नमो टीवी के स्क्रीन पर झलकता निर्वाचन आयोग और मोदी का असली चेहरा

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उमंग कुमार/

नमो (NaMo) टीवी आजकल चर्चा में है. इस चैनल की शरुआत DTH  (Direct to Home) पर 31 मार्च को हुई. इस चैनल और चैनल पर दिखाए जा रहे कंटेंट को लेकर काफी बहस चल रही है. एक तरफ एबीपी चैनल पर दिए गए साक्षात्कार में नरेन्द्र मोदी ने यह कहते हुए इस विषय को रफा-दफा करने की कोशिश की कि हाँ कुछ लोग चला रहे हैं. वहीँ दूसरी तरफ विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग से आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाया है.

इस चैनल की वजह से आचार संहिता का उल्लंघन हो रहा है. लगभग सभी राजनितिक दल और बुद्धिजीवी वर्ग इससे सहमत है. नमो टीवी लोकसभा चुनाव के ठीक पहले लाया गया है ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रचार के लिए उपकरण की तरह काम करे. राजनितिक दलों के संज्ञान में लाने के बाद चुनाव आयोग ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय से इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांगा है. अनुमान लगाया जा रहा है कि निर्वाचन आयोग इसपर 9 अप्रैल को होने वाले बैठक में कोई फैसला ले सकता है. या शायद नहीं भी.

नमो टीवी को लेकर विवाद की एक नहीं कई वजहें हैं. अव्वल तो यह कि इस नमो टीवी को किस श्रेणी में रखा जाए! इसे समाचार चैनल, मनोरंजन चैनल या  ऐड-ऑन सर्विस कहा जाए. ऐड-ऑन सर्विस से तात्पर्य उन चैनलों से हैं जो डायरेक्ट-टू-होम (डीटीएच) ऑपरेटर अलग से अपने दर्शकों के लिए उपलब्ध कराते हैं.

यह चैनल टाटा स्काई पर 145 पर दिखाया जा रहा है. इस तरह यह एक हिंदी मनोरंजन चैनल के साथ-साथ 512 नंबर पर एक हिंदी समाचार चैनल के रूप में भी उपलब्ध है. इनदोनों श्रेणी के अलावा इसे एक और श्रेणी में देखा जा सकता है वह है विज्ञापन चैनल? कुल मिलाकर स्थिति स्पष्ट नहीं है.

अगर यह महज मनोरंजन परोसने वाला चैनल है तो सवाल यह उठता है कि डीटीएच ऑपरेटर की इसके कंटेंट के प्रति कोई जिम्मेदारी है क्या? क्या चुनाव, आचार संहिता इत्यादि के प्रति इनकी डीटीएच चैनलों की कोई जिम्मेदारी है? नियम से जब आप अपने प्लेटफ़ॉर्म पर कोई चैनल उपलब्ध कराते हैं तो उसके कंटेंट की जवाबदेही भी आपकी होती है.

आखिर नरेन्द्र मोदी इस नमो चैनल से क्या लाभ कमाना चाहते हैं जो उनको अभी नहीं मिल रहा है

और यदि नमो टीवी एक समाचार चैनल है, तो और भी गंभीर सवाल हैं क्योंकि समाचार चैनल को चलाने के लाइसेंस की आवश्यकता होती है. खबर के अनुसार नमो चैनल ने कभी ऐसे लाइसेंस लेने की कोशिश नहीं की.

तीसरे, अगर यह एक डीटीएच ऑपरेटर द्वारा दी जाने वाली एक ऐड-ऑन सेवा है, तो इसे एक चैनल के लिए विशेष होना चाहिए. जबकि नमो टीवी कई डीटीएच प्लेटफार्मों पर उपलब्ध है.

अगर यह किसी खाके में फिट नहीं बैठता तो आखिर कौन है जो इस चैनल को चलाना चाहता है और उसके क्या उद्देश्य हैं!

इन सवालों के जवाब खोजने पर एक और महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है. यह कि नमो चैनल का इस्तेमाल चुनाव के पहले पहली बार नहीं हो रहा है. ऐसा 2012 में भी एक बार हो चुका है. तब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के लिए तीसरी बार चुनाव मैदान में थे. उस समय कांग्रेस की राज्य इकाई ने इस चैनल पर प्रसारित हो रहे सामग्री से सम्बंधित शिकायत दर्ज कराई थी. यह शिकायत तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री  मनीष तिवारी से की गई थी.

खैर मालिकाने पर आते हैं. इस चैनल के मालिक को लेकर मीडिया में जो खबर चल रही है वह दो गुजराती व्यवसायियों की तरफ इशारा करती है. इनमें एक पराग शाह हैं जिनके बारे में कहा जा रहा है कि ये भाजपा के नेतृत्व के काफी करीब हैं.

अब सवाल है 2019 का लोकसभा चुनाव. आचार संहिता लागू हो चुकी है. निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि किसी भी तरह से निष्पक्ष चुनाव कार्य जाए. सरकार या कोई अन्य राजनितिक दल किसी भी बेजा तरह से लोगों को प्रभावित न करें. तो क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि निर्वाचन आयोग मंत्रालय से रिपोर्ट मांगकर चुप हो गया है. दूसरी बात है सत्तारूढ़ दल से सम्बंधित. नरेन्द्र मोदी के बारे में कहा जा सकता है कि वे आचार संहिता को इतनी ही गंभीरता से लेते हैं कि एक पत्रकार के पूछने पर इस मुद्दे को हंस के रफा-दफा कर दिया.

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