ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद होगी. वही जो लोग इन परमाणु सयंत्र का विरोध कर रहे हैं उनका कहना है कि सयंत्र नागरिको की सुरक्षा के हिसाब से ठीक नहीं है. इसमें किसी भी तरह के परमाणु सयंत्र का विरोध है. अब आपके अनुसार इसमें मीडिया का क्या रोल है?

अगर मैं बतौर नागरिक सोचूं तो लगता है कि विश्वसनीय आंकड़ो और सुचना की मदद से मीडिया हमें बताये की परमाणु सयंत्र सच में खतरनाक है या नहीं. अगर हैं तो इससे क्या खतरे हैं? तमाम देशों ने परमाणु सयंत्र को लेकर क्या नीति अपनाई है? इन सारे जवाब को देखने समझने के बाद मुझे अपनी राय बनाने में मदद मिलेगी कि देश के लिए परमाणु सयंत्र सही है या नहीं.

पर रिपब्लिक टीवी यह नहीं बता रहा है. वह यह कह रहा है कि जो लोग परमाणु सयंत्र का विरोध कर रहे हैं वो विदेशी पैसे से विदेशी उद्देश्य को मदद कर रहे हैं. जबकि विदेशी (फ़्रांस, अमेरिका, रूस और जापान) ही देश में परमाणु सयंत्र लगाने के लिए सरकार से नियम तोड़ मरोड़ करने की सिफारिश कर रहे हैं. उदहारण के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2010 में एक कानून पास किया जिसका नाम है सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लीयर डैमेज एक्ट. इसके तहत जो परमाणु सयंत्र लगाएगा और जो इसके लिए माल मुहैया कराएगा उसको किसी भी दुर्घटना की स्थिति में मुआवजा देना पड़ेगा. साथ ही इस दुर्घटना से प्रभावित लोगों को इन कंपनियों पर केस करने का अधिकार भी होगा. वही भारत सरकार वर्ष 2015 में एक आदेश लेकर आती है जिसमे किसी दुर्घटना की स्थिति में मुआवजे का भार यहाँ के टैक्सपेयर पर लाद दिया गया. प्रभावित जनता से केस करने का अधिकार भी छीन लिया गया.

ऐसी स्थिति में आप बेहतर अनुमान लगा सकते हैं कि चर्च या विदेशी ताकते किसके फैसले को प्रभावित कर रही  है. यह निष्कर्ष आपको निकालना है और यह भी कि रिपब्लिक टीवी किसके साथ खड़ा है? आपके साथ या सरकार के साथ?

यह बात सिर्फ रिपब्लिक टीवी पर ही लागू नहीं होती. वर्तमान समय में लगभग सभी समाचार चैनल अपनी भूमिका से मुंह मोड़ लिया है. अगर आपको इसे लेकर कोई भ्रम है तो अलग बात है. अगर सच में जानना चाहते हैं तो टीवी देखते हुए यह जरुर दिमाग में रखिये कि जो खबर आप देख रहे हैं उसे पढ़कर सरकार उस चैनल से नाराज होगी या मेहरबान? यह एक सवाल उस टीवी चैनल की इमानदारी बयान कर देगा.

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