क्या सरकार वास्तव में 2021 की जनगणना में ओबीसी की गणना कराएगी?

0

आज़ाद सिंह डबास/

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 31 अगस्त 2018 को भारतीय महापंजीयक व जनगणना आयुक्त कार्यालय द्वारा जनगणना के संबंध में की गई तैयारियों की समीक्षा बैठक के उपरांत गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि 2021 की जनगणना में अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की गणना करने का फैसला लिया गया है. अगली यानि 2021 में होने वाली जनगणना की प्रक्रिया 3 वर्ष में पूर्ण होगी जबकि इसके पूर्व इस कार्य में 7 से 8 वर्ष लगते थे. अगले दिन प्रकाशित खबरों के अनुसार, सरकार के इस निर्णय को 2019 के आम चुनाव के मद्देनजर बड़ा सियासी कदम माना जा रहा है.

भारत वर्ष में प्रथम जनगणना 1872 में हुई. अगली जनगणना 1881 में हुई. इसके बाद हर 10 साल में जनगणना होती थी. इन समस्त जनगणनाओं में जातिगत गणना की गई. अंतिम जातिगत जनगणना 1931 में हुई थी. द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण 1941 में जनगणना नहीं हो सकी. आजादी के बाद कांग्रेस सरकार द्वारा 1951 की जनगणना जातिगत आधार पर नहीं कराई गई लेकिन इसमें एससी-एसटी की गिनती कराई गई. इसके बाद हुई जनगणनाओं में जातिगत जनगणना नही कराई गई. चूंकि जातिगत आकड़ें उपलब्ध नही थे अतः मण्डल आयोग ने 1931 की जनगणना के आधार पर ही अन्य पिछड़ा वर्ग की अनुमानित आबादी बताई. इसी के आधार पर वीपी सिंह सरकार ने 1990 में मण्डल आयोग की सिफारिश लागू कर ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिया जबकि आबादी 50 फीसदी के ऊपर है.

सन् 1997 में देवगौड़ा सरकार ने 2001 की जनगणना में जाति जनगणना कराने हेतु केबिनेट में प्रस्ताव पारित किया लेकिन कुछ समय बाद सरकार गिर गई. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में जातिगत जनगणना नहीं कराने का फैसला लिया. वर्ष 2010 में लोकसभा में जातिगत जनगणना पर हुई बहस में सभी राजनैतिक दलों में जातिगत जनगणना कराने पर सहमति बनी. आम सहमति के बावजूद कांग्रेस की बदनीयती के चलते तत्कालीन वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में एक जीओएम गठित किया गया. इस कमेटी में तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदमबरम ने यह तर्क दिया कि 2011 में जो जनगणना हो रही है, उसे वैसे ही होने दिया जाए. उन्होंने सुझाव दिया कि ओबीसी की गणना अलग से करा ली जाए, जिसे मान लिया गया.

गौरतलब है कि भारत में जनगणना एक्ट 1948 के तहत जनगणना होती है जिसमें बहुत सारी सुविधाएं दी जाती हैं. एक्ट के तहत कराई जा रही जनगणना के समय अगर कोई व्यक्ति गलत जानकारी देता है तो उसे सजा भी हो सकती है. वर्ष 2011-12 में ओबीसी के लिए जो गिनती कराई गई वह जनगणना एक्ट के तहत नही कराई गई. इसे गृह मंत्रालय के बजाय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कराया गया. इसे आगंनबाडी कार्यकर्ताओं एवं एनजीओ इत्यादि से कराया गया. यह जनगणना न होकर एक प्रकार का सामाजिक एवं आर्थिक सर्वेक्षण है. वर्ष 2014 में बीजेपी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार ने 2015 में कहा कि इस गणना के जाति विवरण में 8.19 करोड़ गलतियां पाई गईं. इनमें से 6.73 करोड़ गलतियां सुधार ली गई हैं जबकि शेष गलतियां सुधारना बाकी हैं. इस गणना में सुधार के लिए नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविन्द पनगरिया की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई. इस कमेटी की कभी बैठक ही नहीं हुई और पनगड़िया नीति आयोग छोड़कर वापस अमेरिका चले गये. चूंकि यह गणना त्रुटिपूर्ण थी अतः लगभग 5 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद इसके अंतिम आंकड़े आज तक सार्वजनिक नही किये जा सके हैं.

भारत में जनगणना एक्ट 1948 के तहत जनगणना होती है जिसमें बहुत सारी सुविधाएं दी जाती हैं. एक्ट के तहत कराई जा रही जनगणना के समय अगर कोई व्यक्ति गलत जानकारी देता है तो उसे सजा भी हो सकती है.

कुछ लोग यह तर्क देते रहते हैं कि जाति जनगणना से जातिवाद बढेगा. इस कुतर्क में कोई सच्चाई नहीं है. जाति जनगणना नहीं होने से भारत में जातिवाद घटा नही अपितु बढ़ रहा है. जाति जनगणना नहीं  होने से देश की नीतियां 1931 की गणना के आधार पर बन रही हैं जो न्याय नहीं कर सकतीं. 1931 की जनगणना के आधार पर केन्द्र द्वारा ओबीसी के विकास के लिए राज्यों को फंड दिये जा रहे हैं. बगैर गिनती के फंड्स का सही आबंटन संभव नहीं है. यहां यह सवाल भी पैदा होता है कि जब धर्म और भाषा के आधार पर जनगणनाओं में आकड़े इकट्ठे  किये जा रहे हैं तब जाति के आधार पर गणना क्यों नहीं की जाती? जब देश में जानवरों की गिनती हो सकती है तब जाति के आधार पर ओबीसी की गिनती क्यों नहीं हो सकती? हकीकत में एक वर्ग विषेष को यह भय सता रहा है कि वास्तविकता सामने आने से उनके वर्चस्व पर सवाल उठेंगे?

मेरा ऐसा मानना है कि केन्द्र सरकारों ने कभी ओबीसी की गिनती कराना चाहा ही नही. अभी भी इतनी ही खबर है कि गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने ओबीसी के आंकड़े जुटाने की बात कही है. अगर इस बार भी सिर्फ ओबीसी की गणना की जाती है तो उसमें भी सही आंकडे़ नही आ पाएंगे. कई जातियां एक राज्य में ओबीसी में हैं तो दूसरे में एससी में. कोई जाति एक राज्य में ओबीसी है तो दूसरे में सामान्य. मेरी स्वयं की जाट जाति मध्यप्रदेष, राजस्थान, उत्तरप्रदेष एवं दिल्ली जैसे आठ राज्यों में ओबीसी है जबकि हरियाणा में सामान्य. राजस्थान में केन्द्र एवं राज्य, दोनों में ओबीसी है तो शेष में सिर्फ राज्यों में.

अगर मोदी सरकार वास्तव में ओबीसी की गिनती कराने हेतु इमानदार है तो उसे  2021 की जनगणना में जाति का कालम जोड़ देना चाहिए. ओबीसी की गणना कराने का वर्तमान निर्णयन तो सरकार का है और ना ही इस संबंध में कोई केबिनेट प्रस्ताव पारित हुआ है. अगर मोदी सरकार चाहती है कि देश सच्चाई के आधार पर चले तो सरकार को सिर्फ ओबीसी की गणना नही अपितु समस्त जातियों की गणना करानी चाहिए. संसद में बाकायदा इसकी घोषणा होनी चाहिए. जनगणना कमिश्नर को निर्देश दिये जाने चाहिए कि जिस तरह आजादी के पूर्व 1931 तक जाति जनगणना होती थी उसी तरह जातियों को गिना जाये अन्यथा वर्तमान खबर भ्रम फैलाने के अलावा कुछ नही है. भारत तभी सशक्त राष्ट्र बनेगा जब सभी जातियों का एक समान विकास हो.

(लेखक सिस्टम परिवर्तन अभियान के अध्यक्ष हैं. उनसे उनके मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here