सिर्फ प्रेज़ेटेशन के आधार पर डीआरडीओ ने बुलेट प्रूफ बनाने की तकनिकी की ट्रान्सफर

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जैघम मुर्तजा/

भारत सरकार का एक विभाग है डीआरडीओ। ये सैन्य अनुसंधान और सैन्य साज़ो सामान का विकास करता है। डीआरडीओ ने बरसों के अनुसंधान के अलावा रूस, इज़रायल और अमेरिका से सैन्य सहयोग समझौतों के तहत सस्ती बुलेट प्रूफ जैकेट विकसित की। जहां एक अमेरिकन जैकेट की क़ीमत डेढ लाख रुपए से ज़्यादा है वहीं स्वदेशी की एक लाख रुपये से कम। भारत ने अमेरिका से तीन लाख जैकेट ख़रीदे थे लेकिन सेना की मांग इससे क़रीब तीन गुनी है और हर साल ये मांग बढ़ रही है। देश में कानपुर और मुरादनगर समेत कई ऑर्डिनेंस फैक्ट्री  सुरक्षाबलों के जैकेट बनाते हैं।

इधर कानपुर की एक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी एमकेयू लिमिटेड है। ये जीकेजी की सब्सिडियरी है। ये कंपनी तीन भाई, नीरज गुप्ता, मनोज गुप्ता और अनुराग गुप्ता चलाते हैं। इसके अलावा इनके परिजन नीलम गुप्ता, सुमित खंडेलवाल, शरद खंडेलवाल, मनीष खंडेलवाल और वैभव गुप्ता इसमें निदेशक हैं। इस कंपनी का टर्नओवर डेढ़ सौ करोड़ के आसपास है।

ये थीं जानकारियां… अब ख़बर सुनिए। एमकेयू को सरकार ने बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने के लिए चुना है। ये चुनाव सिर्फ प्रेज़ेटेशन के बल पर हुआ है। इसके बाद डीआरडीओ ने मुफ्त में बिना फीस, बिना रायल्टी इस कंपनी को बुलेट प्रूफ जैकेट बनाने की तकनीक ट्रांसफर की है। इतना ही नहीं कंपनी की कुल औक़ात से कई गुना बड़ा, ऑर्डर एमकेयू को दिया गया है। कंपनी सेना और सैन्य बलों के लिए क़रीब दो लाख जैकेट बनाकर हज़ारों करोड़ रुपये कमाएगी। इधर ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों के पास काम नहीं है। अब आप नीरज गुप्ता के सतीश महाना और अमित शाह से रिश्ते न पूछना। ये भी मत पूछना की साहेब जर्मनी में अंजला मर्केल से किसकी सिफारिश करने गए थे। ये भी मत पूछना कि नीरज गुप्ता का जर्मनी में क्या कारोबार है और वो किन देशों को सस्ते बुलेट प्रूफ बेचकर कितने पैसे कमाएंगे। ये भी मत पूछना कि कानपुर के गुप्ता और खंडेलवार परिवार यहां तक कैसे आए हैं। थोड़ी सी मेहनत ख़ुद भी कीजिए।

 (जैघम मुर्तजा पेशे से पत्रकार हैं। इस खबर में इस्तेमाल तस्वीर आईडीआर की वेबसाइट से साभार ली गई है।)

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