साबरमती के किनारे चुनावी दंगल के बीच साबरमती के संत पर सवाल कितना जायज

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जितेन्द्र कुमार/

जितेन्द्र कुमार

पिछले सप्ताह हरियाणा के एक मंत्री ने ‘साबरमती के संत’ गीत के बहाने महात्मा गाँधी को निशाने पर लिया. बहुतों को मालूम नहीं है कि कवि प्रदीप ने फिल्म ‘जागृति’ के लिए यह गीत लिखा था और हेमंत कुमार ने संगीत दिया था. मशहूर गायक मोहम्मद रफ़ी ने इसे गाया था.

पता नहीं हरियाणा के विवाद प्रेमी स्वास्थ्यमंत्री अनिल विज ने फिल्म जागृति देखी थी या नहीं. सन्1954 में फिल्म निर्माता सशाधर मुखर्जी की फिल्म आयी थी: जागृति. इस फिल्म का निर्देशन किया था सत्येन बोस ने. मनोरंजन घोष ने इसकी पटकथा लिखी थी. फिल्म में धनी बाप के शरारती बेटे के सुधरने की मार्मिक पर आदर्शवादी कहानी है. मशहूर गीतकार प्रदीप ने ‘जागृति’ के लिए चार गीत लिखे जो सब के सब बहुत लोकप्रिय हुए. एक गीत साबरमती का संत इतना लोकप्रिय हुआ कि तब से आजतक गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के पुनीत अवसर पर देशभक्तिपूर्ण गीत के रूप में गाया जाता है.

सुननेवालों को याद भी नहीं है कि यह गीत किसने कब लिखा. सुननेवालों ने कभी एतराज भी नहीं किया अनिल विज के पहले. कम से कम इस मामले में अनिल विज प्रथम आये. इस फिल्म के अन्य गीत भी गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर गाये जाते हैं. उन गीतों में महाराणा प्रताप, शिवाजी और सुभाष चंद्र बोस का जिक्र है, लेकिन संघ के किसी नेता की चर्चा नहीं है. एक गीत का मुखड़ा है ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की. एक अन्य गीत का मुखड़ा है: ‘हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’. सन्1956 में फिल्म निर्माता सशाधर मुखर्जी को फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार ‘जागृति’ फिल्म के लिए मिला था. अभि भट्टाचार्य को फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार मिला था.

आइये ‘साबरमती के संत’ गीत की कुछ पंक्तियाँ पढ़ें और इतिहास में झांके कि प्रसिद्ध गीतकार प्रदीप ने गीत में कितना यथार्थ लिखा और महात्मा गाँधी का कितना महिमामंडन किया.

दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के संत तूने कर दिया  कमाल
आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल

धरती पे लड़ी तूने अजब ढब की लड़ाई
दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फक़ीर खूब करामात दिखाई

चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल

हरियाणा के स्वास्थ्यमंत्री अनिल विज को ‘साबरमती के संत’ पदावली पर सख्त एतराज है. भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लाभ लेते हुए मंत्री जी का कहना है कि इस गीत ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की गलत तस्वीर पेश की है. उन्होंने कहा ‘गीत के बोल’ दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल/ साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ में उन शहीदों का उल्लेख नहीं किया गया है जिन्होंने विदेशी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चलाया था.

मंत्री जी के कथन से बहुतों की सहमति हो सकती है कि भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष चलानेवालों के योगदान की पर्याप्त चर्चा कांग्रेसी हुकूमत के दिनों में नहीं हुई. लेकिन ‘गोली’ और ‘बोली’ जब उचित स्थान से निकलती है तब प्रभा-कारी सिद्ध होती है. अनिल विज के मुँह से निकली इस लोकप्रिय हिन्दी गीत के खिलाफ ‘बोली ‘संदेह पैदा करती है. क्योंकि हरियाणा के स्वास्थ्यमंत्री वही व्यक्ति हैं जो बलात्कार और हत्या के आरोपी तथाकथित संत गुरमीत राम रहीम को जन्मदिन की बधाई देने उनके डेरे पर गये थे और सार्वजनिक धन से 51 लाख रुपये उपहार स्वरुप उस बलात्कारी बाबा को भें ट किया था.

भाजपा के हरियाणा के मंत्री अनिल विज

मंत्री अनिल विज के कथन से लगता है जैसे वे स्वतंत्रता संघर्ष में सशस्त्र संघर्ष चलानेवालों के बड़े हिमायती हैं, लेकिन भारतीय इतिहास इसकी गवाही नहीं देता. वे जिस संगठन से गहराई से नाभिनाल जुड़े हैं वह संगठन अपने जन्मकाल से स्वतंत्रता संघर्ष से दूर रहा है उसकी धारा न गाँधीवादी धारा से जुड़ी, न क्रांतिकारी धारा से. क्रांतिकारी धारा पर घोषित रूप से मार्क्सवाद का प्रभाव था जिसका प्रबल विरोधी संघ रहा है. इसलिए हरियाणा के स्वास्थ्यमंत्री को क्रांतिकारी धारा के अमर शहीदों के गुणगान करने का कोई ऐतिहासिक नैतिक अधिकार नहीं है. उन क्रांतिकारियों का महिमामंडन भी अनिल विज या उनके साथी पचा नहीं पायेंगे.

मुझे लगता है कि ‘पद्मावती’ फिल्म की तरह अनिल विज फिल्म ‘जागृति’ को भी विवादास्पद बनाना चाहते हैं या संघ-भाजपा के लोग देश की बुनियादी चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए  के लिए  नये नये मुद्दे गढ़ते रहते हैं. अब क्या इस गीत के लिए कवि प्रदीप, अभिनेता अभि भट्टाचार्य, गायिका आशा भोंसले, गायक

मोहम्मद रफ़ी आदि के खिलाफ मोर्चा खोला जायेगा. सभी संस्थाओं की स्वायत्तता पर लगातार हमले हो रहे हैं, देश की जीडीपी गिर रही है, महँगाई बढ़ रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, अराजकता बढ़ रही है, प्रधानमंत्री चमक खो रहे हैं; ऐसे में उलजुलूल मुद्दे उठाकर ही जनता को अनुत्पादक बौद्धिक बहस की ऐय्यशी में फँसाया जा सकता है.

महात्मा गाँधी से बीसवीं सदी प्रभावित रही है. उनको प्रतीक बनाकर उपन्यास लिखे गये, कहानियाँ लिखी गई, कवियों ने कविताएँ लिखीं, हजारों शोधार्थियों ने शोध किये, फिल्मकारों ने फिल्में बनाई, उन्हें अनिल विज जैसे लोग मिटाना चाहें तो कैसे मिटा सकते हैं.बीसवीं सदी के तीसरे दशक में भारत, चीन, श्रीलंका, वर्मा, इंडोचीन में स्वतंत्रता संघर्ष उत्कर्ष की ओर अग्रसर था.

चीन में माओत्सेतुंग साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे थे और भारत में उपनिवेशवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति का संघर्ष महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अहिंसक ढंग से लड़ी जा रही थी

चीन में माओत्सेतुंग साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे थे और भारत में उपनिवेशवाद के खिलाफ राष्ट्रीय मुक्ति का संघर्ष महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अहिंसक ढंग से लड़ी जा रही थी. अन्य धारायें भी सशस्त्र संघर्ष चला रही थीं. भारत चीन का पड़ोसी मुल्क है लेकिन दोनों देशों की ऐतिहासिक सामा-जिक आर्थिक परिस्थितियाँ सर्वथा भिन्न थीं. महात्मा गाँधी ने माओ के संघर्ष का रास्ता नहीं अपनाया. गाँधी ने अपने नारे गढ़े. असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन,, विदेशी वस्त्रों का बहिस्कार, चर्खा से सूत काटकर अपने वस्त्र के मामले में आत्मनिर्भरता, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन, करो या मरो आदि के नारे गाँधी की दिमाग के मौलिक उपज थे. इसलिए कवि प्रदीप ने ‘जागृति’ फिल्म के लिए ठीक ही गीत लिखा—

धरती पे लड़ी तूने अजब ढब की लड़ाई
दागी न कहीं तोप न कहीं बंदूक चलाई
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फक़ीर खूब करामात दिखाई

क्या दुनिया के इतिहास में राष्ट्रीय मुक्ति की गाँधी की लड़ाई”अजब ढब की लड़ाई”नहीं थी? दक्षिण अफ्रीका के महान् स्वतंत्रता सेनानी नेल्सन मंडेला ने गाँधीवादी तरीके से अपने देश को गोराशाही से मुक्त कराया.

महात्मा गाँधी के विचारों ,व्यक्तित्व और कृतित्व से विदेशों की कई हस्तियाँ प्रभावित रही हैं. रिचर्ड एटनबरो के निर्देशन में सन्1982 ‘गाँधी’ फिल्म बनी. इस फिल्म में बेन किंग्सले ने महात्मा गाँधी का रोल किया. क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के लोग रिचर्ड एटनबरो और बेन किंग्सले को बुरा भला कहेंगे कि उन्होंने विदेशों में महात्मा गाँधी को महिमामंडित किया.

इस फिल्म में विदेशी कलाकारों के साथ अनेक मशहूर भारतीय कलाकारों ने भी रोल अदा किये. जैसे–रोशन सेठ(नेहरू),ओम पुरी, सईद जाफरी (सरदार पटेल),अमरीशपुरी, रोहिणी हत्तंगडी (कस्तूरबा गाँधी),अलीक पदमसी (मोहम्मद अली जिन्नाह), हर्ष नय्यर( नाथूराम गोडसे),सुप्रिया पाठक, आलोकनाथ, श्रीराम लागू, बीरेन्द्र राजदान (मौलाना आजाद),अनंग देसाई (जे. बी.कृपलानी), जलाल आगा और नानापालसिकर आदि थे. क्या अनिल विज और उनकी विचारधारा वाले लोग ‘गाँधी’ फिल्म के कारण भारतीय कलाकारों को दंडित करेंगे?कला के बारे में संघ वालों की समझ का कोई शानी नहीं!

कम्युनिस्ट विचारधारा के विद्वान भी महात्मा गाँधी की कार्यशैली और विचार सरणी से असहमति जताते रहे हैं, लेकिन उन्होंने गाँधी की हत्या करने की कभी सोची तक नहीं; गाँधी को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास, कला और साहित्य से बहिष्कृत करने का कोई अभियान नहीं चलाया जैसा हिन्दु महासभा, संघ, भारतीय जनसंघ, भाजपा और उसके अनुषंगी जनसंगठनों ने प्रचार अभियान चलाया.

पीपुल्स पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली से सन् 1969 में एक किताब प्रकाशित हुई है: दी महात्मा (मार्क्सवादी मूल्यांकन). इसमें चार वामपंथी लेखकों–एस. ए. डांगे, प्रो. हिरेन मुखर्जी, एस. जी. सरदेसाई और मोहित सेन के चार आलेख संकलित हैं. प्रो हिरेन मुखर्जी के लेख का शीर्षक ही है: ‘ए यूनिक लीडर’(अद्भुत नेता),एस. जी. सरदेसाई ने अपने लेख में गाँधी और सीपीआई के राजनीतिक संबंधों का क्रिटिकल मूल्यांकन किया है. एएस. ए. डांगे का आलेख बहुत महत्वपूर्ण है: महात्मा गाँधी एवं इतिहास. इस पुस्तक की भूमिका में एम. बी. राव ने स्वीकार किया है, “इतिहास की यह बिडंबना है कि महात्मा गाँधी के जीवनकाल में वामपंथियों सहित अन्य प्रगतिशील तत्वों ने गाँधी के साम्राज्यवाद विरोधी जनआंदोलनों के आयामों को नहीं समझा और उनको एक सुधारवादी नेता बताकर उनकी आलोचना करते रहे.”

सन् 1977 में जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसमें गाँधीवादी और संघी दोनों सरकार में शामिल थे. सरकार में गाँधीवादियों का वर्चस्व था. उन्होंने मद्यनिषेध के बहाने महात्मा गाँधी को याद किया, तब अटल-अडवाणी मद्यनिषेध का विरोध नहीं कर सके क्योंकि सत्ता में रहना जरूरी था. अब 26 मई, 2014 के बाद संघी अतिसक्रिय हो गये हैं. अब गाँधी और नेहरू मुक्त भारत बनाने का अभियान चला रहे हैं. स्कूल में हमारे मास्टर जी ने पढ़ाया था कि अगर किसी लकीर को छोटा करना चाहते हो तो उसके समानांतर उसके पास दूसरी बड़ी लकीर खींच दो. सुनने में यह बड़ा आसान लगता है लेकिन है बड़ा कठिन. इतने वर्षों के पश्चात संघियों को पता चला है कि जवाहरलाल नेहरु के दादा मुसलमान थे. ऐसा प्रचार करने से नेहरू के दादा मुसलमान थोड़े हो जायेंगे लेकिन प्रचारकों का स्तर तो पता चल ही जाता है.

सन् 1977 में जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसमें गाँधीवादी और संघी दोनों सरकार में शामिल थे. सरकार में गाँधीवादियों का वर्चस्व था. उन्होंने मद्यनिषेध के बहाने महात्मा गाँधी को याद किया, तब अटल-अडवाणी मद्यनिषेध का विरोध नहीं कर सके क्योंकि सत्ता में रहना जरूरी था

महात्मा गाँधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक शब्द दिया- ‘सत्याग्रह’. यह स्वतंत्रता आंदोलन का एक मंत्र हो गया. बिहार के प्रथम राज्यपाल आर. आर. दिवाकर ने कहा था– “यह महात्मा गाँधी नहीं थे जिन्होंने सत्याग्रह शब्द गढ़ा, बल्कि यह सत्याग्रह था जिसने महात्मा गाँधी को महात्मा गाँधी बना दिया.” अनिल विज और उनके कुनबे को भी सत्य का आग्रही होना चाहिये.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने एक पुस्तक संपादित की है: ‘मेकर्स ऑफ मॉडर्न एशिया’. इसमें एशिया के ग्यारह चर्चित व्यक्तियों की संक्षिप्त जीवनियाँ संकलित हैं. जिसमें शामिल हैं चीन के माओत्सेतुंग, चाओ-एन-लाई, तेंग सिआओ पिंग. भारत के महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू, पाकिस्तान के मोहम्मद अली जिन्नाह, इंडोनेशिया के सुहार्तो, वियतनाम के हो-ची-मिन्ह आदि का नाम शामिल है. इसमें दीन दयाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ हेडगवार, गुरु गोलवलकर, सावरकर आदि का नाम शामिल नहीं है. राँची कालेज का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी कालेज कर देने से भारत के नवनिर्माण में उनका नाम नहीं न हो जायेगा.

सुनील खिलनानी की चर्चित पुस्तक है: ‘इनकारनेशंस:फिफ्टी लाइभ्ज’. इसमें सुनील खिलनानी भारत के ढाई हजार वर्षों के इतिहास से पचास नामों को चुनते हैं जिन्होंने भारतीय धर्म, कला, पेंटिंग्स, राजनीति, साहित्य आदि को प्रभावित किया. इस सूची में बुद्ध, महावीर से लेकर चौधरी चरण सिंह और धीरूभाई अंबानी के नाम शामिल हैं. इसमें महात्मा गाँधी, अरविंदो घोष और विवेकानंद की जीवनियाँ शामिल हैं.

इसके लिए किसे दोष देंगे हरियाणा के स्वास्थ्यमंत्री अनिल विज और उनके समर्थक. इसलिए आइंसटीन ने ठीक ही कहा था, “आनेवाली पीढ़ियाँ शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस का ऐसा पुतला सचमुच कभी इस धरती पर अवतरित हुआ था.”

(जितेन्द्र कुमार स्वतंत्र लेखन करते हैं. बिहार के भोजपुर जिले में  जन्मे कुमार अब तक दो कविता संग्रह और दो कहानी संग्रह ,एक हिंदी और एक भोजपुरी में लिख चुके हैं. समाज में चल रहे तत्कालीन उठापटक पर इनकी अपनी एक दृष्टि है जो गहरे अध्ययन और परिश्रम से अर्जित की हुई है.)

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