जियो बनाम बीएसएनएल: मोदी के विकास की वास्तविक तस्वीर

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शिखा कौशिक/

यह तस्वीर याद है. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुकेश अम्बानी के जियो के प्रचार करते हुए अखबारों के पहले पन्ने पर दिखे थे. इसी दो तीन साल में इस कंपनी के 27.5 करोड़ ग्राहक हो चुके हैं.

अब कुछ सत्य और आंकड़ो के सहारे आपको एक दूसरी तस्वीर की कल्पना करनी है. देश की सरकारी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी भारत संचार निगम लिमिटेड जिसे संक्षेप में बीएसएन एल (BSNL) कहा जाता है. एक समय देश के मोबाईल उपभोक्ताओं पर इस कंपनी का राज था. लगभग सभी के पास इस कंपनी का कनेक्शन हुआ करता था. खबर आ रही है कि इस सरकारी कंपनी के बोर्ड ने 54,000 कर्मचारियों को निकलने का फैसला किया है. बस चुनाव ख़त्म होने की देरी है. देश का लोकसभा चुनाव मई में ख़त्म होगा और इन 54,000 लोगों को घर का रास्ता दिखा दिया जायेगा.

आपको कल्पना करनी है कि इन घरों की तस्वीर कैसी होगी जब इतनी बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार होकर अपने घर वापस लौटेंगे!

यही है नरेन्द्र मोदी के विकास का मॉडल. सरकारी कंपनी और आम लोगों के रोजगार की शर्त पर निजी कंपनियों के विकास का रास्ता तैयार करना.

ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे. उदाहरण के लिए बहुचर्चित राफेल का मामला. इस मामले में सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लग रहे हैं. अंग्रेजी की पत्रिका कारवां, अंग्रेजी अखबार दी हिन्दू ने इस मुद्दे पर कई रिपोर्ट प्रकाशित की है और नरेन्द्र मोदी सरकार की पोल खोली है. इस पूरे खेल में यही हुआ है कि नरेन्द्र मोदी ने फ़्रांस की एक कंपनी और भारत के हिन्दुस्तान एरोनौटीक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ हुए समझौते को रद्द कर एक नया समझौता किया. इस समझौते में फ़्रांस की कंपनी तो वही रही लेकिन भारत की तरफ से इस समझौते में शामिल कंपनी अनिल अम्बानी की कंपनी हो गई. नौ रत्नों में शामिल एचएएल को किनारे कर दिया गया.

इस खेल के ब्योरे में न जाते हुए यहाँ बस यह स्पष्ट करना है कि नरेन्द्र मोदी को अगर देश की जनता, देश की सरकारी कंपनी और वहाँ के कर्मचारियों के भविष्य की बात आती है और अगर इन सबके खिलाफ कोई निजी कंपनी खड़ी है तो मोदी सरकार इस निजी कंपनी का पक्ष लेती है. न कि देश की सरकारी कंपनी का.

यही मोदी सरकार जब देश में चल रहे विकराल रोजगार के संकट की बात होती है तो आंकड़ो पर सवाल खड़ा करती है. न कि अपनी नियत पर.

फ़रवरी महीने में एक अंग्रेजी अखबार में राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (NSSO) से आये आंकड़े के बूते अंग्रेजी अखबार दी बिज़नेस स्टैण्डर्ड ने लिखा कि वर्तमान में बेरोजगारी पिछले 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ रही है. मोदी सरकार ने अपनी ही संस्था की इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया और इस प्रकाशित होने से रोक दिया.

इस तरह यह सरकार आम लोगों को यह बताना चाहती है कि देश में रोजगार का कोई संकट नहीं है. आपको तीसरी तस्वीर की भी कल्पना करनी है कि जब मोदी सरकार दावा करती है कि देश में बेरोजगारी कोई समस्या नहीं है तो बीएसएनएल से निकाले जा रहे लोग और उनके जैसे तमाम अन्य लोग जो रोजगार की संकट में दर दर भटक रहे हैं, उनके दिमाग में क्या चल रहा होगा. पूरी मीडिया को नियंत्रित करने वाले मोदी के सामने वो खुद को कितना विवश महसूस करते होंगे.

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