भारत में लीद से हो रही है हाथियों की गिनती पर ये कितनी कारगर

0
आल इंडिया रेडियो से साभार

सौतुक डेस्क/

बीते 12 अगस्त को सरकार की तरफ से देश में हाथियों गणना के शुरूआती आंकड़े प्रकाशित हुए. अभी यह गणना चल रही है और संभवतः नवम्बर तक चलेगी. इस गणना की खास बात यह है कि हाथियों के लीद को आधार मानकर देश में इस भीमकाय जानवर की गिनती हो रही है.  पूरे देश में पहली बार ऐसा हो रहा है. इसके पहले सामान्यतः हाथियों को देखकर उनकी गिनती की जाती थी. लेकिन इस पद्धति को अब वैज्ञानिक तौर पर उतना कारगर नहीं माना जाता है.  बहरहाल, इस पर बात आगे करेंगे, पहले ये देखते हैं इस गणना का परिणाम क्या आया.

पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 12 अगस्त को जारी की गयी रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक में हाथियों की संख्या (6,094) सबसे ज्यादा  है, इसके बाद असम (5,71 9) का नंबर आता  है. और केरल (3,054) इस कड़ी में तीसरे पायदान पर  है.

यह आंकड़ा वर्ष 2012 में हुई पिछली गणना में अनुमानित संख्या के मुकाबले कम है. साल 2012 में हुई गिनती के मुताबिक यह संख्या कुछ 29,391 और 30,711 के बीच थी. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों गणनाओं की आपस में तुलना नहीं हो सकती. क्योंकि 2012 में, विभिन्न राज्यों ने अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया और देश भर के प्रयासों में कोई तारतम्यता नहीं थी.  विशेषज्ञों का मानना है कि त्रुटियां और दुहराव भी काफी रहे होंगे. हो सकता है इस वजह से उस वर्ष संख्या अधिक हो गई हो.

अंग्रेजी अखबार द हिन्दू से बात करते हुए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के रमन सुकुमार का कहना है कि इस बार जन्म दर सहित कई सूचकांक, यह दर्शाते हैं कि हाथियों की आबादी बढ़ रही है.  प्रोफेसर सुकुमार दो दशकों से अधिक समय से हाथी की आबादी पर अध्ययन कर रहे हैं. परियोजना हाथी के निदेशक आर के श्रीवास्तव भी कुछ ऐसा ही  मानते  हैं. उनके अनुसार भी नब्बे के दशक से अब तक हाथी संख्या में मामूली वृद्धि हुई है.

क्यों है इस बार की गणना पहले से अलग?

पाठकों को यह मालूम होना चाहिए कि हाथियों की सँख्या जहां अच्छी है, उन राज्यों के वन विभाग प्रत्येक पांच वर्ष में इनकी सँख्या का अनुमान लगाने के लिए राष्ट्रव्यापी गणना कार्यक्रम का आयोजन करते हैं. दक्षिणी राज्यों को छोड़कर बांकी के सभी राज्य सामन्यतः प्रत्यक्ष गणना पद्धति का उपयोग करते हैं.  लेकिन इस पद्धति की वैज्ञानिकता पर सवाल उठते रहे हैं.

इसी सवाल से निपटने के लिए अब हाथियों के लीद का सहारा लेकर उनकी संख्या का अनुमान लगाया जाएगा. दक्षिणी राज्यों में अप्रत्यक्ष गोबर गिनती पद्धति 2002 में ही शुरू की गई थी. इस बार यह पूरे देश में हो रहा है.

लीद और क्षरण माध्यम से होने वाली यह पहला अखिल भारतीय हाथी संख्या आकलन होगा. शुरूआती आकलन के अनुसार, भारत में एशियाई हाथियों की आबादी 27,312 बताई  गई है. फिलहाल, हाथियों की गणना करने की पुरानी पद्धति से ही इसका आकलन किया गया है.

इसके बाद दूसरे स्तर की गणना होगी जिसमे हाथियों के लीद या कहें गोबर की गिनती की जायेगी. साथ ही यह भी अनुमान लगाया जाएगा कि यह लीद कितने समय में खराब होने लगता है. इसीलिए इसे लीद और क्षरण (डंग एंड डीके) पद्धति के नाम से जाना जाता है. इसमें एक हाथियों के संख्या के घनत्व के आधार पर सुनिश्चित दायरा तय कर लीद की गिनती की जाएगी. फिर उसमे उनके क्षरण के हिसाब से अनुमान लगाया जाएगा कि उस नियत क्षेत्र में कितने हाथी हो सकते हैं. उसके आधार पर पूरे क्षेत्र का अनुमान किया जाएगा. आखिर में इस अनुमानित आंकड़े के साथ अभी जो संख्या मिली है उससे मिलान किया जाएगा.

लेकिन कितनी कारगर है यह नई पद्धति?

विशेषज्ञ मानते हैं कि नई पद्धति पुराने से तो बेहतर है, जिसमे सिर्फ हाथियों को देखकर उनका अनुमान नहीं लगाया जाएगा. इसमें नियत क्षेत्र में गणना हो रही है और कुछ हाथी किसी झाड़ झंखार में छिपे रहे तो पूरा का पूरा अनुमान गलत हो जाता है. क्योंकि इस सैंपल को आगे के आंकलन के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

नई पद्धति में लीद को भी देखा जाएगा और पुरानी पद्धति से निकाले गए आंकड़े से इसका मिलान किया जाएगा तब जाकर हाथियों की सही संख्या मानी जायेगी.

पर इस नई पद्धति की भी अपनी सीमायें है. जैसे हाथियों के गोबर के गणना में यह भी देखा जाएगा की यह कितना पुराना है जिससे गिनती में दुहराव से बचा जा सके. लेकिन इन लीद के खराब होने की जो समझ होगी वह पालतू हाथियों के अध्ययन से तैयार होगी. जबकि पालतू हाथी और जंगली हाथी के खान-पीन में अंतर होगा. इसलिए जरुरी नहीं कि पालतू हाथी के लीद पर हुआ अध्ययन जंगली हाथियों के लिए सही साबित हो. दूसरे हाथियों के लीद का आंकड़ा इसलिए भी अलग हो सकता है कि कोई हाथी हो सकता है उस दिन स्वस्थ न हो.

हाथियों के गिनती के लिए इस्तेमाल हो रहे नई पद्धति पर ऐसे तमाम संदेह है पर इतना तो तय है कि यह पुरानी पद्धति से अधिक सटीक होगा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here