न्याय तो दूर, यहाँ न्याय देने वाला संकट में है

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 उमंग कुमार/

यह किसी थ्रिलर से कम नहीं है. एक जज को अपने सहकर्मी के बेटी की शादी में जाना है. वह नहीं जाना चाहता. उसके दो सहकर्मी उसे जबरदस्ती तैयार करवाते हैं. यह शादी कहीं और नहीं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के गढ़ नागपुर में थी. उस शादी को अटेंड करने गए तीनों जज सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरते हैं. कथित तौर पर उस जज को हार्ट अटैक आता है. उस वीआईपी गेस्ट हाउस में उस बीमार जज के लिए कोई गाड़ी मौजूद नहीं होती. दो किलोमीटर दूर ऑटोस्टैंड से ऑटो बुलाया जाता है और उसी ऑटो में बीमार जज को शहर की सैर कराई जाती है. उस बीमार जज की एक अस्पताल में कुछ दवा-दारू की जाती है और फिर बड़े अस्पताल में रेफेर कर दिया जाता है. दूसरे अस्पताल में पहुँचने पर उसे मृत घोषित कर दिया जाता है. मृतक के घर वालों को बिना बताये पोस्टमार्टम करा दिया जाता है. पोस्टमार्टम का आदेश किसी ऐसे ममेरे भाई से लिया जाता है जो परिवारवालों के अनुसार मौजूद ही नहीं है. मृत्यु की खबर सुनकर घर वाले जब नागपुर आने की बात कर रहे हैं तो अचानक कोई उनको फ़ोन कर के बताता है कि वहाँ जाने की जरुरत नहीं है, मृतक के शरीर को लेकर लोग आपके घर की तरफ निकल चुके हैं. मृतक के शरीर को साथ लाने के लिए कोई नहीं आता. उसे एक एम्बुलेंस में डाल के भेज दिया जाता है. सनद रहे वह जज है. घर पहुँचने पर लोगों को लगता है कि मृतक के शरीर पर कुछ ऐसे चीजें है जो संदेह पैदा करती हैं जैसे खून के छींटे, बेल्ट गलत लगा होना इत्यादि. जब परिवारवाले इस बात को उठाते हैं तो उन्हें समझाया जाता है कि बात का बतंगड़ ना बनाएं. मामले को पब्लिक में ना ले जाएँ. मृतक का मोबाईल उनके पास नहीं मिलता. दो-तीन दिन बाद वही शख्स जिसने उन्हें नागपुर आने से मना किया था, उन्हें आकर मोबाईल लौटाता है पर उस मोबाईल से सबकुछ डिलीट किया जा चुका है. जज को शादी में ले जाने वाले दो और जज करीब महीने से ऊपर परिवार की खोज खबर नहीं लेते.

दो तीन दिन बाद वही शख्स जिसने उन्हें नागपुर आने से मना किया था, उन्हें आकर मोबाईल लौटाता है पर उस मोबाईल से सबकुछ डिलीट किया जा चुका है

इस थ्रिलर की जो सबसे अहम् जानकारी है वह यह कि मरने वाले एक सीबीआई जज बृजगोपाल हसन लोया हैं जो 2005 में हुए सोहराबुद्दीन के झूठे एनकाउंटर की सुनवाई कर रहे थे. और इस केस के कई अभियुक्तों में से एक नाम अमित शाह का भी है जो एनकाउंटर के समय गुजरात के गृहमंत्री थे. अभी देश के सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष हैं. यह रिपोर्ट अंग्रेजी की मासिक पत्रिका दी कारवां में प्रकाशित हुई है.

उस पत्रिका में मृतक के परिवार वालों के हवाले से यह भी प्रकाशित हुआ है कि लोया को अभियुक्तों के पक्ष में निर्णय सुनाने के लिए 100 करोड़ रुपये देने का ऑफर किया गया था.

लोया का मुम्बई के सीबीआई कोर्ट में तबादला हुआ था तब जब उनके पहले इस केस की सुनवाई कर रहे पुराने जज को अचानक से हटना पड़ा था. बार-बार कोर्ट में नहीं हाज़िर होने की अनुमति माँगने पर उस जज ने अमित शाह को कोर्ट में आने का आदेश दिया था उसके तुरंत बाद उस जज को हटा दिया गया था. इसके बाद लोया ने इस केस की सुनवाई शुरू की. शुरुआत में लोया ने अमित शाह को कोर्ट में हाज़िर नहीं होने की छूट दी. बात तब बिगड़ी जब 31 अक्टूबर, 2014 को इस केस की सुनवाई थी. उस कोर्ट के आसपास होते हुए भी अमित शाह ने कोर्ट में जाना जरुरी नहीं समझा. इस तरह नाराज़ जज ने अगली सुनवाई की तारीख दिसम्बर 15, 2014 दी, जिसमें अमित शाह को आने को कहा गया. दिसम्बर 1 को उनके परिवार को बताया गया कि हार्ट अटैक की वजह से लोया का नागपुर में देहांत हो गया है. इसके करीब एक महीने के अन्दर इस मामले की सुनवाई करने आये नए जज ने सबूतों के अभाव में अमित शाह को बरी कर दिया.

परिवार वालों ने इसमें इन्क्वायरी  कमीशन से जांच करवाने की मांग की थी पर उसपर कोई सुनवाई नहीं हुई

परिवार वालों के अनुसार लोया के परिवार में किसी को ऐसी कोई बिमारी नहीं रही है. लोया रोज शारीरिक फिटनेस पर ध्यान देने वाले पचास से कम उम्र के फुर्तीले जवान थे. इस पत्रिका के अनुसार, परिवार वालों ने इसमें इन्क्वायरी कमीशन से जांच करवाने की मांग की थी पर उसपर कोई सुनवाई नहीं हुई.

वैसे तो इस तरह की खबरें जब प्रकाशित होती हैं तो एक बड़ा मुद्दा बनता है पर इस बार किसी अन्य मीडिया संस्थान ने इसको बड़े स्तर पर फॉलो नहीं किया है. दूसरे किसी राजनितिक दल ने भी इस मुद्दे को नहीं उठाया है. यह भी जानते हुए कि दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र में उसी सत्तारूढ़ दल की सरकार है, इस केस की सुनवाई करते हुए जजों की स्थिति देखकर इसमें शामिल नहीं होना चाहेगा. इसके बाद भी जांच के कुछ बड़े मुद्दे हैं जो देखना है कि किसी मुकाम पर पहुंचते हैं या सत्ता के कब्र में दफ़न हो जाते हैं.

घटनाएं जो संदेह पैदा करती हैं

  • एक आरएसएस कार्यकर्ता ईश्वर बहेटी जिसने परिवार वालों को लोया की मृत्यु के बारे में बताया था. जिसने बताया था कि आपलोगों को नागपुर आने की जरुरत नहीं है मृतक के पार्थिव शरीर को उनके गाँव ले जाया जा रहा है. इसी ने उनलोगों को लोया का मोबाईल भी लौटाया था वह भी दो-तीन दिन बाद.
  • पोस्टमार्टम किसी ममेरे भाई के परमिशन पर किया गया था जबकि उस शहर में लोया का कोई ऐसा रिश्तेदार मौजूद ही नहीं था.
  • पोस्टमार्टम में बताया गया कि लोया की मृत्यु साढ़े छः बजे के करीब हुई. पर घर वालों को उनके मरने की खबर पांच बजे दी जा चुकी थी.
  • लोया के परिवार वालों को बताया गया कि उनकी मृत्यु हार्ट अटैक से हुई थी जबकि मृतक के शरीर पर खून के धब्बे थे जो पोस्ट मार्टम विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसा नहीं होता. पोस्टमार्टम से खून नहीं बाहर आता.
  • जज को सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरने के बाद भी एक ऑटो में इलाज के लिए ले जाना.

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