गांधी की संवाद नीति…खादी

0

उमंग कुमार/

एक बार इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने  महात्मा गांधी को ‘आधा नंगा फ़कीर’ (half-naked Fakir) कहा था. चर्चिल  के इस उपेक्षित भाव को भी गांधी ने बहुत सकारात्मक तौर पर देखा. शायद इसलिए कि चर्चिल वही देख और बोल रहे थे जो गांधी चाहते थे.

वर्ष 1930 के गांधी के दांडी मार्च से बौखलाए चर्चिल और पूरी दुनिया के लिए यह पचाना मुश्किल हो रहा था कि कैसे अक्टूबर की हड्डी गला देने वाली ठंढ में एक भारतीय बहुत ही कम खादी के कपड़े पहने पानी के जहाज से इंग्लैण्ड की धरती पर उतर रहा है. उधर गांधी दुनिया को बताना चाह रहे थे कि अब हर भारतीय के मन स्वावलंबन और आत्मसम्मान की भूख बढ़ चुकी है.

दक्षिण अफ्रीका में गांधी अहिंसात्मक विरोध के पक्षधर नेताओं के साथ.

वीआर देविका जिन्होंने महात्मा गाँधी और उनके संवाद की रणनीति पर अध्ययन किया है, कहती हैं कि गांधी ने खादी को आज़ादी की लड़ाई में हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. इंग्लैण्ड के सरज़मीं पर कम कपड़ों में गांधी के पहुँचने को, देविका मन का शरीर पर नियंत्रण के अद्भूत उदाहरण  के तौर पर देखती हैं.

जब गांधी 1915 में भारत आये तो अंग्रेजों के कपड़े का उद्योग चरम पर था. अंग्रेज भारत से कच्चा माल ले जाकर कपड़े तैयार करते थे और पुनः भारत में ही वे इन तैयार कपड़ो को बेचते थे. स्थानीय उद्योग बर्बाद हो चुका था. स्थानीय लोग हद तक परेशान थे.

वैसे तो स्वदेशी आन्दोलन पहले से चल रहा था पर गांधी को इसकी गंभीरता का एहसास पहले देश भ्रमण के दौरान हुआ जो उन्होंने स्वत्रंत्रता की लड़ाई में पूरी तरह उतरने से पहले किया था.

देश में आम लोगों की स्थिति देखकर उन्हें खादी ही वह कारगर हथियार दिखा जिससे वे दोनों पक्षों, शासक और शासित, से जरुरी संवाद कर सकते थे. एक तरफ स्थानीय खादी को बढ़ावा देना गांधी को अंग्रेजी उद्योग को तबाह करने का अचूक अहिंसात्मक हथियार दिखा. वहीं दूसरी तरफ भारतीय लोग जो धर्म और जात-पात में बंटे हुए थे, उनको जोड़ने का भी एक सटीक नुस्खा लगा. स्थानीय लोगों को रोजगार इत्यादि जैसे गौण फायदे तो थे ही.

इसका एक उदहारण चंपारण सत्याग्रह के समय दिखता है. गांधी जब चंपारण गए तो साबरमती आश्रम के चलन के अनुसार वहाँ भी खादी ही पहना. इस पर उस समय के एक पत्रकार जिसका नाम था इरविन, उसने दी पायनियर अखबार   में महात्मा गाँधी पर नौटंकी करने का आरोप लगाते हुए एक पत्र लिखा कि वो आम जनता को मूर्ख बनाने के लिए ऐसा कर रहे हैं. जबकि सत्य यह है कि हर पढ़ा-लिखा रईस भारतीय औरों से खुद को उत्तम समझने के लिए पश्चिमी संस्कृति में प्रचलित कपड़े ही पहनता है.

इसके जवाब में महात्मा गाँधी का एक पत्र 30 जून, 1917 को इसी अखबार में प्रकाशित हुआ. उन्होंने लिखा कि वो पहनावे के प्रभाव से अब भली-भांति वाकिफ हुए हैं और इसीलिए तय किया है कि अब खुद से या अपने साथियों के  बुने हुए खादी ही पहनेंगे. जो  पूर्णतः स्वदेशी होगा. इरविन के पत्र का हवाला देते हुए गांधी ने आगे लिखा कि लेखक यह मानते हैं कि मैंने लोगों पर तत्कालीन प्रभाव जमाने के लिए एक खास किस्म का कपड़ा पहना है. जबकि वास्तविकता कुछ और है. मैंने यह राष्ट्रीय वस्त्र इसलिए पहना क्योंकि एक भारतीय बनने का सबसे अच्छा तरीका भी यही है. मैं मानता हूँ कि अंग्रेजी तरीके का कपड़ा पहनना हमारे पतन और कमजोरी को दर्शाता है. उसको पहनकर हमलोग एक राष्ट्रीय पाप कर रहे हैं क्योंकि साथ में हमलोग उस कपड़े को नजरअंदाज कर रहे हैं जो भारतीय परिवेश के अनुकूल है. खादी सस्ता, साधारण और साफ़ सफाई के हिसाब से भारतीय परिवेश के लिए एकदम अनुकूल है.

भारतीय होने और इस पर गर्व करने के इस एहसास की उस समय सख्त जरुरत थी. इसीलिए धीरे-धीरे गांधी खादी को आत्मसात करते चले गए. वर्ष 1919 में ‘दी आल इंडिया स्पिनर्स एसोसिएशन’ की स्थापना की गई. इससे भी स्वदेशी आन्दोलन को फायदा हुआ. 1920 आते आते खादी और गाँधी एक हो गए. उन्होंने कहा था कि अंग्रेजो ने भारत पर कब्ज़ा नहीं किया है बल्कि हमलोगों ने उन्हें ऐसा करने दिया है. उनका तात्पर्य था कि अंग्रेज भारत पर शासन अपनी ताकत से नहीं बल्कि हमारी कमजोरी की वजह से कर रहे हैं.

जमनालाल बजाज के सबसे छोटे बेटे राम कृष्ण बजाज के साथ गांधी 1945 में बंगाल की यात्रा पर. बजाज परिवार ने गांधी के खादी इस्तेमाल के आह्वान को समर्थन दिया था. तस्वीर फोर्ब्स इंडिया से साभार

देविका बताती हैं कि गांधी 3 सितम्बर 1921 को उस समय के कलकत्ता से मदुरई आये जहां उन्होंने बहुत बड़े स्तर पर लोगों को धोती में देखा. उनलोगों के पास इतना कपड़ा नहीं था कि वे अपना पूरा तन ढँक सकें. वहीं गांधी ने भी तय किया कि वो भी अब उतना ही कपड़ा पहनेंगे जिससे उनके शरीर का जरुरी हिस्सा ढँक जाए. इस तरह गांधी ने अपना शरीर ढंकने के लिए कम से कम कपड़े का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. यह सिलसिला ऐसे ही 1948 तक चला.

इसके पहले उन्होंने 8 दिसंबर 1921 को यंग इंडिया  में लिखा कि चरखा देश की समृधि साथ ही स्वतंत्रता का प्रतीक है. गांधी के आह्वान पर हर स्वतंत्रता सेनानी चरखा का इस्तेमाल कर खुद के लिए कपड़ा तैयार करने लगा.

यह सब गांधी इसलिए कर रहे थे ताकि देश के आम जन के मुद्दे उठाकर उन्हें बड़े लक्ष्य (स्वतंत्रता संघर्ष) में शामिल कर पायें. यह तरीका सफल भी हुआ. खादी, चंपारण या खेड़ा सत्याग्रह के मुद्दे गांधी को लोगों से जोड़ने का एक तरीका था. संवाद के लिए सही समय पर सही मुद्दा उठाना.

खासकर खादी जिसका गौरवशाली इतिहास रहा था. हर घर इससे जुड़ा था. वह तो राजनितिक हथियार बनने के लिए तैयार बैठा था बस चाहिए था कोई शख्स जो इसकी ताकत समझे. गांधी ने इसे समझा और ऐलान कर दिया कि खादी महज़ एक कपड़ा नहीं है बल्कि एक जीवन शैली है. महात्मा गांधी ने 1927 में खादी यात्रा भी निकली.

खादी के ऐतिहासिक महत्व के बारे में दस्तावेज बताते हैं कि प्राचीन भारत में चरखा हर घर का हिस्सा होता था. मौर्य वंश और बाद के शासन में भी खादी की बहुत अमीर परंपरा रही. विदेशी पर्यटक जैसे मार्को पोलो ने 1228 में भारतीय कपड़े की गुणवत्ता के बारे में लिखा था.

लेकिन घर-घर की इस खूबसूरत परंपरा को नज़र लगनी शुरू हुई जब सोलवहीं शताब्दी में पुर्तगाली, फ़्रांसिसी फिर अंग्रेजों ने  भारतीय जमीन पर आना शुरू किया.

अंग्रेजों ने यहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी बनाई जिसका मुख्य उद्देश्य यहाँ से कच्चा माल ले जाना था. इसमें कपड़ा उद्योग भी उनके निशाने पर था. अंग्रेजों ने अपने उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए भारतीय कपड़ा उद्योग (खादी) को बर्बाद कर दिया.

वर्ष 1866 में जॉन फोर्ब्स वाटसन नाम के एक व्यक्ति ने एक कपड़े के संग्रहालय की शुरुआत की थी जिसमें 7,000 से अधिक वैसे  कपड़े थे जो भारतीय लोग पहना करते थे. बाद में यह सब एक पुस्तक की शक्ल में आया जिसका नाम था ‘दी टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर एंड द कॉस्टयूमस ऑफ़ दी पीपल ऑफ़ इंडिया.’ इसी का फायदा उठाकर अंग्रेज़ी मिलों ने अपने सबसे बड़े बाज़ार के लिए कपड़ा बनाना शुरू किया.

इसके असर को समझने के लिए यह आंकड़ा देखा जा सकता है. वर्ष 1849 में अंग्रेजी उद्योग जो दो मिलियन पौंड के बराबर था. लगभग 40 साल बाद यह करीब 27 मिलियन पौंड का हो गया.

एक तरफ जब अंग्रेजी कपड़ों का उद्योग दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था वहीं भारतीय उद्योग रसातल में जा रहा था. इससे सबसे अधिक प्रभावित देश के बुनकर और इस काम में लगे सामान्य मजदूर हो रहे थे. स्थिति इतनी बदतर हुई कि 1891 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश के लोगों से यह अपील की कि वे सिर्फ स्वदेशी सामान ही खरीदें.

लेकिन खादी ने स्वतंत्रता आन्दोलन लड़नी तब शुरू की जब अंग्रेजों ने बंगाल का 1903 में विभाजन कर दिया. कपड़े के व्यापार के लिए मशहूर बंगाल, पूर्वी और पश्चिम बंगाल में बंट गया. उसी समय दादा भाई नैरोबी ने दूसरा स्वदेशी आन्दोलन (पहला उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी दशक में चला था) की शुरुआत की. बीसवीं सदी के शुरुआत में ही बंगाल अंग्रेजों की खिलाफत का गढ़ बना गया था. जिसमे अबके बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश इत्यादि शामिल थे. वैसे तो अंग्रेजों ने बहाना बनाया कि बंगाल के बंटवारे के पीछे प्रशासन की सहूलियत उनका मुख्य उद्देश्य था. पर धार्मिक आधार पर बांटना उनकी नियत को स्पष्ट कर रहा था.

इसी के विरोध में दूसरा स्वदेशी आन्दोलन शुरू हुआ जिसमें अंग्रेज़ी सामानों का बहिष्कार शुरू हुआ. इस आन्दोलन में विदेशी कपड़ों का बहिष्कार शुरू हुआ. 1905 आते आते लोगों में इसको लेकर गुस्सा भड़कने लगा था जिसमे अगंरेजी मिलों में बने कपड़े जलाए जाने लगे.

वर्ष 1915 में महात्मा गांधी के भारत आने से भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को और धार मिली. इन्होने बड़ी जल्दी खुद को खादी के प्रबल समर्थक के तौर पर स्थापित किया.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here