एनएसजी की सदस्यता को लेकर भारत की कूटनीति

0

सौतुक डेस्क/

न्यूक्लीयर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) का दो दिवसीय अधिवेशन विगत 23 जून को संपन्न हुआ. भारत की सदस्यता के मद्देनजर बात कुछ आगे नहीं बढ़ी. स्विट्ज़रलैंड के बर्न शहर में हुए इस अधिवेशन में सदस्य देशों द्वारा भारत की सदस्यता को लेकर विचार-विमर्श जारी रखने की बात कही  गई. भारत यूँ तो कई देशों से द्विपक्षीय सहमति के आधार पर एनएसजी की अधिकतर सुविधाओं का फायदा उठा रहा है जैसे परमाणु सयंत्रों से जुड़े विभिन्न तकनीकी और इनको चलाने के लिए परमाणु संसाधन. जैसे युरेनियम. लेकिन इसकी सदस्यता मिलने से भारत को एक स्थापित परमाणु संपन्न देश के तौर पर मान्यता मिलने का एक अलग महत्व है.

गौरतलब है कि भारत इन दिनों एनएसजी की सदस्यता के लिए भरपूर जोर लगाये हुए है जिसके लिए इसे लगभग सभी यूरोपीय देश और अमेरिका का समर्थन प्राप्त है. लेकिन भारत और एनएसजी की सदस्यता के बीच जो खड़ा है वह है पडोसी मुल्क चीन. ड्रैगन के नाम से जाना जाने वाला यह देश ज़ाहिर तौर पर भारत को इस कूटनीतिक बढ़त को नहीं लेने देगा. इसके लिए ड्रैगन ने भारत के नॉन-प्रोलिफिरेशन ट्रीटी पर हस्ताक्षर नहीं करने को हथियार बनाया है.  चीन के अनुसार ऐसे देशों के लिए अलग से नियम बनाना होगा जिसमे अन्य देश जिन्होंने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किया है और एनएसजी की सदस्यता चाहते हैं उनके नाम पर भी विचार किया जाना चाहिए. चीन के हर-मौसम साझीदार पाकिस्तान ने भी इसकी सदस्यता के लिए आवेदन दे रखा है. 

अमेरिका से परमाणु समझौते के बावत भारत की सारी उमीदें इसी देश पर टिकीं थी. अमेरिका चाहता तो चीन पर कूटनीतिक दबाव बना सकता था. लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अमेरिका ने भारत की जगह चीन को तरजीह देना जरुरी समझा है.

ऐसे में भारत के पास इस ऊँची चीन की दिवार को लांघने के क्या उपाय बचते हैं? क्या भारत इस तरफ कदम उठा रहा है? पिछले छः महीनों की गतिविधियाँ तो सही सन्देश दे रही हैं. भारत ने भी अमेरिका की जगह वापस रूस का रुख किया है. सनद रहे कि कुडानकुलम में परमाणु सयंत्र रूस की तकनीकी से ही चल रहे हैं. भारत चाहता है कि रूस चीन पर एनएसजी की सदस्यता को लेकर दबाव बनाये.

दूसरे आज 25 जून को भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी डोनाल्ड ट्रम्प से मिलने वाले हैं. इस मुलाक़ात के बाद यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका के रुख में परिवर्तन स्थायी है या महज उत्तरी कोरिया के मद्देनजर ही है. यह देश चीन के काफी करीब है और अमेरिका चाहता है कि चीन उसको भारी और खतरनाक हथियार बनाने से रोके.  

इससे भी बड़ा कूटनीतिक कदम भारत ने पहले ही उठा दिया है. पिछले 17 मई को भारत सरकार ने देश के घरेलू नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम को गति प्रदान करने के नाम पर एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल ने भारत के स्वदेशी उच्च दाब – जल रिएक्टरों की 10 इकाइयों के निर्माण को मंजूरी दी। सरकार के व्यक्तव्य के अनुसार संयंत्रों की कुल स्थापित क्षमता 7,000 मेगावाट होगी। इसमें इस फैसले से होने वाले बड़े बड़े फायदे गिनाये गए. मसलन, यह परियोजना इस क्षेत्र में मुख्य मेक इन इंडिया’ परियोजना में से एक परियोजना होगी। इससे घरेलू उद्योगों को 70,000करोड़ रुपए के विनिर्माण का आदेश मिलेगा. इस परियोजना से 33,400 से भी अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होने की आशा है ।

उर्जा नीति के अनुसार, वर्ष 2024 तक देश को करीब 14 गीगावाट बिजली चाहिए. सरकार का कहना है कि संचालनात्मक संयंत्रों से भारत की वर्तमान नाभिकीय ऊर्जा क्षमता 6780 मेगावाट है। वर्तमान में निर्माणाधीन परियोजनाओं के माध्यम से वर्ष 2021 – 22 तक 6700मेगावाट नाभिकीय ऊर्जा आने की संभावना है। ऐसे में सरकार को रिएक्टरों की 10 इकाइयों के निर्माण सम्बंधित निर्णय लेने की हड़बड़ी क्यों हुई?

इस विषय के जानकारों का मानना है कि यह सरकार का एक कूटनीतिक कदम है जिसके तहत भारत विश्व समुदाय पर दबाव बनाना चाहता है कि उसे जल्दी से जल्दी न्यूक्लीयर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में शामिल किया जाए. अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारत खुद से विद्युत् सयंत्र खड़ा करेगा जिसकी निगरानी करने का अधिकार इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) को नहीं मिलेगा.

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here