‘अस्मितावादियों का सिर्फ़ एक उद्देश्य- वामपंथ को गाली देना’

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यदु कृष्णन, केरल के पहले दलित पुजारी

आशीष मिश्रा/

अस्मितावादियों का सिर्फ़ एक उद्देश्य होता है – वामपंथ को गाली देना। और ऐसा करते हुए वे यह तक भूल जाते हैं
कि कौन स्वाभाविक दोस्त है और कौन जन्मजात दुश्मन। मैं फ़ेसबुक पर देखता हूँ कि वे किसी बात में वैसे ही दिमाग नहीं लगाते जैसे संघी। मार्क्सवादियों के कहीं कमजोर पड़ते ही वे संघियों से ज़्यादा सक्रियता से हमला करते हैं।

लेखक

कुछ दिन पहले केरल की मार्क्सवादी सरकार ने देवस्वम बोर्ड के मंदिरों में पुजारी नियुक्त करने के लिए परीक्षा लेना शुरू किया और उसमें आरक्षण-व्यवस्था लागू कर दिया।दो ही लोगों ने इसका विरोध किया – एक अस्मितावादियों ने और दूसरे संघियों ने। यह आश्चर्यजनक है कि दोनों का हित एक ही विषय पर टकरा गया !

कहीं किसी ने लिख दिया कि यह ब्राह्मणों की साज़िश है। दलितों को धर्म में उलझाया जा रहा है। उन्हें वैज्ञानिक शिक्षा से दूर करने का प्रयास है। यह बात घुस गयी दिमाग में कि यह ब्राह्मणों की साज़िश है। फिर दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। कुछ वामपंथी साथी भी वही रटने लगे।

उन्हें पता ही नहीं कि देवस्वम बोर्ड चीज़ क्या है !

देवस्वम बोर्ड केरल सरकार का वह क्रांतिकारी काम है जिसमें वहाँ के वामपंथी सरकार ने वहाँ के मंदिरों को सरकार के अधिकार में कर लिया। इसे ‘हिन्दू रिलीज़न एंड चेरिटेबल एंडोवमेंट बिल’ कहते हैं। जब इस बिल को प्रस्तुत किया गया था केरल में उस समय संघियों ने कितना उत्पात मचाया था, थोड़ा यह इतिहास पता करना चाहिए। इसे जानने के लिए एक किताब पढ़िएगा – ”राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रस्ताव: 1950 -2007.”

यह काम इस देश में कोई और सरकार नहीं कर सकती। अस्मितावादी जिन भी पार्टियों की तरफ़दारीकरते रहते हैं उनसे अपेक्षा करते हैं ?

कहीं किसी ने लिख दिया कि यह ब्राह्मणों की साज़िश है। दलितों को धर्म में उलझाया जा रहा है। उन्हें वैज्ञानिक शिक्षा से दूर करने का प्रयास है। यह बात घुस गयी दिमाग में कि यह ब्राह्मणों की साज़िश है। फिर दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। कुछ वामपंथी साथी भी वही रटने लगे।

पहले तो यह समझिए कि मार्क्सवादी सरकार ने इस क़दम से रास्ता सुझाया है कि पुरोहित होने के लिए जाति नहीं गुण की ज़रूरत है और इसका परीक्षण पंडित लोग नहीं, सरकार करेगी। दूसरे न सिर्फ़ सार्वजनिक बल्कि सामुदायिक विषयों में भी आरक्षण लागू हो सकता है।

इसके लिए ज़रूरी था कि उन सामुदायिक संस्थाओं को सरकार के अधीन किया जाए। मार्क्सवादी सरकार ने उच्च वर्ण के लोगों को ताक पर रखते हुए यह आत्मबल दिखाया। आप किसी और विचारधारा से यह अपेक्षा कर सकते हैं ?

यह सूझ मार्क्सवादियों को अंबेडकर से ही आई। ‘जाति-भेद का उच्छेद’ में एक अध्याय है- ‘पुरोहित-शाही पर नियंत्रण’। उसमें डॉ अंबेडकर जो लिखते हैं उसे जस-का-तस कोट कर रहा हूँ-

“अच्छा हो कि हिंदुओं में से पुरोहित-शाही की समाप्ति कर दी जाए। परंतु यह बात असंभव जान पड़ती है। इसलिए पुरोहित का पद परंपरागत नहीं रहने देना चाहिए। प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को जो अपने आपको हिन्दू कहता हो उसे पुरोहित बनने का अधिकार होना चाहिए। यह निश्चित करना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति तबतक पुरोहित नहीं बन पाएगा जबतक वह सरकार द्वारा निर्धारित परीक्षा पास नहीं करता या जबतक उसके पास पुरोहित के रूप में काम करने की सरकार द्वारा मिली हुई सनद नहीं होगी।

जिस पुरोहित के पास सनद न हो उस पुरोहित के द्वारा करवाया हुआ कोई संस्कार क़ानून के सामने मान्य न हो और सनद के बिना संस्कार करवाने वाले को दंडित किया जाए। पुरोहित भी दूसरे लोक सेवकों की तरह देश का नौकर हो, उसे राज्य से वेतन मिले, और दूसरे नागरिकों के साथ देश के साधारण राज नियम के अधीन होने के अतिरिक्त वह अपने आचार, विश्वास और पूजा-पाठ के विषयों में राज्य नियंत्रण के अधीन हो।”

अस्मितावादियों को आप संघियों से अलग मत समझिए। दोनों का काम हवाट्स एप यूनिवर्सिटी से चलता है। उन्हें डॉ अंबेडकर को पढ़ने की क्या ज़रूरत।

उन्हें नादान दोस्त की तरह समझिए। उनके साथ खड़े होइए। वे कई ज़रूरी प्रश्न भी उठाते हैं, लेकिन जब वे आत्मघाती होने लगें तो उन्हें सचेत कीजिए। दुर्भाग्य से इधर उनमें आत्मघाती प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं।

(आशीष मिश्रा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़कर रिसर्च कर रहे हैं. अम्बेडकर नगर के रहने वाले आशीष ने दिल्ली विश्वविद्यालय और काशी  हिन्दू विश्वविद्यालय से पढाई पूरी की है.)

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