‘रॉ विजडम’ से देश नहीं चलता प्रधानमंत्री जी!

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उमंग कुमार/

पिछले पांच सालों से लोग जिस सवाल का जवाब ढूंढ रहे थे उसका पता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस शासनकाल के अंत में आकर मिला है. वह यह कि देश ‘रॉ विजडम’ से चल रहा है. इसको और सरलतम रूप में समझें तो यह कि ‘जो मन में आया वही’ कर दो, बाकी फैसले को साबित करते रहो.

शुरू से मोदी ने ढेर सारे ऐसे फैसले लिए जिसका कोई ओर-छोर नहीं पता चलता था. जैसे कार्यकाल के शुरू में योजना आयोग को ख़त्म कर उसकी जगह पर नीति आयोग बनाना. मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, नोटबंदी, अचानक पकिस्तान जाकर नवाज शरीफ की बेटी की शादी में शरीक होना, फिर एक दिन वायु सेना को रडार से बचने के नाम पर बादलों के सहारे पकिस्तान के बालाकोट में बमबारी करवा देना, बिना तैयारी के जीएसटी लागू कर देना इत्यादि.

लोगों के लिए यह कौतुहल का विषय रहा कि आखिर ये सारे फैसले कैसे लिए जा रहे हैं. क्योंकि इन फैसलों के परिणाम अपेक्षा अनुरूप नहीं होते थे. उदाहरण के लिए मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, नोटबंदी को ही लें. आज तक किसी को पता नहीं चला कि आखिर सरकार ने ऐसा निर्णय कैसे लिया! इन सरकारी योजनाओं की घोषणा के पहले कोई अध्ययन हुआ था कि नहीं! इन योजनाओं को सफल बनाने के लिए जो ज़रूरी तैयारी होनी चाहिए थी वह की गई या नहीं! अगर ये सब किया गया था तो ये निर्णय गलत कैसे साबित हो गए! (सरकार अभी भी नहीं मानती कि ये असफल योजनायें हैं. लेकिन इतना जरुर है कि सरकार का कोई नुमाईन्दा इन योजनाओं का ज़िक्र इस चुनाव में करता नहीं दिख रहा है.)

ऐसा लग रहा था कि यह कार्यकाल ख़त्म हो जाएगा और संशय बरकार ही रहेगा. लेकिन चुनाव के आखिरी चरण में न्यूज़ नेशन चैनल पर साक्षात्कार देते हुए नरेन्द्र मोदी ने इस जिज्ञासा को शांत किया और बताया कि वे फैसले ‘रॉ विजडम’ के आधार पर लेते हैं.

इस ‘रॉ विजडम’ के आधार पर वे सेना को पाकिस्तान के अन्दर तक भेज देते हैं. इस फैसले से दो परमाणु संपन्न देशों के आमने-सामने आ जाने का खतरा था. और यह भी स्थापित सत्य है कि हमला कोई करे नुकसान दोनों देशों को होना है. भारत का एक जवान पाकिस्तान के कब्जे में चला भी गया जिसकी वजह से सरकार की काफी किरकिरी हुई.

जब मोदी इतना बड़ा फैसला ‘रॉ विजडम’ के आधार पर ले सकते हैं तो बाकी के फैसले तो फिर भी देश के अन्दर ही लोगों को प्रभावित करते रहे हैं. ऐसे में सवाल ही नहीं उठता कि किसी निर्णय के लिए जरुरी अध्ययन, पायलट स्टडी इत्यादि कराने की जरुरत समझी गई हो.

नोटबंदी का फैसला अबतक अबूझ बना हुआ था. सरकार ने क्या सोचकर इतना बड़ा फैसला लिया. लोग और देश की अर्थव्यवस्था अबतक नोटबंदी के प्रभाव से उबर नहीं पायें हैं. सरकार ने नए नए तर्क देकर इस फैसले को सही साबित करने की कोशिश की. कभी आतंकवाद मिटाने का जिक्र, कभी नकली नोट ख़त्म करने तो कभी कैशलेस अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने के का बहाना. पर परिणाम के तौर पर सबकुछ सिफर ही रहा.

अब नीति आयोग की उपयोगिता को ही ले लीजिये. मोदी ने सत्ता में आते ही योजना आयोग को रद्द कर नीति आयोग का गठन किया.   

वैसे सोवियत काल के योजना आयोग को ख़त्म करने की मांग पहले से चल रही थी पर उसकी जगह पर जो नीति आयोग बना वह किस आधार पर बना यह लोगों को आज तक समझ नहीं आया. हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि नीति आयोग का काम बस नरेद्र मोदी का पीआर करना है. उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो इस आयोग को भंग कर दिया जाएगा.

काश मोदी ने योजना आयोग के नाम पर जो नया कुछ बनाया कुछ सोच समझ कर, दूर दृष्टि के साथ बनायाहोता तो नई सरकार को इसे रद्द करने की नौबत नहीं आती. और ये सारे फैसले देश के विकास में कुछ कदम आगे ही ले गए होते लेकिन मोदी ने जरुरी तैयारी की जगह ‘रॉ विजडम’ को दिया और नतीजा सामने है.

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