क्या कोई आरक्षण-विरोधी गटर में घुटकर बेमौत मरा है?

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आज़ाद सिंह डबास/

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता वेजवाड़ा विल्सन की संस्था दलितों और मैला उठाने वालों के लिए कार्य करती है. विल्सन के अनुसार वर्ष 2000 से अब तक 1,760 लोगों की गटर-सीवर साफ करते हुए मौत हो चुकी है. हर साल औसतन 100 लोगो की मौत गटर की सफाई के दौरान होती है. विल्सन की संस्था ने इन मौतों के जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने हेतु मांग की है. इस संबंध में दायर की गई आरटीआई से उन्हें जानकारी मिली है कि किसी भी राज्य की पुलिस द्वारा इन मामलों में एक भी चार्जशीट फाइल नही की गई है.

सीवर की सफाई पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाली दिव्या भारती का कहना है कि शहर में हुई मौतें तो मीडिया के कारण पता चल जाती हैं लेकिन गांव में हो रहे हादसों के बारे में आंकड़ा सामने ही नहीं आ पाता है. कानूनन सफाई कर्मचारियों को 48 किस्म के सुरक्षा उपकरण प्रदान करवाये जाने चाहिए लेकिन उन्हें कुछ भी उपलब्ध नही कराया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय एवं राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग द्वारा सीवर को मशीनों से साफ करने के निर्देश देने के बावजूद सरकारों पर कोई असर नही पड़ रहा है. सीवर सफाई में होने वाली मौतों का आंकड़ा जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद होने वाले सैनिकों से भी ज्यादा होना, शर्मनाक है. गटर की सफाई के दौरान मरने वाले समस्त व्यक्ति दलित समाज से हैं.

आजकल सवर्ण समाज से जुड़े कुछ संगठन दलितों को दिये गये आरक्षण का विरोध कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि विगत 70 वर्षों में दलितों ने इतनी तरक्की कर ली है कि उन्हें अब आरक्षण की जरुरत नहीं है. ऐसे लोग जो दलितों को दिये गये आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह भान ही नहीं है कि आज भी इस समाज के ज्यादातर लोग कितनी भयावह गरीबी में अपना जीवन यापन कर रहे हैं, अन्यथा सीवर की सफाई करने में कोई अपनी जान यू ही नही गंवा देगा. अगर आज भी यह प्रश्न पूछा जाय कि क्या किसी तथाकथित सवर्ण समाज के व्यक्ति ने गटर साफ करते वक्त अपनी जान गंवाई है? निश्चित ही इसका उत्तर नही में है. फिर ऐसे लोगों द्वारा आरक्षण का विरोध करना समझ से परे है.

सीवर की सफाई पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाली दिव्या भारती का कहना है कि शहर में हुई मौतें तो मीडिया के कारण पता चल जाती हैं लेकिन गांव में हो रहे हादसों के बारे में आंकड़ा सामने ही नहीं आ पाता है.

आरक्षण का विरोध करने वालों से मैं यह भी पूछना चाहता हूँ कि क्या कभी उनके पूवजों के मुंह पर कपड़ा और कमर में झाड़ू  लटकाई गई है? क्या उनकी परछाई से भी परहेज किया गया है? क्या उनको मंदिरों में प्रवेश देने से रोका गया है? क्या शादी-ब्याह के दौरान उन्हें घोड़ी पर चढ़ने से रोका गया है? क्या उनकी बसाहट गांव के एक तरफ बनाई गई है? क्या शमशान तक में उनसे भेदभाव किया गया है? मैं समझता हूँ कि यकीनन इसका उत्तर भी नहीं में है. आजादी के 70 वर्ष बाद भी क्या दलितों को बराबरी का दर्जा प्राप्त हो गया है? क्या सवर्ण समाज के लोग दलितों की बेटियों से शादी करने को तैयार हैं? क्या सदियों से दबे-कुचले समाज के साथ गांव में आज भी भेदभाव बरकरार नहीं है? जब तक समाज से भेदभाव समाप्त नहीं हो जाता है तब तक आरक्षण व्यवस्था बनी रहनी चाहिए और इसके विरोध का किसी को हक नहीं बनता है.

दलितों की तरह ही आदिवासी समाज भी दूर-दराज के जंगलों में अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन-यापन करता रहा है. इन क्षेत्रों में उचित शिक्षा एवं चिकित्सा सेवाओं का नितांत अभाव रहा है. आज भी ज्यादातर आदिवासी पुराने तरीकों से ही खेती-बारी  कर रहे हैं जिससे पैदावार बहुत कम होती है. आदिवासियों की एक बहुत बड़ी आबादी वनोपज संग्रहण कर अत्यंत गरीबी में अपना गुजर-बसर करने को मजबूर है. इन्हें रोजगार के कोई वैकल्पिक साधन उपलब्ध नहीं हो पाये हैं. अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल अनेक पिछड़ी जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक हालत दलितों एवं आदिवासियों से मिलती-जुलती ही है. यह अवश्य है कि ओबीसी में कुछ सक्षम जातियां भी हैं लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इन सक्षम जातियों में भी गरीबों की भरमार है.

इस हकीकत से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि मध्यप्रदेश में 52 फीसदी ओबीसी आबादी को केवल 14 फीसदी आरक्षण प्राप्त है. मध्यप्रदेष में आरक्षित वर्ग (अनुसूचित जाति 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 20 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग 14 प्रतिशत) को 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है. ऐसा होने से मात्र 15 फीसदी स्वर्ण आबादी को 50 फीसदी अघोषित आरक्षण प्राप्त है. इस तथ्य के बावजूद तथाकथित अनारक्षित वर्ग (स्वर्ण समाज) के लोग आरक्षण का विरोध करने हेतु सड़कों पर उतरे हुए हैं. ये लोग कतई नहीं चाहते कि एससी-एसटी को दिया गया आरक्षण बरकरार रहे और ओबीसी को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण दिया जाय. कुछ ओबीसी के लोग भी गुमराह होकर इनका साथ दे रहे हैं. सवर्णों के इसी खेल को उजागर करने के लिए हाल ही में ‘‘पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति संयुक्त मोर्चा” का गठन किया गया है. संयुक्त मोर्चा द्वारा 23 सितम्बर को भोपाल में एक विशाल रैली का आयोजन कर अपनी स्थिति स्पष्ट की गई है.

सवाल यह भी है कि क्या अनुसूचित जाति, जनजाति को 70 वर्ष एवं ओबीसी को 35 वर्ष के आरक्षण के बाद भी इन्हें देश के समस्त संसाधनों में सवर्ण  समाज के बराबर की भागीदारी प्राप्त है? क्या इन्हें उस स्तर की शिक्षा उपलब्ध है जो सवर्णों को मिलती है? इसका उत्तर है- नहीं. हाँ, यह अवश्य है कि दलितों, आदिवासियों एवं ओबीसी में कुछ चुनिंदा लोग जरुर सक्षम हो गये हैं जो अपने विवेक से आरक्षण का लाभ छोडने पर विचार कर सकते हैं. इन चंद लोगों की सक्षमता को देखते हुए आरक्षण को आर्थिक आधार पर देने का समय अभी नहीं आया है. 25 सितम्बर को भोपाल में आयोजित भाजपा कार्यकर्ता महाकुंभ में भाषण देते हुए प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अगड़ों-पिछड़ों में लड़ाई कराना देश को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाटने जैसा पाप बताया है. आरक्षण विरोधियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत तभी एक सशक्त राष्ट्र बन सकता है जब सभी जातियों/वर्गों का एक समान विकास हो.

(लेखक मध्य प्रदेश स्थिति सिस्टम परिवर्तन अभियान के अध्यक्ष हैं. उनसे उनके मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

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