हिन्दी देश की सवा अरब आबादी के अंतर्प्रान्तीय व्यवहार की भाषा है

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The President, Shri Pranab Mukherjee at the Hindi Divas Samaroh, in New Delhi on September 14, 2016. The Union Home Minister, Shri Rajnath Singh and the Minister of State for Home Affairs, Shri Kiren Rijiju are also seen.

सदानंद शाही/

कवि, आलोचक डॉ. सदानंद शाही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. इन्होने बीएचयू में 2009 में भोजपुरी अध्ययन केंद्र की स्थापना की और ‘भोजपुरी जनपद’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक भी हैं. साथ ही हिंदी पत्रिका ‘साखी’ का सम्पादन भी करते हैं. इन्होने क्षेत्रीय भाषाओं खासकर भोजपुरी की आवाज हमेशा बुलंद करने का प्रयास किया है. हिंदी दिवस के उपलक्ष्य पर लिखे इस लेख में शाहीजी ने भाषाई बहुलता और विविधता का बेहतरीन रेखांकन किया है.

 

ज फिर हिन्दी दिवस है.पूरे देश में हिन्दी दिवस मनाया  जा रहा है . हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवारा पहले से ही शुरू हो गया है. हिन्दी दिवस पर होने वाले भाषणों की याद के आधार पर कह सकता हूँ कि आज बड़े ज़ोर शोर से हिन्दी को प्यार की ,सत्कार की, उपकार की भाषा बताया जाएगा. हिन्दी को शृंगार की, ओज की और शौर्य की भाषा भी बताया जाएगा .  शौर्य पर ज़ोर थोड़ा ज्यादा होगा . हिन्दी को आन, बान ,शान और सम्मान की भाषा बताते हुये बताने वालों के नथुने फड़फड़ा उठेंगे. उसे ज्ञान और विज्ञान की भाषा भी बताया जाएगा . यह सब बताते हुये पुराण ,मिथक और इतिहास सब को गड्ड मड्ड कर दिया जाएगा.

सदानंद शाही

हिन्दी को संविधान ही नहीं दुनिया जहान की भाषा बताया जाएगा.  यह सब बताते बताते समारोह सम्पन्न होंगे.  कहीं -कहीं यह सब बताने वाले पंडों  और पुरोहितों को पर्याप्त दान दक्षिणा भी मिलेगी. दक्षिणा देने वाला यज्ञ पूरा होने पर कृत कृत्य होगा और पाने वाला संतोष की खट्टी-मीठी  डकार लेते हुये ,धन्य होते हुये घर चला जाएगा.  इस तरह हिन्दी दिवस का अवसान हो जाएगा.  हिन्दी सप्ताह और पखवाड़ों के बैनर महीनों तक लटकते धूल खाते रहेंगे.  जिनकी सुधि कोई नहीं लेगा.  फिर अगले हिन्दी दिवस तक के लिए हिन्दी मुल्तवी कर दी जाएगी.  हिन्दी दिवस के नाम पर यह एक प्रहसन जैसा होता चला आ रहा है.

भारत सरकार और प्रदेश सरकारों का यानि जनता का लाखों करोड़ों रुपया सर्फ कर दिया जाएगा फिर भी यह नहीं बताया जाएगा कि आखिर क्या बात है कि विश्व भाषा बनना तो दूर अभी तक ‘हमारी राष्ट्रभाषा’ ठीक ठिकाने से राजकाज की भाषा ही नहीं  बन पायी.

स्वाधीनता आंदोलन के दौर में इस बहुभाषी देश ने  हिन्दी को सर आँखों पर बैठा रखा था.  इसके पीछे प्राय: वे लोग थे जिन्हें ‘अहिन्दी’ भाषी या ‘गैर हिन्दी’ भाषी कहते हैं.  गांधी, रबीन्द्रनाथ टैगोर ,सुभाष चन्द्र बोस जैसे कितने ही नाम हैं जिन्होंने अपनी समृद्ध भाषाओं की अपेक्षा हिन्दी की हिमायत की थी. यह जरूर ध्यान रखना चाहिए वह व्यापक हिन्दी थी  जिसके बारे में इंदौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में गांधी ने कहा था –‘हिन्दी उस भाषा का नाम है,जिसे हिन्दू और मुसलमान कुदरती तौर पर बगैर प्रयत्न के बोलते हैं. हिन्दुस्तानी और उर्दू में कोई फर्क नहीं है. देवनागरी लिपि में लिखी जाने पर वह हिन्दी और अरबी में लिखी जाने पर उर्दू कही जाती है. जो लेखक या व्याख्यानदाता चुन-चुन कर संस्कृत या अरबी –फारसी के शब्दों का ही प्रयोग करता है,वह देश का अहित करता है.  हमारी राष्ट्रभाषा में वे सब प्रकार के शब्द आने चाहिए ,जो जनता में प्रचलित हो गए हैं.  हर व्यापक भाषा में यह शक्ति रहती ही है. इसलिए तो वह व्यापक बनती है’. गांधी के भाषा संबंधी चिंतन की धुरी जनता है ,इसीलिए आगे चलकर वे नेहरू को लिखते हैं कि कांग्रेस के लोगों को आपस में पत्र व्यवहार हिन्दी में करना  चाहिए,(क्योंकि) इससे जनता का हित होगा. भाषा के बारे में गांधी की निगाह बहुत साफ थी . एक जगह उन्होंने ‘नीचे लिखे हुए’  की जगह ‘निम्नलिखित’ के प्रयोग पर आपत्ति की थी.  गांधी भाषाविज्ञान के हिसाब से चल रहे थे –भाषा विज्ञान यही बताता है कि भाषा जटिलता से सरलता की ओर चलती  है.   गांधी के तमाम प्रयत्नों के बावजूद हिन्दी को व्यापक बनने नहीं दिया गया क्योंकि हिन्दी के जो भाग्य विधाता हुये उनके लिए भाषा का मानक जनता का हित नहीं रह गया. उनके अपने हिट प्रमुख होते गए और जनता की हिन्दी ‘पंडितों’ की हिन्दी होती चली गयी.  यह भी एक प्रमुख वजह है कि  आजादी के बाद हिन्दी  के हिमायती कम हुये. ।जब हिन्दी विनम्र और समावेशी  थी तब  उसकी हिमायत बंगाली ,गुजराती,तमिल, तेलगु सब कर रहे थे.  आजादी के बाद उभरे अंध हिंदीवाद के नाते धीरे- धीरे हिन्दी ने  अखिल भारतीय हिमायतियों को खोना शुरू कर दिया.  हिन्दी  विरोधी बढ़ते गए.  कभी रबीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि यह न समझें कि केवल संख्याबल के कारण हिन्दी राष्ट्रभाषा बनेगी.  हिन्दी कि आंतरिक शक्ति को विकसित करना होगा.  लेकिन अंध हिंदीवादियों ने कविगुरु की बात के उलट संख्या बल को हिन्दी की शक्ति माना.  हिन्दी का संख्याबल दिखाने के लिए भोजपुरी आदि मातृभाषाओं को छोडकर हिन्दी को मातृभाषा बताया जाने लगा.  इस तरह देश की अधिकांश आबादी को हिन्दी भाषी बताकर एक ‘गैरहिन्दी’ या ‘अहिंदी’ भाषी जैसा नकारात्मक विशेषण गढा गया.  हिन्दी विरोध की राजनीति के मूल में इस नकारात्मक विशेषण की बड़ी भूमिका है.  संख्याबल के तर्क ने शेष भारत के मन में हिन्दी और हिन्दी भाषियों के वर्चस्व की नकारात्मक आशंका को जन्म दिया.  इस आशंका को दूर करने की जो भी कोशिशें हुईं उन्हें अंध हिंदीवादियों के पाखंड ने ध्वस्त कर दिया.  त्रिभाषा सूत्र इसी तरह की एक कोशिश थी जिसमे मातृभाषा ,राष्ट्रभाषा और अँग्रेजी पढ़ने पढ़ाने  का विधान किया गया.  उत्तर भारत में तीसरी भाषा के रूप में किसी और भारतीय भाषा को रखा जाना था ,लेकिन हिन्दी क्षेत्र में तीसरी भाषा के रूप में भारतीय भाषा की जगह संस्कृत को वरीयता देकर त्रिभाषा फार्मूले की हवा निकाल दी गयी.  दक्षिण के लोग  हिन्दी को स्वीकार करें लेकिन हम दक्षिण की भाषाओं को स्वीकार करना कौन कहे पढ़ें भी नहीं और तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को  दिखाकर चोर दरवाजे से निकल लें.

इस अंध हिंदीवाद ने अन्य प्रादेशिक भाषाओं से तो छल किया ही भोजपुरी आदि उन भाषाओं को भी हीन और क्षुद्र दिखा बता कर मारने की कोशिश की जिनके आधार पर हिन्दी का संख्याबल दिखाया जाता है .  प्राय: इन भाषाओं की आवाज यह कह कर दबाने की कोशिश की जाती है कि इससे हिन्दी कि क्षति होगी ,कि हिन्दी संख्याबल में पिछड़ जाएगी . जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है.  यदि भोजपुरी ,अवधी, ब्रज आदि मातृभाषाओं की अहमियत स्वीकार कर ली जाए और हिन्दी को देश की आपसी संवाद की भाषा के रूप में रखा जाये तो बहुत से भ्रम दूर हो जाएंगे. अभी हाल में मैंने  हैदराबाद से नांदेड़ और नांदेड़ से वापस हैदराबाद टैक्सी से गया और आया.  दोनों यात्राओं में ड्राईवर तेलंगाना के थे. उन्हें बमुश्किल काम चलाऊ हिन्दी आती थी लेकिन वे रास्ते भर हिन्दी फिल्मों के गाने  सुनते रहे.  वे अपनी सवारियों से हिन्दी में ही मोल तोल करते हैं. इस तरह देखने पर हम पाते हैं कि हिन्दी भारत के  सवा अरब आबादी की संपर्क भाषा है. हिन्दी की  असली शक्ति भी  इसी बात में निहित है.   जब मातृभाषा के रूप में हिन्दी  के  संख्याबल को बढ़ाने की बात की जाती है  तो संपर्क भाषा के रूप में  हिन्दी बोलने और बरतने वालों की संख्या आधी कर दी जाती  है. इस बात को हम अँग्रेजी के उदाहरण से समझ सकते हैं.  अँग्रेजी की ताकत इस बात में नहीं है कि वह कितने लोगों की मातृभाषा है ,बल्कि इस बात में है कि कितने लोग अँग्रेजी का व्यवहार करते हैं.  ऐसे ही  हिन्दी प्रेमियों के लिए कभी गालिब ने कहा होगा –हुए तुम दोस्त जिसके ,दुश्मन उसका आसमां क्यों हो.

हिन्दी का असल पक्ष यह है कि वह महज कुछ करोड़ लोगों की  मातृभाषा ही नहीं; बल्कि समूचे देश की सवा  अरब आबादी के अंतर्प्रान्तीय व्यवहार की भाषा है.  हिन्दी की यह ऐसी ताकत है जिसका कोई तोड़ नहीं है,कोई जवाब नहीं है.   हम हिन्दी दिवस अवश्य मनाएँ लेकिन कवि त्रिलोचन की  यह  बात  जरूर ध्यान में रहे – हिन्दी उनकी भाषा है जिनकी साँसों को आराम नहीं था.  यानि यह  जन की और जन समूह की भाषा है.

 

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