लोया के बेटे और रिटायर्ड जजों के मैदान में आने से सुप्रीम कोर्ट मामला हुआ और जटिल

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अनुज लोया

सौतुक डेस्क/

शनिवार और रविवार न्यायपालिका के मद्देनजर उठापटक वाला समय रहा. एक तरफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के न्यायाधीश ब्रिजगोपाल हरकिशन लोया की मौत को लेकर उनके पुत्र को प्रेस कांफ्रेंस करना पड़ा तो दूसरी तरफ कई सेवानिवृत न्यायधीशों ने उन चार वरिष्ठ न्यायधीशों का समर्थन किया जिन्होंने शुक्रवार को एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर सर्वोच्च न्यायालय में चल रही गड़बड़ी की तरफ इशारा किया था.

लोया के पुत्र ने प्रेस कांफ्रेंस कर रविवार को अपने पिता के मृत्यु में किसी संदेह को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में उनको प्रताड़ित करना बंद करें. यहाँ सवाल यह है कि उनको प्रताड़ित कर कौन रहा था?

जब चार वरिष्ठ न्यायधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी तो उन्होंने मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा पर आरोप लगाया था कि कई बड़े और विवादित मुद्दों को मिश्रा अपने चुने हुए न्यायधीशों को ही देते है ताकि उनके मनमाफिक फैसला आ सके. उदहारण में इन्होंने ऐसे कई फैसलों का जिक्र किया था पर जब मीडियाकर्मियों ने पूछा कि कहीं यह न्यायधीश लोया की मृत्यु से तो नहीं जुड़ा है, इस पर भी उनलोगों ने हामी में सर हिलाया.

लोया के पुत्र ने प्रेस कांफ्रेंस कर रविवार को अपने पिता के मृत्यु में किसी संदेह को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में उनको प्रताड़ित करना बंद करें. यहाँ सवाल यह है कि उनको प्रताड़ित कर कौन रहा था?

तो क्या सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायधीशों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में चल रही गड़बड़ी पर उंगली उठाने की वजह से यह परिवार प्रेस कांफ्रेंस करने को बाध्य हुआ.

रविवार को संवाददाता सम्मलेन में अनुज लोया और अन्य रिश्तेदारों ने कहा कि दिसंबर 2014 में न्यायाधीश लोया का निधन उनके लिए दुखद और निजी मामला है. अनुज ने कहा, “उनके निधन के बाद से परिवार सदमे में है. हम उनकी मौत के मामले में कोई जांच नहीं चाहते. उनके निधन में कोई संदेह नहीं है”

‘द हिन्दू’ से साभार

सनद रहे कि लोया का परिवार मीडिया के सामने तभी आया जब सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने एक संवाददाता सम्मेलन में प्रधान न्यायाधीश पर कुछ मामलों के बंटवारे को लेकर असहमति जाहिर की थी. यह मालूम होना चाहिए कि भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ, जब सभी वरिष्ठ न्यायधीश इस तरह अपना विरोध दर्ज कराने के लिए मीडिया के सामने आये. अपने प्रेस कांफ्रेंस में इन चारों ने कहा कि उस दिन वे सुबह मुख्य न्यायधीश से भी मिले पर इसका कुछ असर नहीं हुआ. मीडिया से बात करने वालों में न्यायमूर्ति जे चेलामेस्वर, कुरियन जोसफ, मदन लोकुर और रंजन गोगोई शामिल हैं.

सोचने की बात यह भी है कि ऐसा कोई परिवार कहता है क्या कि हमारे घर के मरे इस शख्स के मामले में जांच न हो.

मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने वालों में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीबी सावंत, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एपी शाह, मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के चंद्रू और बांबे उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एच सुरेश शामिल हैं

दूसरी तरफ अवकाश प्राप्त चार न्यायाधीशों ने रविवार को मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पत्र लिखकर कहा है कि मनमाने ढंग से कनिष्ठ न्यायाधीशों को पीठ की अध्यक्षता सौंपने से विधि शासन (रूल आफ लॉ) को खतरा पैदा होगा.

इन सेवानिवृत पूर्व न्यायधीशों का पत्र वर्तमान में चल रहे द्वन्द की स्थिति में उन न्यायधीशों की स्थिति बुलंद करता है जिन्होंने शुक्रवार को प्रेस कांफ्रेंस लिया था और सर्वोच्च न्यायालय में गड़बड़ी की तरफ उंगली उठाई थी.

मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने वालों में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीबी सावंत, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एपी शाह, मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के चंद्रू और बांबे उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एच सुरेश शामिल हैं.

इन पूर्व न्यायाधीशों अपने पत्र में लिखा है, “उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने शीर्ष अदालत की विविध पीठों में मामलों, खासतौर से संवेदनशील मामलों को बंटवारे को लेकर गंभीर मुद्दा उठाया है. उन्होंने गंभीर चिंता जाहिर की है कि मामलों का बंटवारा उचित तरीके से नहीं किया जाता है, बल्कि मनमाने ढंग से उन खास पीठों को किया जाता है, जिनकी अध्यक्षता अक्सर कनिष्ठ न्यायाधीश करते हैं। इससे न्याय-प्रशासन और विधि शासन पर घातक प्रभाव हो रहा है.”

खैर देखना यह है कि चार न्यायधीशों के प्रेस कांफ्रेंस के बाद वाली छुट्टी में यह सब हुआ है. इसका तात्पर्य यह है कि इस सप्ताह यह विवाद नया मोड़ लेने वाला है.

(एजेंसी से इनपुट के साथ)

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