अपनी हवा में मौजूद कातिल पीएम 2.5 को जानिये…

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सौतुक डेस्क/

अभी दिल्ली की हवा देश में हो रही चर्चा के केंद्र में है. इसे दिल्लीवासियों का सौभाग्य कहिये या दुर्भाग्य पर आजकल इन्हें गैस चैम्बर जैसा कुछ अनुभव करने को मिल रहा है. आधे घंटे सड़क पर खड़े होने पर आँखे जलने लगती हैं, दम घुटने लगता है. कुछ लोग तो सीने में दर्द इत्यादि की भी शिकायत करने लगे हैं. सौभाग्य यह कि इस तरह से इतिहास के चर्चित गैसचेंबर का कुछ कुछ अनुभव मिल रहा है. आगे जब कभी गैसचेंबर की बात होगी तो दिल्लीवासी शुन्य में बात नहीं करेंगे. दुर्भाग्य यह कि आजकल दिल्लीवासी इस जहरीली हवा को झेलने के लिए मजबूर हैं. बहरहाल, इस गैसचेम्बर का मुख्य खिलाड़ी है पीएम 2.5. हवा में इसकी मात्रा 500 के करीब पहुँच चुकी है. हवा में इसकी 300 की मात्रा खतरनाक मानी जाती है.

यह सवाल जेहन में आता होगा कि आखिर क्या है यह पीएम 2.5. किसी साई-फाई फिल्म के नाम से मिलते जुलते इस पीएम 2.5 ने लाखों लोगों की जान ले ली है और प्रत्येक साल इसके शिकार लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है.

पीएम 2.5 हवा में पाए जाने वाले वे कण हैं जिनको अंग्रेजी में पार्टिकुलेट मैटर (PM) कहते हैं. यह हवा में मौजूद ठोस, द्रव, गैस से मिलकर बना होता है. इनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से भी छोटा होता है. यानी सर के बाल के कुल मोटाई का महज 3 प्रतिशत. इन अति सूक्ष्म कणों  के लिए सामान्यतः अंग्रेजी में PM 2.5 लिखा जाता है. इन्हें सिर्फ इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से देखा जा सकता है.

इनको अंग्रेजी में फाइन पार्टिकल्स भी कहा जाता है जो कई स्रोतों से हवा में आते हैं. जैसे कोयले से चलने वाले बिजली के सयंत्र, सड़क पर चलते वाहन, हवाई जहाज, घरेलू कार्यों के लिए लकड़ी जलाना, कृषि के अवशेष को जलाना, ज्वालामुखी से और धूल वालों आंधी से भी.

ये बारीक या अतिसूक्ष्म कण भी दो तरह से हमारी हवा का हिस्सा बनते हैं. कुछ तो सीधे हवा में आ जाते हैं और कुछ हवा में ही तैयार होते हैं. जब एक गैस का हवा में मौजूद दूसरे गैस इत्यादि से रिएक्शन होता है. जैसे गैस के रूप में सल्फर डाईऑक्साइड जो विद्युत् सयंत्र से निकलता है और हवा में मौजूद ऑक्सीजन तथा छोटे-छोटे पानी की बूंदों से मिलकर ससुल्फ्युरिक एसिड बनाता है. इस तरह हवा में एक किस्म के अतिसूक्ष्म कण तैयार होते हैं.

सवाल यह है कि यह पीएम 2.5 इतना खतरनाक क्यों है? वजह यह है कि यह हवा में मौजूद हमारे स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक कण है. चूंकि ये कण बहुत छोटे और हल्के होते हैं इसलिए  हवा में उड़ते रहते हैं. आपने देखा होगा धूल के कण सामान्यतः कुछ देर में सतह पर बैठ जाते हैं. हवा में उड़ते रहने की वजह से ये सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. इनका आकार  2.5 माइक्रोमीटर से भी कम होता है तो ये नाक, या गले में फंसते नहीं है बल्कि फेफड़े इत्यादि में आसानी से प्रवेश पा जाते हैं. इतना ही नहीं, इसके भी आगे जाकर यह छोटे कण रक्तवाही तंत्र में प्रवेश कर जाते हैं.

इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि जब बाहरी प्रदूषित तत्व आपके फेंफड़े और धमनियों का हिस्सा बनेगे और वहाँ अधिक मात्रा में ज़मा होंगे तो आपके स्वास्थ्य पर इसका क्या असर होगा. इसकी वजह से तमाम बड़ी बीमारियाँ जैसे सांस का रोग, दम्मा इत्यादि होता है.  इससे होने वाले रोगों में कैंसर भी शामिल है.

 

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