उपराष्ट्रपति पद के दावेदार गोपालकृष्ण गांधी का कैसे हो रहा है विरोध

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सौतुक डेस्क/

महात्मा गाँधी के परपोते गोपालकृष्ण गाँधी को विपक्ष ने उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है. 22 अप्रैल, 1945 को जन्मे गोपालकृष्ण गांधी वर्ष 1968 से लेकर 1992 तक प्रशासनिक सेवा में रहे. इसके पश्चात वे कई बड़े पदों पर रहे जिसमे पश्चिम बंगाल का गवर्नर होना भी शामिल है. उन्होंने विक्रम सेठ की किताब अ सूटेबल बॉय का हिंदी अनुवाद किया है. साथ ही श्रीलंका के तमिल मजदूरों को विषय बनाकर एक उपन्यास भी लिखा.

लेकिन जब से विपक्ष ने उप-राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम की घोषणा की है लोग उनका अजीबो-गरीब तरीके से विरोध कर रहे हैं. जैसे आज ही परेश रावल ने एक ट्वीट किया जिसमे उन्होंने कहा एक ऐसा इंसान जिसने एक आतंकवादी को बचाने के लिए मर्सी पेटीशन फाइल किया था आज वह उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार है, और कितना लोकतंत्र चाहते हैं हम. उसी तरह शिवसेना के नेता संजय राउत ने ट्वीट किया कि क्या आप गोपालकृष्ण गाँधी को उपराष्ट्रपति के तौर पर देखना चाहते हैं? जिसने 1993 के मुंबई बम धमाके के दोषी याकूब मेमन के फांसी की सजा का विरोध किया था.
विरोध करने वाले लोग मूलतः गोपालकृष्ण गांधी के राष्ट्रपति को लिखे उस पत्र के बारे में बात कर रहे हैं जिसमे इन्होने याकूब मेमन के फांसी की सजा को माफ़ करने की अपील की थी. गांधी ने यह पत्र 29 जुलाई 2015 को लिखा था जो कुछेक समाचार पत्रों में भी छपा.
इस पत्र में गांधी ने लिखा था कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को श्रधांजलि देने  का सबसे अच्छा तरीका होगा कि याकूब के मर्सी पेटीशन को स्वीकार कर लिया जाए. उनके अनुसार अब्दुल कलाम फांसी की सज़ा के विरोध में थे. गांधी ने लिखा कि कलाम ने उसी महीने में किसी को फांसी की सज़ा दिए जाने का विरोध किया था.

अपने पत्र में उन्होंने 1997 के एक वाकये का जिक्र किया था जिसमे उस समय के राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने महाश्वेता देवी, प्रसिद्ध लेखिका के निवेदन पर आखिरी समय में आन्ध्र प्रदेश के दो लड़कों की फांसी की सज़ा माफ़ कर दी. एक बार उन लड़कों की अपील पहले खारिज हो चुकी थी. फिर उन्होंने याकूब के कानूनी जांच के दौरान मदद करने का भी हवाला दिया. उन्होंने सर्वोच्च न्यायलय के पूर्व न्यायधीश के बयान का भी जिक्र किया जिसमे उन्होंने कहा था कि अगर याकूब को फांसी होती है तो यह उसके साथ अन्याय होगा.
सनद रहे कि गांधी ने याकूब के सिर्फ फांसी की सजा (मृत्युदंड) माफ़ करने का निवेदन किया था न कि किसी भी तरह के सजा माफ़ करने का. गोपालकृष्ण गाँधी ने याकूब के बारे में लिखते हुए यह भी नहीं लिखा कि वह दोषी है या नहीं है. लेकिन अभी उनका विरोध करने वाले इसको ऐसा बता रहे हैं जैसे गोपालकृष्ण गांधी ने याकूब मेमन का बचाव किया था जो कि सही  नहीं हैं.

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