क्या बढ़ती हुई हिंसा के पीछे हैं जलवायु परिवर्तन!

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बोधिसत्व विवेक/

विवेक

कल्पना कीजिए की आप मोटर-साईकिल से कहीं जा रहे हों और रास्ते में जाम लगा हो. आपको देर तो हो रही है लेकिन मौसम बड़ा सुहाना है, बड़ी खुशबूदार-ठंडी हवा बह रही हैं और आपको लग रहा है जैसे समुन्दर का किनारा बड़ा पास है. अब इसी जाम की कल्पना इस तरह कीजिये कि तापमान 45 डिग्री के ऊपर हैं और पसीने से भींगें आपके कपड़े बदन से चिपक से गये हैं और आपका गला सूख रहा है. चारों तरफ गाड़ियों को हुजूम हो और होर्न से चिल्लपों मचा हुआ हो.

ऊपर बताये दोनों स्थितियों में से किसमें आपको गुस्सा आने की सम्भावना अधिक है? जवाब आप खुद जानते हैं.

जब भी हम जलवायु परिवर्तन के बारे में पढ़ते हैं, खबरें देखते हैं, बात करते हैं या सोचते हैं, तो ज्यादातर बार हमारी सोच प्राकृतिक आपदा जैसे सूखा, तूफ़ान, बाढ़ इसके इर्द-गिर्द ही घूमती हैं. लेकिन इस समस्या के दूरगामी प्रभावों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का असर हमारे जीवन की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज पर पड़ता है, यहाँ तक की रोज-मर्रा के हमारे व्यवहार पर भी.

इओवा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर क्रेग एंडरसन और उनके साथियों ने अपने शोध से ये साबित किया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जो ग्लोबल वार्मिंग हो रही है वो सिर्फ मौसम को ही नहीं बल्कि बहुत बड़े स्तर से हमारे मानसिक विकास और सामाजिक व्यवहार को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है. ये सूचना उन सबके लिए खतरे की घंटी है जिन्हें जलवायु परिवर्तन के नाम पर सिर्फ पिघलते हुए ग्लेशियर ही याद आते हैं.

इस शोध से पता चला है कि औसत तापमान में 1% की बढ़ोत्तरी होने से हिंसक अपराधो में सीधे 6% का इजाफा हो जाता है. हिंसा के और सारे कारको को समान और स्थिर कर के भी यही नतीजे सामने आये जो साफ़ इशारा कर रहे थे कि बढ़ते तापमान के साथ-साथ हिंसक घटनाओ की सम्भावना कई गुना तेजी से बढ़ रही हैं. प्रोफेसर एंडरसन ने बताया है की ये मुख्यतः तीन तरीको से हो रहा है: –

  • गर्म तापमान सीधे तौर पर चिडचिडेपन और गुस्से की सम्भावना बढ़ाता है इसलिए आक्रामक व्यवहार और सोच को जन्म देता है.
  • जलवायु परिवर्तन जब प्राकृतिक आपदाओ को जन्म देते हैं तो उनसे अनाज और पानी दोनों की कमी होती और आर्थिक असमानता बढती हैं. ऐसे वातावरण में पेट में पल रहे भ्रूण से ले कर बढ़ते हुए बच्चे पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. रहने-खाने की खराब स्तिथि, विघटित परिवार और पोषण की भारी कमी एक ऐसे व्यस्क का विकास करती हैं जो हिंसक या आक्रामक प्रवित्ति का हो जाय तो कोई आश्चर्य नहीं.
  • प्राकृतिक आपदाओ और घटते हुए संसाधनों के कारण भारी संख्या में लोग विस्थापित होते हैं और उन्हें अपने मातृभूमि से अलग होने की त्रासदी झेलनी पड़ती है. जब ये विस्थापित समूह नयी जगह जाता है तो चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में वहां स्थानीय लोगो से आपसी संघर्ष की सम्भावना बढती है जो सामाजिक के साथ-साथ राजनीतिक हिंसा का भी रूप ले सकता हैं.

अभी तक इतने शोध नहीं हो सके हैं की ये पता चले की इनमें से सबसे ज्वलंत समस्या कौन सी है लेकिन अंदाजा लगाया जा रहा है कि लोगों का ये विस्थापन जिसे इको-माइग्रेशन कहा जाता है सबसे अधिक विनाशकारी साबित होगा और भविष्य में ये बड़े युद्ध का कारण भी बन सकता है.

आने वाले समय की इस विपत्ति को बड़ा रूप लेने से रोका जा सकता है अगर हम जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता फैलाते हुए ग्लोबल-वार्मिंग को रोकने के लिए बड़े और सामूहिक कदम उठायें. साथ-साथ ही साथ जो लोग इसके कारण विस्थापित हो रहे हैं उनके प्रति नजरिया बदल कर उन्हें और सहारा देने की भी जरुरत हैं ताकि उन्हें स्थानीय लोगों द्वारा एक खतरे के रूप में न देखा जाये.

अगर आप चाहते हैं की आने वाली पीढ़ी ऐसी हवा में साँस ले जो सिर्फ साफ़ ही न हो बल्कि प्यार और शांति से भरी हो, तो जागरूकता बढाइये जलवायु परिवर्तन के बारे में, सवाल कीजिए अपनी सरकारों से, भाग लीजिये नयी नीतिया बनाने में और तय कीजिये की आपका अगला कदम किस ओर जा रहा है – इस प्यारी धरती को बचाने और खूबसूरत बनाने की तरफ या कहीं और ?

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(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से समाजकार्य की शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैंविवेक एम्स होस्पिटल में कार्यरत है और भारत में नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन के कौशल को विकसित करके प्रसार करने पर भी कार्य कर रहे हैं. बच्चो और युवाओ के साथ और उनके लिए काम करना इन्हें बेहद पसंद है और ये वाराणसी में 15 वर्षो से बच्चो के लिए कार्य कर रही कुटुम्ब संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. आप सामजिक मुद्दोंसाहित्य और सिनेमा से गहरा जुड़ाव रखते हैंइनसे मोबाईल नंबर 9999024748 पर संपर्क किया जा सकता है)

3 COMMENTS

  1. This is absolutely true. We can see the difference when we visit hill stations, people there are so calm and one of the reasons behind their calmness might be the climate they are living in.

    At the end you wrote about increasing ‘climate change’ awareness, I guess the majority is aware about it and they are making others aware too by forwarding such messages and videos but I doubt how many are applying it on themselves!!!

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