लम्बाई के हिसाब से वजन कम होना (Wasting): भारत के वैश्विक भूखमरी सूचकांक पर गिरती साख की वजह

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प्रियंक कुमार/

(आई.आई.एम. से मार्केटिंग मैनेजमेंट की शिक्षा के उपरांत प्रियंक कुमार रोजगार के सिलसिले में इनदिनों नाइजीरिया प्रवास पर हैं. आँकड़ों में, मैट्रिक्स में और तथ्यों में इनकी दिलचस्पी का आलम यह है कि फाइनांस के धुरंधर जानकार इन्हें ही फाइनान्स का जानकार मानते हैं. सेल्स से जुड़े लोग अमूमन मसलों पर इनकी ओर देखते हैं. और मार्केटिंग वाले समझते हैं..वो समझते नहीं..वो ईर्ष्या करते हैं कि आप इतना अप टू डेट कैसे रहते  है? सौतुक इनका स्वागत करता है. प्रस्तुत आंकड़े ही न जाने कितनी धुंध साफ करते हैं. यह लेख न सिर्फ धुंध साफ करता है बल्कि उन दिशाओं की तरफ राह दिखाता है, जहाँ वास्तविक काम करने की जरूरत है.)

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सौतुक सूचना सारांश

  • GHI ( वैश्विक भूखमरी सूचकांक ) से जारी सूची में भारत सौवें स्थान पर
  • GHI के चार पैमाने: under nutrition (पोषण की कमी), लम्बाई के हिसाब से वजन कम होना (Wasting), ठिगनापन (Stunting), शिशु मृत्यु दर (Child Mortality Rate)
  • भारत तीन पैमानों ( कुपोषण, ठिगनापन और शिशु मृत्यु दर ) पर औसत प्रदर्शन कर रहा है
  • Wasting यानी लम्बाई और वज़न के अनुपात में भारी कमी की वजह से भारत इस इंडेक्स में पिछड़ रहा है.

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पिछले तीन दिनों से वैश्विक भूखमरी सूचकांक पर भारत के खराब प्रदर्शन की चर्चा चल रही है. यह जर्मनी की गैर लाभकारी संस्था इंटरनेशनल फ़ूड पालिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (IFPRI) और आयरलैंड की संस्था कंसर्न वर्ल्डवाइड के वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) या GHI के जारी करने के बाद शुरू हुआ. इस सूची में भारत कि रैंकिंग पिछले साल की रैंकिंग से तीन पॉइंट नीचे गिरी है. पिछले साल 97 थी तो इस साल घटकर 100 हो गई है.

भूख के बहुआयामी प्रकृति को समझाने के लिए GHI चार सन्दर्भ देखता है जिसमें undernutrition (पोषण की कमी), लम्बाई के हिसाब से वजन कम होना (Wasting), ठिगनापन (Stunting), शिशु मृत्यु दर (Child Mortality Rate) शामिल है.

यद्यपि चारो तरफ इसकी बात हो रही है कि भारत की रैंकिंग पिछले कुछ सालों में गिरी है. कुछ ने तो यहाँ तक लिख दिया कि भारत का स्कोर पिछले तीन सालों में 45 पॉइंट गिरा है मतलब स्थिति काफी खराब हुई है. लेकिन तस्वीर उतनी भी बुरी नहीं है (आंकड़े देखिये). अलबत्ता यह भी बताना जरुरी है कि सुधार की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है.

कुपोषण से निपटने में भारत की पिछले पच्चीस सालों की यात्रा:

वर्ष

1992 2000 2008 2017

भारत का स्कोर

46.2 38.2 35.6 31.4

नोट: यहाँ ऊँचे स्कोर का मतलब अधिक भूखमरी यानी खराब प्रदर्शन है. उपरोक्त आंकड़े को देखें तो पायेंगे कि सम्पूर्णता में देश ने भूखमरी की स्थिति में सुधार किया है.

चारो घटकों पर कैसा रहा प्रदर्शन:

घटक

विश्व

भारत

वर्ष

2000 2017 2000 2017

(%)जरुरत से कम भोजन मिलना (Undernutrition)

18.2 13 17.2 14.5

% बच्चे (<5साल)ठिगनापन (Stunting)

37.7 27.8 54.2 38.4

% बच्चे  ( <5 साल) कम वजन (Wasting)

9.9 9.5 17.1 21.0

% शिशु मृत्यु दर(<5yrs) (Child Mortality Rate)

8.2 4.7 9.1 4.8

इन आंकड़ो से साफ़ पता चलता है कि भारत चार सूचकों में से तीन में सुधार करता दिख रहा है. लेकिन कम वजन वाले सूचक में सुधार निराशाजनक रहा है और इस बार की आई रैंकिंग में भारत के पीछे खिसकने की ख़ास वजह यही है.

वृहत स्तर पर देखा जाए तो भारत पोषण की समस्या और शिशु मृत्यु दर में काफी अच्छा कर रहा है. इससे पता चलता है कि भोजन उपलब्ध कराने और स्वास्थय सुविधाओं को उपलब्ध कराने में देश ने अच्छी प्रगति की है. लेकिन ठिगनापन और कम वजन से निपटने में भारत का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है जिससे कुपोषण की समस्या बनी हुई है.

 

भारत का उसके पड़ोसी मुल्क के मुकाबले कैसा है प्रदर्शन

देश

% पोषण की समस्या

% ठिगने बच्चे

% कम वजन के बच्चे

% शिशु मृत्यु दर

श्रेणी ( रैंक ) 2017

भारत

14.5 38.4 21.0 4.8 100

पाकिस्तान

19.9 45.0 10.5 8.1 106

नेपाल

8.1 37.4 11.3 3.6 72

अफगानिस्तान

23.0 40.9 9.5 9.1 107

म्यांमार

16.9 29.2 7.0 5.0 77

श्रीलंका

   22.1 14.7 14.7 1.0 84

बांग्लादेश

15.1 36.1 14.3 0.6 88

चीन

9.6 6.3 1.8 1.1 29

 

इन आंकड़ो से साफ़ पता चलता है कि भारत भूखमरी के 2017 के स्कोर में नीचे क्यों आ गया है. यूँ तो किसी श्रेणी में भारत का प्रदर्शन अपने पड़ोसियों की तुलना में बहुत अच्छा नहीं है पर कम वजन वाली समस्या में भारत इन सबसे बहुत पीछे है. इस श्रेणी में इसके तुरंत बाद आने वाला देश श्रीलंका है जो भारत से करीब 7 प्रतिशत अंक (percentage point) बेहतर स्थित में है.

लम्बाई की तुलना में कम वजन (wasting) के पीछे कारण

 बच्चों में इस तरह का कुपोषण हठात भोजन की कमी की वजह से होता है. इसमें भोजन की मात्रा और उसकी गुणवत्ता दोनों शामिल है. इस श्रेणी में बच्चों की संख्या बढ़ने का तात्पर्य हाल ही में आई भोजन की आई हठात कमी की वजह से होता है. अन्यथा आप देखेंगे तो पायेंगे कि भारत ने पिछले कुछ सालों में कुपोषण के अन्य मानक पर ठीकठाक सुधार किया है.

बच्चो में कुपोषण ( उम्र<5 साल).( राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण-NFHS)

मानक

NFHS 2005-06 (%)

NFHS 2015-16 (%)

लम्बाई के हिसाब से कम वजन होना (wasted)

19.8 21

अत्यधिक वजन कम होना (Severely wasted)

6.4 7.5

उम्र के हिसाब से वजन कम होना (Underweight)

42.5 35.7

ठिगनापन (Stunted)

48 38.4

नोट यह सारे मानक विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा तय किया गए हैं जिसमे लम्बाई के हिसाब से वजन कम होना मतलब मानक से दो स्तर का मानक विचलन (Standard Deviation) जबकि अति वजन कम होने का मतलब तीन और उससे ऊपर का मानक विचलन.

एक बच्चा जिसको पोषण सुरक्षा नहीं मिलती हैं उसका वजन नहीं बढ़ता है इसी को wasting कहते हैं. अगर भोजन में पौष्टिकता की कमी लागातार बनी रहती है तो बच्चे का कद बढ़ना  रुक जाता है इसको stunting कहते हैं. यह सामान्यतः दो साल से कम उम्र के बच्चे में ही होता है. एक बार stunting हो जाने पर उसको वापस सुधारने की सम्भावना कम होती है.

चूंकि आंकड़े बता रहे हैं कि भारत ने stunting की समस्या से अच्छे से निपट रहा है इसका तात्पर्य यह है कि लागातार भोजन की बनी रहने वाली समस्या कम हो रही है. लेकिंन wasting की समस्या तत्काल की कुछ समस्याओं की तरफ इशारा कर रहा है. अब तक हुए तमाम शोध से पता चलता है कि पोषण की सुरक्षा में भोजन की मात्रा और उसमे जरुरी पोषण, दोनों अनिवार्य है. अगर भारतीय बच्चों की stunting और wasting दोनों समस्या को मिलाके देखा जाए तो  (59.4%), पता चलता है कि भारतीय बच्चों को जरुरी लागातार बने रहने वाली भोजन की समस्या तो कम हुई है पर उसमे पोषण तत्व और तत्कालीन उपलब्धता में कहीं कुछ गड़बड़ी है.

इस गड़बड़ी को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि अभी भारत सरकार के पास भोजन उपलब्ध कराने के कई कार्यक्रम हैं. जैसे इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम (ICDS) और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन (NRHM). लेकिन इन कार्यक्रम की  गुणवत्ता पर सवाल खड़े किये जा सकते हैं. दूसरे यह भी ध्यान देने की बात है कि भारत में पिछले कुछ साल सूखा का भीषण प्रकोप रहा है जिसका सीधा प्रभाव ग्रामीण और दूर दराज के इलाकों पर पड़ता हैं.

इन सबके बावजूद एक विडम्बना यह भी है कि भारत में 30 प्रतिशत अनाज हर साल बर्बाद हो जाता है और फिर भी 60 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है. अगर सरकार अभी नहीं चेती तो भारत के लिए कुपोषण से सम्बंधित सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोआल पाना संभव नहीं होगा. इसके अंतर्गत भारत को 2025 तक wasting को शुन्य के स्तर पर लाना है.

इससे निपटने के लिए क्या किया जाना चाहिए:

 बच्चों का कुपोषण एक बड़ी समस्या है जो तत्कालीन तो शिशु मृत्यु दर बढ़ा सकता है और आगे इन बच्चों के बड़े होने पर कार्य करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. इससे स्वास्थय पर भी खर्च बढ़ेगा. इसके लिए बच्चों के शुरूआती दो साल पर अधिक ध्यान देना, लड़कियों का किशोरावस्था, गर्भवती और बच्चों के दूध पिलाती महिलाओं पर ख़ासा ध्यान देने की जरुरत है. इससे कुपोषण की समस्या से निपटा जा सकता है. यद्यपि सरकार  के वर्तमान कार्यक्रम का लक्ष्य भी यही लोग है पर उसकी गुणवत्ता बढ़ाना जरुरी है.

  1. जरुरी पोषण वाले भोजन उपलब्ध कराना. इसके लिए सरकार सब्सिडी देकर या लोगों को सस्ते में या मुफ्त में उपलब्ध कराये.
  2. आंगनवाड़ी में पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध कराना और इन आंगनवाड़ी केन्द्रों के लोगों तक पहुँच बढ़ाना.
  3. कमजोर तबके के लोगों को आंगनवाड़ी में आने के लिए अन्य तरह के प्रोत्साहन देना. जैसे day केयर सेंटर से पर आने के लिए बच्चों को कुछ ईनाम देना. हाजिरी के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम का इस्तेमाल करना. आने वाले बच्चों की संख्या के बल पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ईनाम देना.
  4. मध्याहन भोजन (Mid Day Meal) के समय छोटे भाई बहनों को विद्यालय में आने की इजाज़त देना.
  5. पोषण उपलब्ध करवाने वाली योजना को जरुरी बजट उपलब्ध कराना और साथ में इनकी अधिक निगरानी कराना. ये कार्यक्रम हैं ICDS, NRHM, MDM इत्यादि.जैसे दाल. कुपोषण खासकर wasting की ऐसी स्थिति की वजह भोजन की थाली में प्रोटीन की नहीं होना है.
  6. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में प्रोटीन युक्त भोजन उपलब्ध कराना.
  7. भोज्य पदार्थों के अचानक दाम बढ़ने को रोका जाना, खासकर चीजें जिनपर बहुत बड़ी संख्या में लोग प्रोटीन के लिए निर्भर हैं. दलहन भारतीय समाज के बहुत बड़े तबके के लिए प्रोटीन का स्रोत है.

हमें बेहतरीन मुल्कों के उदाहरण से सबक लेना होगा. ये देखना होगा कि कैसे चीन पिछले कुछ वर्षों में अपने मुल्क की लम्बाई औसतन एक इंच बढाने में कामयाब रहा है. साथ ही, सरकारी संस्थाओं को यह अनवरत कोशिश करनी होगी कि गर्भवती महिलाओं, सद्य-प्रसूता स्त्रियों तथा माताओं को भी पौष्टिक आहार मिले. सही जानकारी और समय रहते जानकारी भी स्वास्थ्य के इन आकंड़ों को सुधारने में मदद करेगी.

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