गुजरात चुनाव प्रचार ने सिखाया मोदी एंड कंपनी की कमजोर नस कहाँ है

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उमंग कुमार/

आज गुजरात के दूसरे और आखिरी चरण का वोट दिया जा रहा है. चुनावी गणित के दिग्गज माने जाने वाले योगेन्द्र यादव ने भविष्यवाणी कर दी है कि इस बार चुनावी खेल के सिकंदर माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी और अमित शाह अपने ही घर में मुंह की खाने वाले हैं. गुजरात से ज़मीनी पत्रकारिता करने वाले कई पत्रकारों ने भी रिपोर्ट लिखी है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हालात ठीक नहीं हैं. शाम तक एग्जिट पोल भी आ जायेंगे.

फिर भी जबतक निर्वाचन आयोग 18 दिसम्बर को अधिकारिक तौर पर घोषणा नहीं कर देता, लोगों को भरोसा नहीं होने वाला कि भाजपा भी सीधे-सीधे मुकाबले में राहुल गांधी के कांग्रेस से हार सकती है. यह सब इसलिए कि मोदी और शाह ने अपराजेय की छवि बना रखी है.

यह तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता चलेगा कि ऊंट किस करवट बैठेगा, पर गुजरात के चुनावी तैयारियों के बीच यह तो पता चल गया है कि वह कौन सी रणनीति है जिससे भाजपा को भविष्य में हराया जा सकता है.

गुजरात के इस विधानसभा चुनाव में कुछ ऐसा हुआ है जिसकी उम्मीद देश की जनता को भी नहीं थी. भाजपा के नेताओं ने तो सोचा भी नहीं होगा इसलिए शायद तैयार नहीं थे. यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व अपने चुनावी प्रचार में और एक्सपोज होता चला गया.

इसको समझने के लिए सबसे पहले यह समझना पड़ेगा कि भाजपा ने देश की राजनीति में एक ऐसा माहौल बना दिया था और है जिसमें विपक्ष भी उसकी मदद ही करता है. यहाँ तक कि देश का बद्धिजीवी वर्ग जो सामान्यतः भाजपा का विरोध करता दिखता है, वह उस विरोध में भी मोदी की मनचाही मुराद पूरी कर रहा होता है. हिन्दू ह्रदय सम्राट बनने का.

मोदी का विरोध करने के लिए यह बद्धिजीवी तबका इन्हें कम्युनल, मुस्लिम विरोधी, बहुसंख्यकवाद से संचालित होने वाला नेता कहता है और वर्तमान का भाजपा नेतृत्व यही चाहता है

मोदी का विरोध करने के लिए यह बद्धिजीवी तबका इन्हें कम्युनल, मुस्लिम विरोधी, बहुसंख्यकवाद से संचालित होने वाला नेता कहता है और वर्तमान का भाजपा नेतृत्व यही चाहता है. उनको सेक्युलर कहलाने का कोई शौक नहीं है, न ही संविधानवादी, न ही भारत के विविध संस्कृति की रक्षा करने वाला.

विपक्ष मोदी और उनकी टीम को कट्टर हिन्दू साबित करने के चक्कर में खुद को अधिक से अधिक सेक्युलर दिखाने की कोशिश करता है. वास्तविकता में वह कितना मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय का पक्षधर है इस पर विवाद हो सकता है पर सतही तौर पर पक्षधर दिखाने की कोशिश करता है. नरेन्द्र मोदी को मुस्लिमों को हत्यारा बताता है. खुद को पारंपरिक रीति-रिवाज से दूर रखने की कोशिश करता है. इस तरह विपक्ष और  देश का बद्धिजीवी वर्ग भाजपा के शीर्ष पर बैठे लोगों के हाथों में खेल रहा होता है.

भाजपा यही चाहती भी है और ऐसे हथियारों से निपटने में यह पार्टी माहिर हो चुकी है.

गुजरात चुनाव में शायद मोदी और उनकी टीम कांग्रेस से यही उम्मीद कर रही थी. राहुल गांधी गुजरात में सताए गए मुस्लिमों से हमदर्दी दिखाएँगे. इससे राज्य के हिन्दुओं को एक साथ करने में मोदी को मदद मिलती. पिछले पांच-सात सालों की राजनीती राजनीती राजनीति में पहली बार कांग्रेस इस पक्ष को समझते हुए दिखी और मोदी को कभी फ्रंट फुट पर खेलने ही नहीं दिया.

बल्कि, इस बार राहुल गांधी खुद बार-बार मंदिर जाते दिखे. एक बार भी मुस्लिमों और 2002 में हुए दंगे का जिक्र तक नहीं किया. नरेन्द्र मोदी एंड कंपनी बेचैन होते दिखे कि अब देश के इस नए टाइप के ‘सेक्युलर’ और मुस्लिम से एक ख़ास दूरी बनाये रखने वाले गिरोह से कैसे निपटें. इन्होंने इसकी तैयारी तो की ही नहीं थी. यह इतिहास में पहली बार हुआ जब मोदी को खुद से अपना ब्रह्मास्त्र ‘हिंदुत्व’ की लड़ाई छिनती हुई दिखी.

कांग्रेस को मालूम है कि कम से कम गुजरात में मुस्लिम वोट उसके लिए सुरक्षित है. ऐसी स्थिति में इस समुदाय के लिए कुछ अलग करने  या बोलने की जरुरत नहीं है

कांग्रेस ने यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत किया. कांग्रेस को मालूम है कि कम से कम गुजरात में मुस्लिम वोट उसके लिए सुरक्षित है. ऐसी स्थिति में इस समुदाय के लिए कुछ अलग करने  या बोलने की जरुरत नहीं है.

इससे हताश परेशान नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी को अपने अखाड़े में लाने के लिए सबकुछ करना पड़ रहा था, जिससे उनकी छवि और बिगड़ती जा रही थी. मोदी ने इसके लिए पूरी कोशिश की कि कांग्रेस को हिन्दुओं की पार्टी न बनने दिया जाए. कभी इसके लिए जवाहरलाल नेहरु के राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर जाने का विरोध करने वाले एपिसोड की चर्चा की. बात नहीं बनी तो किसी तरह यह दिखाया गया कि राहुल ने मंदिर में खुद का नाम हिन्दू श्रद्धालु की श्रेणी में नहीं लिखा है. यह भी मामला फ़िस्स हो गया. इन सबसे परेशान मोदी ने आखिरी और सबसे बड़ा हथियार चलाया. वह यह था कि कांग्रेस पकिस्तान के साथ मिलकर गुजरात और उनके खिलाफ साजिश कर रही है. यह एक प्रधानमंत्री के चुनावी राजनीति में बढ़त पाने के लिए पतन की इंतहा थी. चुनाव प्रचार के अखाड़े में मोदी चित्त होते दिखे.

कांग्रेस ने आनन-फानन में मनमोहन सिंह को आगे कर इस दाव के असर को कम करने की कोशिश की. अब देखना यह है कि क्या कांग्रेस, मोदी को इस तरह से घेरने और गुजरात के शेरों को गुजरात में ही हराने में सफल होती है या नहीं. पर इतना तो साबित हो गया है कि मोदी और शाह किस तरह से राजनितिक मुठभेड़ में कमजोर पड़ रहे हैं. इसको समझने पर आपको देश के आगे के राजनितिक लड़ाईयों की रुपरेखा दिखेगी.

 

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