क्या सरकार नोटबंदी और राफेल पर जांच से घबराई हुई है?

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उमंग कुमार/

टू जी घोटाला, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला याद है? इन सारे घोटालों पर ही पिछली सरकार गिरी थी और इन सबको उजागर करने का श्रेय सीएजी को जाता है. लेकिन वही सीएजी नोटबंदी और राफेल डील पर अब तक चुप क्यों है? यही सवाल पूछा है 60 से अधिक रिटायर्ड अधिकरियों ने.

राष्ट्रपति को लिखे एक पत्र में इन अधिकरियों ने लिखा है कि ऐसा लग रहा है कि सीएजी जान-बूझकर इन मुद्दों पर अपनी जांच में देर कर रही है. क्योंकि इससे सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा सकता है. यह देरी 2019 के चुनाव तक सरकार को बचाने के लिए की जा रही है.

राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को लिखे अपने खुले ख़त में इन अधिकरियों ने चर्चित घोटाला जैसे टू जी घोटाला, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला इत्यादि का जिक्र किया है और कहा है कि इन मामलों की जांच की वजह से ही जनता को पिछली सरकार के कामकाज के बारे में अपना मत बनाने में मदद मिली थी. लोगों ने इसकी तारीफ़ भी की थी. लेकिन वर्तमान सरकार में ऐसा नहीं हो रहा है.

नोटबंदी को दो साल से ऊपर हो गए, वहीँ फ़्रांस के साथ राफेल सौदे पर मुहर 2015 में ही लग गई थी पर सीएजी ने अभी तक इस पर कोई रिपोर्ट ने नहीं निकाली है. यह सब देखते हुए इस संस्था की विश्वसनीयता भी खतरे में हैं.

नोटबंदी को दो साल से ऊपर हो गए, वहीँ फ़्रांस के साथ राफेल सौदे पर मुहर 2015 में ही लग गई थी पर सीएजी ने अभी तक इस पर कोई रिपोर्ट ने नहीं निकाली है

यह पहली बार नहीं है जब सरकार पर ऐसे बड़े मुद्दे की जांच या किसी रिपोर्ट को टरकाने का आरोप लगा है. अगस्त महीने में मीडिया में खबरें आई थीं कि सरकार ने वित्तीय संसदीय समिति में अपने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए नोटबंदी पर तैयार रिपोर्ट को स्वीकार करने से मना कर दिया था. अगर यह रिपोर्ट स्वीकार हो जाती तो संसद में इस पर बहस होती. पर इस रिपोर्ट को खरिज कर सरकार ने संसद में इस पर संभावित बहस को रोक दिया.

इस रिपोर्ट ने नोटबंदी को गलत कदम बताया था.

सनद रहे कि 8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने के चौंकाने वाला फैसला लिया था.

इस स्थायी वित्तीय समिति का नेतृत्व कांग्रेस नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली कर रहे थे और इस समिति में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री भी शामिल थे. इसी संसदीय समिति ने मार्च महीने में नोटबंदी पर रिपोर्ट लाई थी.

नोटबंदी पर जारी की गयी यह रिपोर्ट पहले दिन से ही भाजपा के लिए किरकिरी बनी हुई थी. बीते 19 मार्च को ही सभी भाजपा सदस्य इस रिपोर्ट को खारिज करने के लिए एकजुट हो गए थे. भाजपा के वित्तीय एवं व्यवसायिक मामलों के विशेषज्ञ निशिकांत दुबे ने इस रिपोर्ट के खिलाफ असंतोष प्रस्ताव प्रस्तुत किया था.

कुल 31 सदस्यों वाली इस समिति में भाजपा के 17 सदस्य थे. अगर मोइली किसी एक भी भाजपा सदस्य को इस रिपोर्ट के समर्थन के लिए मनाने में कामयाब हो जाते तो नोटबंदी पर दो विपरीत रिपोर्ट भी जारी हो सकती थी. लेकिन भाजपा के नेता मानने को तैयार नहीं थे. इसी क्रम में सप्ताह दर सप्ताह रिपोर्ट को लेकर चर्चा स्थगित होती रही, और मोइली द्वारा किये गए सभी प्रयास भी निरर्थक साबित हुए. इस समिति का कार्यकाल 31 अगस्त को समाप्त हो गया था.

जांच नहीं होने की स्थिति में ऐसे बड़े मामलों पर सिर्फ आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला ही चलता रहेगा. सरकार अपने कदम को सही कहती रहेगी और विपक्ष इसे ग़लत बताता रहेगा. इसीलिए, ये ज़रूरी है कि संस्थाएं जांच कर अपनी रिपोर्ट जारी करें, ताकि लोगों को सच्चाई का पता चल सके.

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