भाजपा के चक्रव्यूह में फंस गए लालू और नितीश

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शिखा कौशिक/

देश के वर्तमान प्रधानमन्त्री बहुत कुछ पहली बार करने का रिकॉर्ड अपने नाम रखते हैं. इसी कड़ी में उन्होंने शायद एक और रिकॉर्ड बनाया कि किसी मुख्यमंत्री के इस्तीफा देने पर तुरंत बधाई दे डाली. खासकर तब जब स्थिति पूरी तरह से अभी स्पष्ट भी नहीं हुई थी.

ऐसी उत्सुकता कब होती है? जब आप एक दाव खेलते हैं और सांस थामे उसके परिणाम का इंतज़ार करते हैं. और परिणाम आपके अनुरूप आते ही अगल बगल का परवाह किये बिना खुशी से झूम उठते हैं. नरेन्द्र मोदी के ट्वीट को ऐसे ही देखा जाना चाहिए.

सौतुक ने दो सप्ताह पहले लिख दिया था कि केंद्र सरकार ने एक ऐसा चक्रव्यूह रचा है जिसका निशाना वैसे तो तेजस्वी यादव दिखते हैं पर असली निशाना तो नितीश कुमार हैं. और लक्ष्य है 2019 में होने वाला केद्र का चुनाव है जिसमे विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं रहना चाहिए. राहुल गांधी के बार बार छुट्टी पर जाने की वजह से नितीश कुमार विपक्ष का चेहरा बनता दिख रहे थे. इसके पहले ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल भी दावेदार थे, पर तमाम वजहों से वो भी विकल्प नहीं बंटे दिखे.

ऐसे में नितीश कुमार को विकल्प बनने से रोकना था. इसके लिए नितीश को दो तरीके से कमजोर किया जा सकता था. एक तो उनको भी भ्रष्टाचार का साथी दिखाकर जैसे लालू खेमे के भ्रस्टाचार को समर्थन देने का आरोप लगाकर. इससे भी मुफीद ये कि नितीश इस भ्रष्टाचार के आरोप से बचने की कोशिश करे तो गठबंधन टूट जाए. नितीश भाजपा के साथ सरकार बना लें. इससे भाजपा के खाते में एक राज्य और जाएगा और नितीश राजनीति में अपने को मोदी का छोटा भाई होना स्वीकार कर लें.

इसकी शुरुआत हुई जब लालू प्रसाद यादव से जुड़े लोगों पर सीबीआई के दनादन छापे पड़ने शुरू हुए. यह वही साल है जब केंद्र सरकार अपने तीन साल पूरे कर चुकी है. एक तरफ रेडियो पर इस सरकार के कामों का बखान करते प्रचार प्रसारित होने लगे हैं और दूसरी तरफ लालू यादव के कुनबे पर छापा पड़ना शुरू हुआ.

इस सिलसिले में लालू प्रसाद यादव के बेटी मीसा भारती के घर पर भी छापे पड़े. आखिरी छापा लालू यादव पर उस आरोप के सिलसिले में पड़ा जिसमे कहा गया है कि उन्होंने रेल मंत्री रहते हुए अपने कार्यालय का इस्तेमाल कर के पटना में बहुत खास जगह पर सस्ते में तीन एकड़ जमीन खरीदी. यह जमीन  फिलवक्त राज्य के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के नाम पर है और उनके  खिलाफ एफआईआर दर्ज़ हो चुका है.

शतरंज के इस खेल में अगले कदम के तौर पर उनसे इस्तीफ़ा मांगा गया.  भाजपा ने इस इस्तीफे को मांगने में फुर्ती दिखाई और नितीश कुमार को निहत्था कर दिया. नितीश के पास अपनी सरकार को बेदाग़ बनाए रखने के लिए बहुत कम विकल्प था. फलस्वरूप उन्होंने तेजस्वी पर दबाव बनाना शुरू किया. उनका इस्तीफ़ा हो जाता तो नितीश को तत्कालीन राहत मिलती. अलबत्ता भाजपा उसके बाद अपनी नई विसात भी बिछाती. लेकिन राजद का कहना था कि वह भाजपा-शासित  देश में   चल रहे है फसादी माहौल का विरोध करने वाला दल है और इसलिए केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल कर इस दल को परेशान कर रही है. आगे यह कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाता इस्तीफे का सवाल नहीं उठता.

इसके जवाब में नितीश कुमार ने स्पष्ट करते रहे कि भ्रष्टाचार के मामले में उनका रुख स्पष्ट है. लेकिन इसके सहारे कब तक अपनी इमेज बचाई जा सकती थी. नितीश को मजबूरन अपना कड़ा रुख इख्तियार करना पड़ा. लालू ने जवाबी कार्यवाही में और कड़ा रुख इख्तियार किया. बुधवार को उन्होंने यह तक कह दिया कि उन्होंने ही नितीश को मुख्यमंत्री बनाया है. वो नितीश को बता रहा थे कि राजद बिहार के गठबंधन की सरकार में बड़ा भाई है. ऐसे में नितीश के पास इस्तीफ़ा देने के सिवा कोई चारा नहीं था. नहीं तो इतने साल की उनकी स्वच्छ छवि की राजनीति पर दाग दिखाने के लिए भाजपा कैमरा लेकर बैठी थी.

भाजपा के इस दाव से बचने के लिए लालू प्रसाद यादव के पास भी बहुत कम विकल्प था. उनको या तो तेजस्वी का इस्तीफ़ा दिलाना था जो अपने आप में बहुत बड़ी कीमत है. खासकर तब जब खुद लालू प्रसाद यादव सजायाफ्ता होने की वजह से चुनाव नहीं लड़ सकते. दूसरी तरफ, बहुत सालों के बाद उनका दल किसी तरह से सत्ता में आया था और अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरे रहने के लिए उनके दल का सरकार में बने रहना जरुरी था. लेकिन जब खुद बचे रहेंगे तब तो कार्यकर्ता को बचायेंगे. शायद यही सोचकर उन्होंने दूसरा विकल्प ही चूना.

परिणाम यह हुआ कि नितीश इस्तीफ़ा दे दिए. अब नितीश अगर खुद को राजनीति में प्रासंगिक बनाए रहना चाहते हैं तो भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाएं. इस गठबंधन से हटने के बाद तो लोकसभा में विपक्ष का चेहरा बनना मुश्किल होगा. बिहार की राजनीति में राजद और भाजपा दोनों से अकेले मुकाबला करना उनके लिए संभव नहीं होगा.

इस तरह विपक्ष फिर से बिना चेहरे का हो गया.

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