नरेन्द्र मोदी के असली ‘नसीब’ का इम्तहान होना है 2018-19 में

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चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं और सरकार का खजाना खाली होता जा रहा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि मोदी सरकार में पहली बार तय सीमा से अधिक फिस्कल घाटा बढ़ा है जिसकी वजह है  सरकार द्वारा  उठाये गए जीएसटी और नोटबंदी जैसे कदम 

 उमंग कुमार/

आपको याद होगा जब नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने कहा था कि लोग कह रहे हैं कि मुझे विश्वबाज़ार में तेल के दाम में गिरावट का फायदा मिल रहा है. उन्होंने कहा था कि यह उनका नसीब या कहें किस्मत है कि उनके समय में तेल के दाम विश्वबाज़ार में गिर गए हैं. लेकिन किस्मत के बूते हमेशा ‘गुड-गवर्नेंस’ नहीं होता. 

गुजरात चुनाव में जीत कर हारने वाली उनकी पार्टी अब 2018 के पांच राज्यों के विधानसभा और उससे भी महत्वपूर्ण लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है.  

पिछले साढ़े तीन सालों से हर ज़रुरत की चीज का दाम बढाने वाली इस सरकार के पास अब बस एक ही बजट (2018-19) बचा है जिसका इस्तेमाल लोगों को कुछ राहत देने के लिए किया जा सकता है.  ऐसा करने के लिए सरकार के पास गुजरात से पुरजोर सिफारिश आ चुकी है जहां ग्रामीण इलाकों में लोगों ने इस सरकार को लगभग नकार सा दिया है. चार शहरों के बूते अपनी जीत बचाने वाली इस पार्टी को भी मालूम होगा कि आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में ग्रामीण क्षेत्र अधिक हैं. साथ ही शहरों के बूते लोकसभा का चुनाव जीतना असंभव है.

पार्टी के अंदरखाने से इस बात की सिफारिश शुरू हो गयी है कि जनकल्याण के कार्यों पर भी अब फोकस  किया जाए. 

सरकार और पार्टी के अंदरखाने से इस बात की सिफारिश शुरू हो गयी है कि जनकल्याण के कुछ कार्यों पर भी अब फोकस बढ़ाया जाए. इससे भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को ग्रामीण जनता से वोट मांगने में आसानी होगी.

लगता है कि मोदी को वह ‘किस्मत’ वाला हिस्सा कुछ मौके देने के बाद नाराज़ हो गया है. इस सरकार का आखिरी बजट पेश होने में करीब दो महीने ही बाकी हैं और सरकार वर्तमान में इस साल की अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए कर्ज ले रही है. माने यह कि इस सरकार के पास पैसा ही नहीं है जिससे लोक कल्याण के कार्यक्रम पर खर्च बढाया जाए.

इस सप्ताह वित्त मंत्रालय ने घोषणा की कि उसे 50,000 करोड़ का वर्तमान वित्तीय वर्ष में कर्ज लेना पड़ेगा. इससे भारत का वित्तीय घाटा (फिस्कल घाटा) बढ़ जाएगा. इससे आने वाले कुछ साल में भी बैलेंसशीट प्रभावित होगा. फिस्कल घाटा मतलब सरकार के कुल आमदनी और खर्च में होने वाला अंतर है. इस घाटे से तात्पर्य यह होता है कि सरकार को अपने जिम्मेदारी निभाने में आने वाले खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है.

सरकारें कम फिस्कल घाटा रखना अपनी एक उपलब्धि के तौर पर देखती रही हैं. जैसे इसी साल बजट पेश करते हुए अरुण जेटली ने कहा था कि इस साल यह घाटा 3.2 प्रतिशत रहने वाला है जो आने वाले (2018-19) में घटकर तीन प्रतिशत तक रह जाएगा. लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए जिसमें सरकार को 50,000 करोड़ का कर्ज लेना पड़ रहा है, इससे ऐसा लगता है कि सरकार दोनों वित्तीय वर्ष में अपना निर्धारित लक्ष्य पूरा नहीं कर सकेगी.

कहने का तात्पर्य यह है कि सरकार ने अपने खजाने में जितना पैसा आने की उम्मीद की थी उसपर इसी सरकार के नोटबंदी और जीएसटी नाम के नये कर-कानून जैसे क़दमों ने कुठाराघात किया है.

सरकार ने अपने खजाने में जितना पैसा आने की उम्मीद की थी उसपर नोटबंदी और जीएसटी ने कुठाराघात किया है.

जीएसटी और नोटबंदी की आलोचना को सरकार यह कहकर झेलती रही है कि इससे भारतीय अर्थव्यस्था में टैक्स या कर का दायरा बढेगा. करदाता ईमानदारी से अपने हिस्से का कर देंगे. जब अगस्त महीने में भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह स्पष्ट किया कि नोटबंदी के बाद सारे नोट लगभग बैंक में वापस आ चुके हैं, तब सरकार ने यही कहा था कि आने वाले समय में कुल धन से पता चलेगा कि ये दोनों कदम कितने सही हैं. लेकिन अब ऐसा लगता है कि जो लोग अभी भी इन कदमों के फायदे की तलाश में हैं उनका इंतज़ार लम्बा होने वाला है, क्योंकि वर्तमान में तो वह फायदा होता नहीं दिख रहा है.

इन दो फैसलों के अतिरिक्त सरकार के पास पैसा न होने का एक और कारण है. नरेन्द्र मोदी का ‘किस्मत’ जिस पेट्रोलियम पदार्थ के कम कीमत होने की वजह से चमकी नज़र आती थी, उसकी कीमत अब पुनः बढ़ने लगी है. भारतीय रिज़र्व बैंक का अनुमान है कि पेट्रोलियम पदार्थ की कीमत करीब 55 डॉलर प्रति बैरल रहने वाली है जबकि अभी इसका दाम 67 डॉलर प्रति बैरल के इर्द-गिर्द घूम रहा है.

अब सरकार के पास दो ही रास्ते हैं. या तो कांग्रेस पर खजाना खाली कर जाने का आरोप लगाने वाली यह सरकार खुद उसी रास्ते पर जाए और खेद के द्वारा तय फिस्कल घाटे की सीमा को भूल जाए.  या फिर सच में किसी ‘किस्मत’ के बूते ही चुनाव मैदान में उतरे.  

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