#Metoo: रोशनी के पीछे का अँधेरा!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

अपना शहर छोड़े बगैर, पलायन कर जाने के भाव को महसूस कर जाने का माध्यम है सिनेमा. निःसंदेह परदे की चंचल छवियां छलावा भर होती हैं, वास्तविकता से दूर वास्तविकता का भ्रम बनाती हुईं. इन छवियों को निभाने वाले पात्र वास्तविक जीवन से  ही आते हैं. ये लोग कथानक की मांग के अनुरूप थोड़ी देर के लिए पात्र की काया में उतरते हैं, उस किरदार को जीवंत करते हैं और पुनः यथार्थ में लौट जाते हैं. चूँकि दर्शक इनके काल्पनिक  रूप को ही देख पाता है और  वही उसे याद रहता है तो वह उसे ही आदर्श मान आचरण करने  लगता है. ये काल्पनिक पात्र अनजाने ही बड़े समूह के लिए जीवन मूल्य तय कर बैठते हैं परन्तु यथार्थ में उन  मूल्यों को गाहे-बगाहे ध्वस्त करते रहते हैं.

भारतीय अवाम ने पिछले सात दशकों में सिद्ध किया है कि ‘राजनीति, क्रिकेट और सिनेमा का जुनून देश की रगों में बहता है. कम खायेंगे, कम पहनेंगे परन्तु इन तीनों के लिए हमेशा समय निकाल लेंगे. इन तीनों ही क्षेत्रों के नायकों को उनकी मानवीय कमजोरियों के बावजूद सिर माथे बैठाने की परंपरा का नियम पूर्वक पालन किया जाता रहा है. दक्षिण भारत में राजनेताओं और फिल्म अभिनेताओं के मंदिर बन जाना इस अपरिपक्व मानसिकता का ही परिणाम है. जबकि इन मंदिरों में विराजित लोग किसी समय आर्थिक और चारित्रिक दुर्बलताओं के दाग धब्बों से लांछित रहे हैं.

अपने इन तथाकथित नायकों की कारगुजारियों को नजरअंदाज कर जाने का भाव हमारे देश के एक बड़े वर्ग की सामूहिक सोच में बदल चुका है. अगर यह सोच नहीं होती तो भला आपराधिक पृष्टभूमि के सैंकड़ों व्यक्ति नगर पालिका से लेकर संसद तक कैसे पहुँच पाते? क्रिकेट का एक उभरता सितारा अपने होटल के कमरे में अवांछनीय हरकत करते हुए सीसीटीवी में कैद हो जाता है. शर्मिंदा होने के बजाय वह अपने राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी का सदस्य बन जाता है, कुछ समय बाद एक राष्ट्रीय टीवी के रियलिटी शो का हिस्सा भी बन जाता है. जहाँ उसे नकारा जाना चाहिए था, वहाँ वह समर्थन जुटा लेता है.

अपने इन तथाकथित नायकों  की कारगुजारियों को नज़रअंदाज कर जाने का भाव हमारे देश के एक बड़े वर्ग की सामूहिक सोच में बदल चुका  है

इसी तरह एक दशक पूर्व एक टीवी चैनल के ‘कास्टिंग काउच’ पर किये गए स्टिंग ऑपरेशन में उजागर मनोरंजन जगत के कुछ स्थापित नाम आज भी बाइज्जत जमे हुए हैं. उनके कैरियर पर कोई नकारात्मक असर इस घटना ने नहीं डाला क्योंकि दर्शकों ने उन्हें नकारने का उपक्रम भी नहीं किया था.

हॉलीवुड फिल्मों के कथानक से प्रेरणा लेने वाला मनोरंजन उद्योग उनके साहस से प्रेरित नहीं होता.  जिस तरह यौन उत्पीड़न की शिकायतों के बाद नामचीन हार्वे विन्स्टीन, बिल कॉस्बी और केविन स्पेसी को सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर सलाखों के पार पहुंचाया गया है वैसी नजीर भारत में दिखाई देगी इस बात में संदेह है.

तनुश्री दत्ता “मी टू” के भारतीय संस्करण की मशाल धावक बनीं हैं और उनके उठाये गए सवालों ने अन्य महिलाओं को अपनी पीड़ा व्यक्त करने का साहस दिया है. परिणामस्वरूप संस्कारी आलोक नाथ, नाना पाटेकर, पत्रकारिता से राजनीति में आये एमजे अकबर, गुजरे जमाने के निर्देशक सुभाष घई, सूफी गायक कैलाश खेर, निर्माता विकास बहल आदि  कुछ ऐसे नाम हैं जो थोड़ी देर से जागी महिलाओं की वजह से सतह पर आये है.

यह तूफ़ान यहीं थमता नहीं दिख रहा है. सूरज की पहली किरण के साथ रोज चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. इन महिलाओं से बस इतना ही गिला है कि इन्होंने यह साहस जुटाने में समय क्यों ज़ाया किया? कुछ ऐसे भी आरोप सामने आ रहे है जिनके सच होने में संदेह है.

तनुश्री दत्ता “मी टू” के भारतीय संस्करण की मशाल धावक बनीं हैं और उनके उठाये गए सवालों ने अन्य महिलाओं को अपनी पीड़ा व्यक्त करने का साहस दिया है

इतना हो-हल्ला होने के बाद भी बॉलीवुड के शीर्ष पर चुप्पी पसरी हुई है. जिनकी आवाज देश भर में सुनी जाती है ऐसे लोग इन दागियों के खिलाफ कुछ भी बोलने से बच रहे हैं. बॉलीवुड अपना दृष्टिकोण तय करे. उसके पूर्व दर्शकों को अपना एजेंडा तय कर लेना चाहिए कि वे ऐसी तमाम फिल्मों और टीवी धारावाहिकों का बहिष्कार करेंगे जिसमें ये नाम शामिल हैं. मी टू की सफलता तभी है जब चकाचोंध के पीछे फैले अंधेरे की सफाई होगी.

अतीत के अनुभवों से एक कटु सत्य स्पष्ट नज़र आता है कि हमारे देश के बड़े जनसमूह की यादाश्त ज्यादा देर उनका साथ नहीं देती. या यूँ कहें कि वे देखकर भी अनदेखा करने की अपनी आदत से मजबूर हैं. सजा के इंतजार में  सलाखों के पीछे करवटे बदल रहे धार्मिक गुरुओ के अनुयायी कम नहीं हुए हैं. न ही ऐसे राजनेताओं की साख पर किसी तरह की आंच आई है.

पीड़ितों को अपनी आवाज उठानी ही चाहिए और उनका समर्थन भी इस देश के नागरिकों को करना चाहिए परन्तु इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस तात्कालिक अंधड़ में कोई निर्दोष किसी पूर्वाग्रह का शिकार न हो जाए.

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से  हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी  महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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