‘आईआईएम दुनिया के सबसे कम विविधता वाले शिक्षण संस्थानों में’

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सौतुक डेस्क/

आईआईएम  के नाम से मशहूर भारतीय प्रबंधन संस्थान के कुछ पुराने छात्रों ने सरकार को पत्र लिखकर यह बताया है कि आईआईएम आरक्षण को लेकर सचेत नहीं है और सरकार के द्वारा लिखे पत्र का उल्लंघन भी कर रहा है. इस बाबत अपनी बात कहने के लिए इन पुराने छात्रों  ने सरकार से मिलने की अनुमति मांगी है.

इनके अनुसार दस आईआईएम में महज दो अनुसूचित जाति (एससी) और 13 अन्य पिछड़ा (ओबीसी) वर्ग के फैकल्टी सदस्य हैं और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का तो कोई सदस्य है ही नहीं. इन संस्थाओं में कुल फैकल्टी की संख्या 512 है.

सूचना के अधिकार से निकाले गए इन आंकड़ो को देखते हुए दुनिया भर में काम कर रहे हैं आईआईएम के पुराने छात्रों ने राष्ट्रपति  राम नाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर उनसे संविधान के आधार पर इन संस्थाओं में आरक्षण लागू करने की मांग की है.

अपने खुले पत्र में इन पुराने छात्रों ने यह भी बताया है कि इस लिहाज़ से आईआईएम में चल रहे स्थापित फेलो प्रोग्राम इन मैनेजमेंट (एफपीएम) की भी स्थिति सही नहीं है. आईआईएम अहमदबाद, कोलकाता, बंगलुरु, और लखनऊ में ऐसे कोर्स में एससी, एसटी और ओबीसी के महज 24 छात्र हैं जबकि कुल छात्रों की संख्या 388 है.

वर्तमान में आईआईएम पीजीपी प्रोग्राम (जो एमबीए के सामान है) में आरक्षण नीति लागू है पर एफपीएम, एग्जीक्यूटिव एमबीए और शिक्षकों के चयन में नहीं. जबकि आईआईएम अहमदाबाद और कोलकाता 1961 में ही स्थापित हुए थे.

इस पत्र में कहा गया है, “आरटीआई से निकाले गए विविधता के आंकड़े दिखाते हैं कि एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय से आने वाले छात्रों की उपस्थिति रिसर्च और अध्यापन में नहीं के बराबर है. कई सालों से इन समुदाय के लोगों को शामिल नहीं करने से आईआईएम दुनिया के वैसे कुछ संस्थानों में शामिल हो गए हैं जहां विविधता की भारी कमी है.”

इस पत्र में यह भी बताया गया है कि हाल ही में प्रकाशित एफपीएम कोर्स में दाखिले के लिए प्रकाशित विज्ञापन में भी आरक्षण नीति का जिक्र नहीं हैं जो कि मानव संसाधन मंत्रालय के आईआईएम को लिखे पत्र का खुला उल्लंघन है.

आईआईएम से सम्बंधित बिल जो पिछले मानसून सत्र में लोक सभा में पारित हुआ और अभी राज्यसभा में पारित होना है वह आईआईएम को और अधिक स्वायत्तता देने की बात करता है. इस बिल के अनुसार, एक बोर्ड ऑफ़ गवर्नर होगा जो आईआईएम के सुचारू रूप से चलने पर निगरानी रखेगा. इसमें यह व्यवस्था तो है कि समाज के अन्य हिस्सों जैसे महिलाओं, उद्योग जगत और सरकारी पक्ष की सहभागिता रहेगी. पर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व का इसमें कोई जिक्र नहीं है.

इनके समर्थन में कुछ संस्थाओं ने अपना नाम दिया है जैसे डॉक्टर अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन, डॉक्टर अम्बेडकर एसोसिएशन ऑफ़ नार्थ अमेरिका, इंटरनेशनल कमीशन ऑफ़ दलित राइट्स इत्यादि.

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