चीन में फलते-फूलते पर भारत में बंद होते सिनेमाहाल

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रजनीश जे जैन/ 

रजनीश जे जैन/

अमिताभ बच्चन ने ऐसे मसले को उठाया है जिस पर फिल्मों से जुड़े विचारक व लेखक  समय समय पर अपनी राय रखते रहे है। बिग बी का आग्रह है कि नयी फिल्मों को कुछ समय तक बड़े परदे पर ही रहने देना चाहिए , बाद में उन्हें इंटरनेट या मोबाइल पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए। इस सलाह के पीछे उनका तर्क सिनेमाघर जाकर फिल्म देखने की संस्कृति को विकसित करने का है। सिनेमाई दर्शकों और हर वर्ष बनने वाली फिल्मों के लिहाज से भारत दुनिया में लगभग शीर्ष पर आ चुका है परंतु  सिनेमा हाल में बड़ी स्क्रीन पर  फिल्म देखने के वैश्विक घनत्व में वह कही अधिक निचली पायदान पर है।

छोटे शहरो और कस्बों के दर्शक इस बात को स्वीकारेंगे कि उनकी यादों में उनके शहर का बंद हो चुका  सिनेमा हाल आज भी  शिद्दत से बसा हुआ है। बोलचाल की भाषा में ‘ टाकीज ‘ कही गई यह बिल्डिंग अब या तो कमर्शियल काम्प्लेक्स या मैरेज हाल में बदल चुकी है।  अधिकांश शहरों की लगभग  यही कहानी है। हर शहर में ऐसे सैंकड़ों लोग मिल जाएंगे जिनकी यादों में यह टाकीज आज भी जुड़ा हुआ है।

नब्बे के दशक तक टाकीज आम जीवन का हिस्सा हुआ करते थे परंतु वीडियो कैसेट प्लेयर और टीवी के आगमन ने टाकीज के चरम पर पहुंचते ही शिखर पर सुराख़ करना आरंभ कर दिए थे। सिनेमा बहुत दिनों तक इस क्षरण को नहीं समझ पाया था समझ में आता तब तक मल्टीप्लेक्स दस्तक दे चुके थे। मल्टीप्लेक्स का आगमन और अनुभव भव्य था परंतु उनकी उपस्तिथि भी बड़े शहरो तक ही सिमित थी।

इधर महानगरों और मझोले शहरों में मल्टीप्लेक्स बढ़ रहे थे और मध्यम एवं छोटे शहरों से एकल सिनेमाघर गायब हो रहे थे। एक अमेरिकी  सिने संस्था का मानना है कि भारतीय सिनेमा के मौजूदा हाल से  पांच गुना फैलाव की संभावना है परंतु पर्याप्त स्क्रीन न होने की वजह से बॉक्स ऑफिस अपने दायरे में सिमटा हुआ है।

इधर महानगरों और मझोले शहरों में मल्टीप्लेक्स बढ़ रहे थे और मध्यम एवं छोटे शहरों से एकल सिनेमाघर गायब हो रहे थे

भारत में 96300 लोगों पर एक स्क्रीन का अनुपात है जबकि अमेरिका में  7800 लोगों पर एक स्क्रीन है। इस स्थिति की भयावहता तब ज्यादा महसूस होती है जब दो लोकप्रिय सितारों की फिल्मे एक ही दिन रिलीज़ होती है। पर्याप्त स्क्रीन न होने  की इस मारामारी का खामियाजा अंततः दर्शक को ही भुगतना होता है। भारत में इस समय लगभग 9000 सिंगल स्क्रीन और 3000 के करीब मल्टीप्लेक्स  सिनेमा हाल है।  लगभग इसलिए कि देश के किसी न किसी राज्य  में कोई न कोई एक  सिंगल स्क्रीन प्रतिदिन बंद हो रहा है।

नब्बे के दशक तक चीन वैश्विक सिनेमा के नक़्शे पर कही नहीं था। वहाँ की साम्यवादी सरकार ने संस्कृति की रक्षा के नाम पर हॉलीवुड फिल्मों को कई वर्षों तक अपनी जमीन पर फटकने तक नहीं दिया था। सन 2002 तक चायनीज सिनेमा का आकार भारत के मुकाबले आधा भी नहीं था! बदलते परिवेश में चीन सरकार ने हॉलीवुड से अपनी इंडस्ट्री को बचाने के लिए व्यापक कदम उठाये, उन्होंने खुद को बड़ा बनाना आरंभ किया। सिनेमाहाल बनाये जाने के लिए सरकारी मदद दी जाने लगी और मनोरंजन टैक्स की दरों को एकदम लचीला कर दिया गया। परिणाम स्वरुप 2011 आते आते चीन में पैंतीस हजार सिनेमाघर हो गए थे। 2016 में यह संख्या इकतालीस हजार को पार कर गयी जिसकी वजह से इस क्षेत्र में पहले स्थान का हकदार अमेरिका दूसरे नंबर पर आ गया। आज चीन में पचास हजार स्क्रीन है भारत से पांच गुना! उसके बॉक्स ऑफिस के राजस्व की कल्पना इस आंकड़े से आसानी से की जा सकती है।

चीन के सिनेमा को सरकार ने फलने फूलने के लिए साधन जुटाए वही भारतीय सिनेमा को सरकार की अवेहलना ने बरबादी के कगार पर ला खड़ा किया। केंद्र सिनेमा का नीति नियामक रहा है परंतु मनोरंजन  टैक्स वसूलने का काम उसने राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ रखा है। टेक्स में एकरूपता न होने की वजह से हर राज्य अपने हिसाब से मनमाने दर पर कर वसूल रहा है। सिनेमा मालिकों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा सरकार के पास जाना और बदले में कुछ न मिलना इस उद्योग की गिरावट की मुख्य वजह रहा है।  यह हाल तब है जब सिनेमा को बाकायदा उद्योग का सरकारी दर्जा मिला हुआ है। सिर्फ अमिताभ बच्चन ही नहीं सिनेमा से जुड़े अन्य वरिष्ठ पत्रकार लेखक भी इस मुद्दे को अलग अलग मंचों पर उठा चुके है परंतु लगता नहीं कि ये आवाजे सरकार के कानों तक पहुंची हो। सरकार ने सुना भी हो तो लगता नहीं है कि वे इस क्षेत्र के उत्थान के लिए कुछ ठोस करने वाली है ! अब तक  तो ऐसा ही लगता है !

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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