मौलाना अबुल कलाम आजाद जयंती: अंग्रेजों के थोपे नज़रबंदी के वे दिन और कुछ जरुरी बातें

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संजय कृष्ण/

(वरिष्ठ पत्रकार संजय कृष्ण रांची में कार्यरत हैं. संजय पत्रकारिता को नौकरी से अतिरिक्त जिम्मेदारी की तरह निभाते हैं. रांची में रहते हुए उन्होंने  झारखण्ड के कई ऐतिहासिक तथ्यों को सामने  लाया है.झारखण्ड के आदिवासी समाज  के मेलों, परम्पराओं, अंग्रेजो के शासन काल में झारखण्ड में हुई उठापटक को लोगों के  नज़र  में  लाने  का इनका काम सराहनीय है.)

संजय कृष्ण

मौलाना अबुल कलाम आजाद या अबुल कलाम गुलाम मुहियुद्दीन (11 नवंबर, 1888 – 22 फरवरी, 1958) एक प्रसिद्ध भारतीय मुस्लिम विद्वान थे। वे कवि, लेखक, पत्रकार और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत की आजादी के बाद वे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक रहे। वे महात्मा गांधी के सिद्धांतो का समर्थन करते थे। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए कार्य किया, तथा वे अलग मुस्लिम राष्ट्र (पाकिस्तान) के सिद्धांत का विरोध करने वाले मुस्लिम नेताओ में से थे। खिलाफत आंदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1923 में वे भारतीय नेशनल काग्रेंस के सबसे कम उम्र के प्रेसीडेंट बने। वे 1940 और 1945 के बीच काग्रेंस के प्रेसीडेंट रहे। आजादी के वाद वे भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के रामपुर जिले से 1952 में सांसद चुने गए और वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने।

नजरबंदी के पौने चार साल रांची में रहे मौलाना

मौलाना अबुल कलाम आजाद को अपनी उग्र और राष्ट्रवादी लेखन के कारण अंग्रेजों का कोपभाजन बनना पड़ा था। उन्हें नजरबंदी का आदेश जारी कर दिया गया। वे रांची आए और यहां करीब पौने चार साल बिताए। यहां रहकर उन्होंने कई रचनात्मक कार्य किए। मदरसा की स्थापना की। अंजुमन इस्लामिया खोला और हिंदू-मुस्लिम एक्य के लिए बहुत काम किया। हर शुक्रवार वे जामा मस्जिद में तकरीर किया करते, जिसे सुनने के लिए मस्जिद में हिंदू भी जाते।

जो काम वे कर रहे थे, अंग्रेजी सरकार को वह नागवार लग रहा था। इसलिए, बंगाल की सरकार ने उन्हें अपने राज्य से निष्कासन का आदेश जारी कर दिया। वह तारीख थी, 28 मार्च, 1916। बंगाल सरकार ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट की धारा तीन-ए के तहत अपने राज्य से निष्कासन का आदेश जारी किया था। इस आदेश में यह हिदायत दी गई कि वे इस राज्य की सीमा में न दाखिल होंगे, न प्रवास करेंगे और न ही यहां पर मौजूद होंगे। ऐसा इसलिए कि उन्होंने जो कार्य शैली अपनाई है या वह अपनाने वाले हैं, वह जनता की सुरक्षा के लिए नुकसान पहुंचाने वाली है। उन्हें खबरदार किया गया कि अगर उन्होंने इस आदेश या इसके किसी हिदायत की जान-बूझकर खिलाफवर्जी की तो वह इस कानून की प्रस्तावित सजाओं के पात्र होंगे।

आदेश जारी करने के बाद मौलाना को चार दिनों का वक्त दिया गया कि वह बंगाल छोड़ दे। बाद यह अवधि बढ़ाकर चार अप्रैल कर दी गई। दूसरे राज्यों ने पहले ही प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी। बिहार छोड़कर दूसरा कोई राज्य नहीं बचा था, जहां वे प्रवेश कर सकते थे। इसलिए, वे बिहार के रांची के लिए रवाना हुए। तब झारखंड नहीं बना था। बिहार भी बंगाल से पांच साल पहले ही अलग हुआ था।

आदेश के बाद मौलाना पांच अप्रैल को रांची आ गए और डाक बंगला में ठहरे। यहां की पुलिस को कोई खबर नहीं। बड़ी मुश्किल से वह आठ अप्रैल को पता लगा पाई कि मौलाना रांची में हैं। आनंद बाजार पत्रिका, कलकत्ता ने 12 अप्रैल को खबर प्रकाशित की। उसमें यह सूचना भी थी कि यूपी और पंजाब ने पहले से ही मौलाना के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी।

इसके बाद 13 अप्रैल को उनकी बहनें और बहनोई मोइनुद्दीन भोपाल से आए और उनके साथ ठहर गए। 15 अप्रैल को बंबई की राज्य सरकार ने भी अपनी सीमा में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी। उडि़सा-बिहार की सरकार की पुलिस ने भी उनके रांची प्रवास पर आपत्ति जताई।

इस तस्वीर को केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर के कक्षा आठ के छात्र आयुष जयसवाल ने बनाया है.

21 अप्रैल को रिटायर्ड इंस्पेक्टर आफ स्कूल्स, बंगाल सरकार के मौलवी अब्दुल करीम के मोरहाबादी स्थित आवास में मौलाना चले गए। बाद में काफी मशक्कत के बाद उन्हें रांची में रहने की इजाजत मिली मगर कई शर्तों के साथ। यहां रहते हुए उन्होंने अपना काम शुरू किया। यहां मुस्लिम समाज में शिक्षा का घोर अभाव था। सबसे पहले उन्होंने शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने का काम किया। 15 अगस्त, 1917 को अंजुमन इस्लामिया की स्थापना हुई। एक सितंबर को हुई बैठक में यहां एक मदरसा स्थापित करने पर सहमति बनी। 27 जनवरी, 1918 को मदरसा इस्लामियां रांची भवन का शिलान्यास किया गया। मौलाना रांची में चुप नहीं बैठे थे। राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगी थी। इसलिए वे खुले तौर पर कुछ नहीं करते थे। लेकिन उन्होंने मस्जिद में ही तकरीर करनी शुरू कर दी। मुसलमान तो सुनते ही थे, हिंदू भी सुनने के लिए अपर बाजार के जामा मस्जिद में जाने लगे। जब कुछ लोगों ने हिंदुओं के प्रवेश पर आपत्ति जताई तो एक किताब लिखकर इसका जवाब मौलाना ने दिया।

 मौलाना से मिलने कंधार से आया पैदल

इस घटना का दिलचस्प विवरण उनकी किताबों में है। घटना 1918 की है। दिसंबर की ठिठुरती ठंड में एक दिन मौलाना आजाद नमाज पढ़कर मस्जिद से बाहर निकले तो उनकी निगाह एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो एक कंबल ओढ़े उनकी प्रतीक्षा में खड़ा था। मौलाना उसके पास गए और उससे पूछताछ की। पता चला कि वह सीमा प्रांत कंधार की ओर से केवल उनसे मिलने के लिए ही रांची आया है। मौलाना आजाद की उत्सुकता बढ़ी और उनके पूछने पर उसने बतलाया कि वह एक निहायत गरीब और साधारण आदमी है। वह पैदल चलकर कंधार से क्वेटा तक आया। वहां उसे अपनी तरफ के कुछ व्यापारी मिल गए। जिन्होंने किसी तरह उसे आगरा भिजवा दिया। आगरा से वह फिर पैदल चलकर रांची पहुंचा। उसकी इन बातों को सुनकर मौलाना काफी द्रवित हो उठे। उन्होंने जब उससे इतना कष्ट उठाकर रांची आने का कारण पूछा, तब उसने कहा कि पवित्र कुरआन की कुछ व्याख्या सुनने के लिए उनके पास आया है। वह व्यक्ति कई दिनों तक रांची में मौलाना आजाद के साथ रहा। लेकिन एक दिन अचानक वह बिना किसी पूर्व सूचना के वापस चला गया। मौलाना को इसका काफी दुख हुआ। मौलाना ने तरजुमानुल कुरआन उसी को समर्पित कर दिया।

 गोशाला में दिया अंतिम भाषण

रांची में नजरबंद रहते हुए भी मौलाना आजाद की राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां ठंडी नहीं पड़ी थी। मौलाना केवल तकरीर (खुतबा)ही नहीं करते थे। लोगों में आजादी का जोश तो भरते ही थे, शिक्षा को लेकर अपनी चिंता को भी यहां परवाना चढ़ाया। वे हर जुमे को तकरीर  करते थे। नमाज के बाद मस्जिद में हिंदू भी मौलाना का भाषण सुनने के लिए आते थे। रांची के कुछ मुसलमानों ने विरोध प्रकट किया कि ये लोग मस्जिद में क्यों आ जाते हैं? उन लोगों की आपत्ति सुनकर मौलाना ने ‘जामिल सवाहिदÓ नाम की किताब लिखी। यह हिंदू मुस्लिम एकता की बेजोड़ पुस्तक मानी जाती है। रांची के गजनफर मिर्जा, मोहम्मद अली, डा. पूर्णचंद्र मित्र, देवकीनंदन प्रसाद, ङ्क्षहदू महासभा के गुलाब नारायण तिवारी, कांग्रेसी नेता नागरमल मोदी, रंगलाल जालान, रामचंद्र सहाय आदि उनसे अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और आजादी पर चर्चा करते थे। 1919 में रांची गोशाला में गोपाष्टमी मेला लगा था। दो नवंबर को अपना अंतिम भाषण दिया।  उस दिन रांची गोशाला, पिंजरापोल में हिंदू-मुसलमानों की इतनी सम्मिलित भीड़ थी, जैसा रांची के इतिहास में पहले कभी भीड़ नहीं जुटी थी। 31 दिसंबर को बिहार-उड़ीसासरकार ने नजरबंदी से रिहाई का हुक्म जारी किया। एक जनवरी, 1920 को उन्हें मुक्त किया गया।

 समर्पण

संभवत: दिसंबर 1918 ई की घटना है जब मैं रांची में नजरबंद था। रात्रि की नमाज से निवृत्त होकर मस्जिद से निकला तो मुझे महसूस हुआ कि कोई व्यक्ति मेरे पीछे आ रहा है। मुड़कर के देखा तो एक आदमी कंबल ओढ़े खड़ा था:

आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं?

हां श्रीमान्। मैं दूर से आया हूं।

कहां से?

सीमा पार से।

यहां कब पहुंचे?

आज संध्या समय पहुंचा। मैं अत्यंत निर्धन आदमी हूं। कंधार से पैदल चलकर कोएटा पहुंचा। वहां अपनी जन्मभूमि के ही कुछ व्यापारी मिल गए थे। उन्होंने मुझे नौकर रख लिया और आगरा पहुंचा दिया। आगरे से यहां तक पैदल चलकर आया हूं।

खेद है तुमने इतना कष्ट सहन क्यों किया?

इसलिए कि कुरान-शरीफ के कुछ अंशों को समझ लूं। मैंने ‘अल-हिलालÓ और ‘अल-बलागÓ का एक-एक अक्षर पढ़ा है।

यह व्यक्ति कुछ दिनों तक मेरे पास ठहरा और फिर अकस्मात वापस चला गया। वह चलते समय मुझसे इसलिए नहीं मिला कि उसे आशंका थी कि कहीं मैं उसे वापसी के खर्चे के लिए रुपया न दूं और वह नहीं चाहता था कि इसका भार मुझ पर डाले। उसने निश्चय ही वापसी में भी अपनी यात्रा का बड़ा भाग पैदल तय किया होगा।

मुझे उसका नाम याद नहीं। मुझे यह भी ज्ञात नहीं कि वह जीवित है या नहीं, यदि मेरी स्मरण-शक्ति ने धोखा न दिया होता तो मैं यह पुस्तक उसके नाम समर्पित करता।

अबुल कलाम

कलकत्ता, 12 दिसंबर, 1932

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इमाम-उल-हिंद से, साभार।

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