मंत्री का निजी क्षेत्र के डॉक्टरों की तुलना वेश्या और नाई से करना कितना उचित?

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सौतुक डेस्क/

कर्नाटक में निजी अस्पताल के डॉक्टर वहाँ के स्वास्थ्य मंत्री को हटाना चाहते हैं. इसके लिए इन डॉक्टरों ने ऑनलाइन मुहीम छेड़ रखी है. अब तक इनको साढ़े चार हजार से अधिक लोगों का समर्थन मिल चुका है.

इनका आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री रमेश कुमार डॉक्टरों की तुलना वेश्या, नाई और पॉकेटमारों से करते हैं जो कि एक मंत्री को शोभा नहीं देता. इन डॉक्टरों का आरोप है कि यह मंत्री अपनी भ्रष्ट गतिविधियों को छिपाने के लिए मेडिकल जैसे महान  पेशे को बदनाम कर रहा है.

किसी रविन्द्र रमैया के द्वारा शुरू यह पत्र स्वास्थय मंत्री पर आरोप लगाता है कि हाल-फिलहाल में रमेश कुमार ने डॉक्टर और मेडिकल प्रोफेशन के खिलाफ मीडिया में ग़ैर-ज़रूरीऔर पेशे को बदनाम करने वाला बयान दिया है. इससे डॉक्टर और मरीज के बीच के भरोसे को धक्का लगा है. इसलिए ये डॉक्टर चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग उनके समर्थन में आएं ताकि यह पत्र कर्नाटक के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को दिया जाए. इस पत्र में स्वास्थ्य मंत्री को हटाने की मांग की गई है.

अलबत्ता इस ऑनलाइन पेटीशन में कहीं भी दिन, तारीख, जगह के साथ किसी ऐसे वाकये का जिक्र नहीं किया गया है जिसमे स्वास्थय मंत्री ने कोई ग़ैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार किया हो. बल्कि इस सारे आरोपों का सामान्यीकरण किया गया है.

ऐसा माना जा रहा है कि इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले मूलतः निजी क्षेत्र के डॉक्टर हैं, जो कि स्वास्थय मंत्री के कर्नाटक प्राइवेट मेडिकल एस्टाब्लिश्मेंट एक्ट को लागू करने की कोशिश से नाराज हैं.

इस पर कर्नाटक में ही सक्रिय और जन-स्वास्थ्य पर काम करने वाली डॉ सिल्विया कर्पागम लिखती हैं कि एक मंत्री की ज़िम्मेदारी निजी क्षेत्र के मुनाफा को बढ़ाना और प्रोत्साहन देना नहीं है. बल्कि उसकी प्रमुख जिम्मेदारी जनता, खासकर कमजोर वर्ग के हितों की रक्षा करना है.  अगर स्वास्थय मंत्री इस उद्देश्य को नज़र में रखते हुए निजी क्षेत्र के लिए कोई कानून लाने की बात कर रहे हैं तो इसकी तारीफ़ होनी चाहिए. आजकल के चलन को देखते हुए जब सारे फैसले निजी कंपनियों के हित को ध्यान में रखते हुए लिए जा रहे हों, तब किसी मंत्री का ऐसा प्रयास कोई छोटी-मोटी बात नहीं है. सरकार के इस कदम का  स्वास्थ्य पर काम करने वाले बहुत सारे समूहों ने स्वागत किया है. जन-स्वास्थ्य पर काम करने वाले विशेषज्ञ भी इसे एक अच्छा कदम बताते हैं.

कर्पागम  लिखती हैं कि ये देखना बहुत रोचक होगा कि इन 4,500 लोगों में जिन्होंने इसपर हस्ताक्षर किया है, कितने मरीज हैं. इनके हिसाब से इन हस्ताक्षर करने वालों में सरकारी डॉक्टर भी  शामिल नहीं होंगे. बल्कि ये वही लोग हैं जो कर्नाटक प्राइवेट मेडिकल एस्टाब्लिश्मेंट एक्ट 2013, के लागू करने के खिलाफ आन्दोलन कर रहे हैं. इस कानून का उद्देश्य निजी क्षेत्र के अस्पताल और क्लिनिक को सुचारू रूप से संचालित करना है. इस कानून के तहत राज्य के सारे अस्पतालों को अपने यहाँ मौजूद सुविधा और उसपर आने वाले खर्च को अपनी वेबसाइट और अस्पताल में एक बोर्ड पर लिखना होगा. इससे ये लोग बाद में मरीजों के साथ मनमानी नहीं कर सकेंगे.

निजी अस्पतालों में मरीजों का शोषण कोई नई बात नहीं है. बिरले ही ऐसे मरीज मिलेंगे जिन्होंने निजी अस्पताल में किसी भारी समस्या का इलाज कराया हो और खुद को आर्थिक या मानसिक रूप से ठगा हुआ महसूस न किया हो. इस तरह अगर स्वास्थय मंत्री ने निजी अस्पतालों के व्यावसयिक प्रकृति पर अगर कोई टिपण्णी की है तो यह एक सामान्य और जरुरी है जिसे ये डॉक्टर ग़ैर-ज़रूरी बयान बताना चाहते हैं.

कर्पागम लिखती हैं कि यद्यपि निजी अस्पतालों को अपनी आमदनी और खर्च निकालना होता है पर ये लोग 1,000 और 2,000 गुना मुनाफे के चक्कर में मरीजों और डॉक्टर के बीच के भरोसे को ख़त्म कर रहे हैं. और अभी ये ऐसा बताना चाह रहे हैं कि स्वास्थय मंत्री के बयान से डॉक्टर और मरीज के बीच का भरोसा कम हो रहा है. डॉक्टर और मरीज के बीच का भरोसा कोई एक दिन में नहीं कम हुआ है. यह मरीजों के खिलाफ लागातार उठाये जा रहे कदम का नतीजा है. पर इन डॉक्टर के तमाम संगठन हैं जिनमें से एक ने भी कभी इस समस्या के खिलाफ आवाज नहीं उठाई है. बल्कि ये निजी अस्पताल धड़ल्ले से ग़ैर-ज़रूरी ऑपरेशन, ग़ैर-ज़रूरी दवाएं, मरीजों पर ड्रग ट्रायल और अन्य तरीकों का शोषण करते रहे हैं. तब इन डॉक्टरों को मरीजों के भरोसे का ख्याल नहीं आया.

वह आगे लिखती हैं कि अगर डॉक्टर के समूह सच में मरीजों के भरोसे को लेकर चिंतित थे तो उनको इस पेशे के महान चरित्र को बचाने के लिए खुद से नियम कानून लाने चाहिए थे. पर इन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि हर तरह के कानून का विरोध किया. इसलिए आज सरकार मजबूर  है कि वो ऐसे कानून बनाए जिससे ये बेकाबू डॉक्टर अपने पेशे की गरिमा बनाए रख सकें.

इन्होने एक बात मार्के की कही. वह यह कि इन डॉक्टरों की तुलना वेश्या और नाई से किया जाना ग़लत है. ऐसा कभी सुनने में नहीं आता कि ये लोग, वेश्या या नाई, भी अपने पेशे में ग्राहक के साथ वैसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से पेश आते हैं जैसे कि ये खुद को महान पेशे का बताने वाले डॉक्टर.

 

 

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