क्या भाजपा अलाकमान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से असहज है!

0

सामान्यतः भारत में किसी सत्तासीन नेता को सड़क पर उतरकर काम करते हुए नहीं देखा जाता. लेकिन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने शासन के दूसरे दशक में जनता के बीच जाने का बहाना ढूंढते दिख रहे हैं.

पहले तो नर्मदा यात्रा के नाम पर. करीब छः महीने चले और हाल ही में संपन्न इस लोक यात्रा में मुख्यमंत्री विभिन्न जगहों पर जा जाकर इस यात्रा में शामिल होते रहे. जरा सोचिये कि तीन बार के मुख्यमंत्री को नदी बचाने के लिए विपक्ष की तरह जनता के साथ अभियान छेड़ने की जरुरत क्यों पड़ी? दूसरे, हाल ही में विपक्ष की भूमिका अदा करते हुए राज्य के मुख्यमंत्री को जनता के बीच जाना पड़ा जब उनकी खुद की पुलिस ने मंदसौर में आन्दोलनरत कई किसानों को गोली मार दी. जिसमे छः की जान चली गई.

विपक्ष अपनी जगह का सही इस्तेमाल न कर ले, इसको देखते हुए आनन-फानन में शिवराज को उपवास/ भूख हड़ताल पर बैठना पड़ा. अलबत्ता उसी हड़बड़ी में उपवास ख़त्म भी किया गया. बताया यह गया कि उपवास ख़त्म करने का आग्रह उन्ही हताहत किसानों  के परिवार वालों ने किया है. चौहान को इस मुद्दे पर ‘घनघोर चुप्पी’ साधे आलाकमान से मिलने के लिए दिल्ली पहुँच कर रिपोर्ट करने की खबर भी उड़ी.

खैर भारत जैसे देश में एक मुख्यमंत्री को बार बार जनता के बीच जाने की जरुरत क्यों हो रही है? क्या चौहान को कोई डर सता रहा है? क्या इसका राज आलाकमान के ‘घनघोर चुप्पी’ में छिपा है या अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनाव में? वैसे इस प्रस्तावित चुनाव और ‘घनघोर’ चुप्पी’ में भी गहरा सम्बन्ध जान पड़ता है.

करीब दो महीने पहले मध्य प्रदेश सरकार के एक अधिकारी ने सौतुक से बातो ही बातों में बताया था कि कौन जाने कल चौहान को दिल्ली से बुलावा आ जाए. माने यह कि अन्दर ही अन्दर शिवराज सिंह चौहान को केंद्र के कैबिनेट का हिस्सा बनाये जाने की बात चल रही है.

अगर ऐसा हुआ तो एक समय नरेन्द्र मोदी के विकल्प के रुप में देखे जाने वाले शिवराज को अपने उसी प्रतिद्वंदी को रिपोर्ट करना होगा. पर किसी मंजे हुए राजनितिक खिलाड़ी के लिए यह सब बहुत मायने नहीं रखता. जो मायने रखता है वह ये कि अगर उनको केंद्र सरकार का हिस्सा बनाने के लिए बुलाया गया तो शिवराज का मध्य प्रदेश में बना बनाया खेल बिगड़ जाएगा. यह लगभग मानी हुई बात है कि मजबूत विपक्ष के न होने से राज्य में अगली सरकार भी भाजपा की होने वाली है. ऐसे में वहाँ से हटके केंद्र में आने का मतलब नहीं बनता. खासकर तब जब सारे फैसले प्रधानमन्त्री कार्यालय में हो रहे हों और बतौर केंद्रीय मंत्री आपका मूल काम लोगों के ट्वीट पढ़कर उसका समाधान निकालना भर हो.

अगला सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश से हटाकर केंद्र में क्यों लाना चाहेंगे? इसका जवाब इन दो-तीन सवालों में छिपा है. सनद रहे कि नरेन्द्र मोदी भाजपा के कुछ चुनिन्दा सफल मुख्यमंत्री के तौर पर देखे जाते हैं. कार्यकाल और तथाकथित विकास के मुद्दे पर. ऐसे में क्या नरेन्द्र मोदी भाजपा के तीन बार के सफल मुख्यमंत्री अपने एक पुराने विकल्प को चौथी बार मुख्यमंत्री बनने देना चाहेंगे? हाल-फिलहाल के वर्षो में मध्यप्रदेश जीडीपी वाले विकास के मामले में  भी अग्रणी राज्य रहा है. ऐसे में क्या गुजराती आलाकमान भाजपा के सबसे सक्षम मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज को देखना चाहेगा?

इससे भी बड़ा सवाल कि क्या शिवराज सिंह चौहान अपने पुराने कर्म, खुद को मोदी के विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करना, लालकृष्ण आडवानी और मोदी के बीच के संघर्ष के समय आडवानी के खेमें में शामिल होने की कोई कीमत चुकायेंगे? मार्गदर्शक मंडल में शामिल होकर खुद आडवानी इसकी कीमत चुका रहे हैं?

सारे इशारे एक ही तरफ जाते हैं और बताते हैं कि शिवराज का खेल बिगड़ता दिख रहा है. यही वजह है कि मध्य प्रदेश का सरकारी खेमा खुद को इसके लिए तैयार करता दिख रहा है.

इससे बचने के लिए ही शायद शिवराज  जनता से खुद को अधिकतम जोड़ना चाहते हैं. अलबत्ता भाजपा के अभी के सरंचना को देखें जिसमे मोदी और शाह के सिवा कोई दूसरा नहीं दीखता और अगर इनदोनों ने ठान लिया है तो शिवराज का कुछ भी करना बेमानी साबित होगा. इसका एहसास चौहान को भी होगा ही होगा. इसीलिए ये आलाकमान के किसी भी संभावित परिवर्तन को महंगे सौदे के तौर पर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. जनता के नजरिये से. ताकि राज्य के लोग और संभव हो तो संघ परिवार यह सोचें कि पार्टी ने शिवराज को राज्य से हटाने का फैसला सही नहीं है या था. तत्कालीन स्थिति में शिवराज के पास यही विकल्प दीखता है.

लेकिन सौतुक का नजरिया यह है कि मोदी-शाह अगर वेंडेटा पॉलिटिक्स पर उतारूँ हैं तो महंगे सस्ते सौदे के चक्कर में तो कदापि नहीं जायेंगे. वैसे भी उनकी पार्टी तो आजकल केंद्र से लेकर नगरपालिका तक के चुनाव में  मोदी का चेहरा इस्तेमाल कर रही है. फिर मध्य प्रदेश अपवाद क्यों हो?

सौतुक का यह भी मानना है कि ऐसे में मुख्यमंत्री को ऐसे छोटे मोटे सौदे के चक्कर में न पड़कर लम्बी पारी खेलने की तैयारी करनी चाहिए. राजनीति के बेसिक पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और खुद को वर्तमान के विकल्प के तौर पर दिखाना चाहिए. कहीं जो उनके पार्टी को तत्काल नेतृत्व के विकल्प की जरुरत पड़ी तो आनायास ही लोगों की नजर उनपर आ टिके. इसके लिए उनको अलग तरह की राजनीति करनी पड़ेगी, जो वह करते नहीं दिख रहे हैं. हाल फिलहाल के मध्य प्रदेश की घटनाओं को देखें तो आप पायेंगे कि शिवराज नरेन्द्र मोदी के गुजरात-काल का कार्बन कॉपी बनने के लिए प्रयासरत हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here