खतरा पहलाज निहलानी जैसे खुलकर खेलने वालों से नहीं बल्कि प्रसून जोशी जैसे ‘लिबरल’ चेहरे से है

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पहलाज निहलानी और प्रसून जोशी

शिखा कौशिक/

पहलाज निहलानी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के शायद एकमात्र प्रमुख होंगे जिन्होंने अपने कार्यकाल में भरपूर आलोचना झेली. निहलानी जिस राजनीति की सेवा में अजीबोगरीब फैसले लेते रहे उसने भी अंततः उनसे पल्ला झाड लिया. केंद्र सरकार ने उनसे इस्तीफ़ा मांग लिया.

निहलानी के बाद CBFC के प्रमुख प्रसून जोशी बने. उन्होंने पद्मावती फिल्म के विवाद पर अब तक जो भूमिका निभाई है उससे इतना तो पता चलता है कि उनके कार्यकाल में भी लगभग वही होने वाला है जो पहलाज निहलानी के समय में हुआ. बस फर्क इतना है कि निहलानी ने अपनी भद्द पिटवाई पर प्रसून जोशी कम से कम इतने समझदार हैं कि अपना नुकसान नहीं होने देंगे.

इसी हफ्ते यह खबर आई कि CBFC ने मेवाड़ के शाही परिवार को पद्मावती फिल्म पर फैसला लेने में मदद के वास्ते आमंत्रित किया है.  इस संस्था ने मेवाड़ के शाही परिवार से विश्वराज सिंह को आमंत्रित किया है कि वे सेंसर बोर्ड के लोगों के साथ बैठकर देखें और उन्हें सही फैसले पर पहुँचने में मदद करें.

यह कैसा अजीबोगरीब फैसला है? सवाल है कि CBFC को यह समझने में मुश्किल हो रही है कि किस तरह का तथ्य और गल्प किसी समुदाय को आहत करता है. क्या आगे से फ़िल्में जब रिलीज़ होंगी तो उस ख़ास समुदाय के प्रतिनिधियों को बुलाकर पूछा जाएगा कि कहीं आपकी भावना आहत तो नहीं हो रहीं. अगर समुदाय विशेष के लोगों को ही फैसला लेना है तो CBFC ही क्यों रहे. हर समुदाय के प्रतिनिधियों को सरकार चयन कर ले और जब जरुरी हो तो उन्हें बुलाकर पूछ ले कि भईया यह फिल्म आपके समुदाय को आहत तो नहीं करेगी. उनको नौकरी और उनके खर्चे की बात ही नहीं रहेगी इस तरह सरकारी खजाने पर थोडा बोझ भी कम होगा.

CBFC ने मेवाड़ के शाही परिवार को पद्मावती फिल्म पर फैसला लेने में मदद के वास्ते आमंत्रित किया है

यही नहीं अगर प्रसून जोशी के नेतृत्व में लिए गए इस फैसले को सही ठहराया जाए तो न्यायालय में न्यायधीश ही क्यों बैठाए गए हैं. जब समुदाय विशेष से कुछ विवाद आये तो उस समुदाय के कुछ ख़ास लोगों से निर्णय लेने को कह दिया जाए.

एक साधारण समझ रखने वाला इंसान भी बता सकता है कि निर्णय तीसरे (तटस्थ) पक्ष के द्वारा लिया जाता है तभी उसके सही होने की सम्भावना बढती है अन्यथा तो आरोपी और आहत, दोनों का अपना-अपना पक्ष होता ही है.

सनद रहे कि यह विश्वराज सिंह वही हैं जिन्होंने खुद मीडिया को बताया है कि उन्होंने सेंसर बोर्ड को नवम्बर 11 और दिसंबर 1 को ईमेल भेजा जिसमें उन्होंने इस फिल्म पर सवाल खड़े किये. ऐसे में क्या उनसे उम्मीद की जाए कि वे कोई तटस्थ निर्णय लेने में मदद करेंगे.

इन सबको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अजीबो-गरीब फैसले का सिलसिला जो पहलाज निहलानी के कार्यकाल  में शुरू हुआ वह अभी भी अनवरत जारी है. बस अंतर यह है कि इस नए रूप में लोगों को यह मालूम नहीं हो पा रहा है कि इस फिल्म का विलेन कौन है.

पाठकों को यह तो मालूम ही होगा कि संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी फिल्म पद्मावती को लेकर कुछ महीने पहले विवाद हुआ था और इस फिल्म के रिलीज़ की तारीख आगे खिसकानी पड़ी थी. अभी तक इस फिल्म के रिलीज़ का दिन तय नहीं हुआ है.

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