कठपुतलियों का लोकतंत्र: जहाँ डाटा फ्री और आटा के लिए मारामारी है

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जितेन्द्र चौरसिया/

2019 का भारत, परिकल्पना मात्र से आंखों के सामने चकाचौंध से भरा किसी मायालोक जैसा दीखता है। वजह है आगामी लोक सभा चुनाव और उसमें दिखाए जाने वाले ढेर सारे सपने। 2014 में जैसे ‘अच्छे दिन’ का सपना दिखाया गया था। भारत में चुनाव और सपने में गजब का गठबंधन हैं। यहाँ राजनितिक दल बड़े हठधर्मिता और निर्लज्जता से सपने दिखाते हैं। इन पार्टियों को बारम्बार ऐसा करने की हिम्मत इसलिए मिलती है क्योंकि भारतवासियों को सपने और सच में फर्क करना  सिखाया ही नहीं गया है।

पुरातन से 2018 तक के सफर में सपनों के सौदागरों ने राज किया सपने बेचे गए, सत्ता हासिल की गई और सपने में जीने वाली जनता का उपयोग कठपुतलियों की तरह किया गया‌। हुक्मरानों ने जनता रूपी कठपुतलियों को कभी दाएं हाथ की उंगलियों से (एनडीए गठबंधन) से नचाया तो कभी बाएं हाथ की उंगलियों से (यूपीए गठबंधन)से नचाया लोकतंत्र में रुपयों की ताकत का नंगा नाच जारी है। कठपुतलियां 1950 में भी नाच रही थी और अभी भी नाच रही हैं। सैकड़ों साल के संघर्ष के बाद दूसरे शब्दों में अंग्रेजों द्वारा गुलाम बनाने के शुरुआत के बाद भारत के लोगों को सिर्फ आजादी का भ्रम फैलाया गया। कागज में आजादी मिली जरूर थी,परंतु भारत के भूरे अंग्रेजों ने कमजोर हो चुकी जनता का शोषण करना और उन्हें सपनों में जीने के लिए धीमा धीमा जहर पर उसने शुरू किया। जीता जागता एवं भावनाओं से परिपूर्ण इंसान को कठपुतलियों में बदलने का दौर प्रारंभ हुआ जो 1947 से 2014 और 2014 के बाद नित नए इतिहास रचने के बाद अब भारत का लोकतंत्र पूर्ण रूप से कठपुतलियों के लोकतंत्र में तब्दील होने वाला है।

इस कठपुतलियों की बस्ती की आंकड़ों की हकीकत यह है कि ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2018’ की रिपोर्ट कहती है कि भारत का भुक्कड़ देशों में रैंकिंग 103 है इस सर्वे में 119 देशों को शामिल किया गया था। भारत से नीचे नाइजीरिया और युगांडा जैसे देश ही बचे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि भूख और गरीबी अपने चरम पर है परंतु सपने आज भी बिक रहे हैं। चाहे बुलेट ट्रेन के हो, 15 लाख रुपए के हो या मंदिर के या कर्ज माफी के। आजादी के 71 साल बाद भी 16.5 प्रतिशत लोग रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं।

भ्रष्टाचार में भारत के नाम काला अध्याय जुड़ा हुआ है ‘ग्लोबल करप्शन इंडेक्स 2017’ की रिपोर्ट में भारत का 81 वां स्थान है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भ्रष्टाचार और प्रेस स्वतंत्रता में सबसे खराब स्थिति वाले देशों की श्रेणी में है। फोर्बस द्वारा कराए गए सर्वे में पाया गया कि एशिया महाद्वीप में टॉप 5 देशों में भ्रष्टाचार में भारत का स्थान सबसे ऊपर अर्थात नंबर एक पर है। कठपुतलियों के देश भारत में रिश्वतखोरी की दर 69 प्रतिशत है क्योंकि कठपुतलियां रिश्र्वत देती हैं आवाज नहीं उठातीं।

कुपोषण के आंकड़े जो 2017-18 में केंद्रीय वित्त एवं कारपोरेट मामलों के मंत्री रहे अरुण जेटली ने बताया था कि भारत में बाल व मातृ कुपोषण आज भी बड़ी चुनौती है। चुनौती कितनी बड़ी है यह इससे पता चलता है कि दुनिया के 50 प्रतिशत कुपोषित बच्चे  अकेले भारत में हैं।

आज भी ज्यादातर परिवार में महिलाओं को खाना सबसे अंत में अर्थात बचाखुचा ही दिया जाता है। भारत में 51प्रतिशत महिलाएं आज भी एनीमिक है। अर्थात खून की कमी से जूझ रही हैं‌।

कठपुतलियों के देश में महिला अत्याचार अपने चरम पर है। निर्भया कांड ना आप भूले हैं ,ना ही दुनिया भूली है। हुक्मरानों के हाथों नाच रही किसान रुपी कठपुतलियों का जीवन आजादी के बाद से आज तक जस का तस बना हुआ है। अपनी बिटिया की शादी, बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज के बोझ के नीचे दबा रहता है।

कठपुतलियों का महत्व चुनाव के वक्त 15 दिनों के लिए बढ़ जाता है। कठपुतलियों का नाच और भी बढ़ जाता है। ऊपर से नचा रहे सफेदपोशों की उंगलियों में हरकत शुरू हो जाती है। काली नीयत का काला खेल। उंगलियां हरकत करती हैं- दारू, मुर्गा, रुपया और जातपात का ताडंव शुरू हो जाता है। और इस तरह लोकतंत्र का काला अध्याय वोट से लिखा जाता है। लालच में नाच नाच रही कठपुतलियां भूल जाती हैं।

आजादी के बाद से आज तक चल रहा कठपुतलियों का वोट रुपी नंगा नाच जीत जाता है। स्थिति जस की तस है। आजादी के वक्त भी गरीबी, भुखमरी, कुपोषण का कलंक देश पर था, जो आज भी है आगे भगवान ही मालिक है।

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(जितेन्द्र चौरसिया रीवा, मध्यप्रदेश के रहने वाले हैं। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में जितेन्द्र अमरपाटन से आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी थे। इसके पहले जितेन्द्र चीन में एक दवा कंपनी में अधिकारी थे। अपनी नौकरी छोड़कर ये मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव में शरीक हुए। यह लेख जितेन्द्र का निजी विचार है.)

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