नैतिकता के संकट काल में कैसे पचाएगी मोदी सरकार अपने कार्यकाल की पहली ‘नैतिक जिम्मेदारी’?

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उमंग कुमार/

पिछले तीन साल के इतिहास में हादसों का सिलसिला काफी लम्बा रहा है. उन सब पर लड़ाइयाँ भले हुई हों कि सही कौन है तो गलत कौन. लेकिन इस सरकार के शासन में आने के बाद से  मंत्री या नेता, खासकर सत्ता पक्ष ने ‘नैतिक जिम्मेदारी’ शब्द से हमेशा एक ख़ासी दूरी बनाकर रखी है. हादसा चाहे जितना बड़ा हो, पर इस मुद्दे पर अब तक कोई विचलन नहीं दिखा.

पहली बार सुरेश प्रभु के कदम डगमगाए हैं. देश के रेलमंत्री देश में हो रहे रेल दुर्घंटना से आहत है, ऐसा उन्होंने ट्वीट करके बताया है. उन्होंने यह भी कहा कि वह प्रधानमंत्री से मिले और घटना की नैतिक जिम्मेदारी ली. विरोधी खेमे का तो काम ही विरोध करना है. उन्होंने यह कह दिया कि रोज रोज हादसा होगा तो जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी. कोई उपाय ही नहीं है. लेकिन इस तर्क में दम नहीं नज़र नहीं आता.

पिछले तीन साल में घटनाएं कम थोड़ी न हुई हैं. लेकिन क्या मजाल कि कोई  मंत्री झाड़-पोछकर खड़ा हो जाए और कहे कि मैं इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेता हूँ.

कभी किसी की लापरवाही से पचास- साठ बच्चे मर गए. किसान आत्महत्या करते रहे. उनके विरोध प्रदर्शन पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमे फिर किसान मरे. आतंकवादी आर्मी के कैम्प में घुस कर कई सैनिको को मारने में सफल हो गए. नक्सलियों ने सुरक्षाबलों को बड़ी संख्या में मारा. भीड़ ने किसी को घेर कर जान से मार दिया. सिर्फ एक ही नहीं, लगातार ऐसी घटनाएं होती रहीं. यहाँ तक कि भीड़ ने एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि उसने शौच करती अपनी पत्नी की तस्वीरें उतारने का विरोध किया था. . रेल हादसे होते रहे लेकिन नैतिक जिम्मेदारी शब्द को तरसती जनता आखिरकार हारकर खुद जिम्मेदारी लेती रही.
यही नहीं  सरकार ने ऐसे कई फैसले लिए जिसकी वजह से जनता को काफी दिक्कत हुई. नोटबंदी उसका एक उदाहरण है. सौ से ऊपर लोग कतार में खड़े रहने की वजह से मर गए. कितने घरों में शादियाँ रुक गई. लोग बेरोजगार हो गए. बहुत कुछ हुआ पर नैतिक जिम्मेदारी? ना बाबा ना!
जब जब ऐसी घटनाएं घटीं सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक, ट्वीटर इत्यादि पर लोगों ने सरकार को घेरने की कोशिश की. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. इनसे निपटने के लिए तो सरकार के समर्थक ही काफी थे. कुछ तो यह भी आरोप लगाने लग गए कि यह सब पेड होता है जिसको अंग्रेजी में ट्रोल कहते हैं.
यह सब चलता रहा पर सरकार की तरफ से किसी ने कभी यह नहीं कहा कि वह अमुक घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेता है. इसके उलट शासन कर रहे राजनितिक दल की तरफ से ऐसे कई बयान आये जिन्होंने प्रश्न करने वालों को ही कठघरे में खड़ा किया.
उदाहरणस्वरुप, हाल ही में हुए गोरखपुर की घटना जिसमे कई बच्चे मामूली लापरवाही से मर गए. इसके बचाव में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि इतने बड़े देश में छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती हैं. उस दृश्य में अमित शाह कुछ कुछ ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ के राज सरीखे दिखे जो सिमरन से कह रहा है कि सेनोरिटा बड़े बड़े देशों में छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं. अरबों की जनता को अचानक सेनोरिटा बनना पड़ा. यही नहीं केंद्रीय मंत्री और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो यह भी कहा कि सबको सरकारी अस्पताल में इलाज मुहैया करना नामुमकिन है. क्या क्या मुमकिन है उन्होंने यह नहीं बताया.
शायद आपको याद हो. मध्य प्रदेश में जब आन्दोलनरत किसानों पर गोली चली थी तो लगा कि अब तो कम से कम राज्य के मुख्यमंत्री इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेंगे. वो काहे का. उल्टे वो आन्दोलन करने वाले किसानों के खिलाफ धरने पर बैठ गए. प्रधानमंत्री ने भी उनसे कोई नैतिक जिम्मेदारी लेकर कुछ रिपोर्ट वगैरह भेजने को नहीं कहा.
जब आर्मी कैम्प में आतंकवादी हमला हुआ तो यह जरुर कहा गया कि पकिस्तान से बदला लिया जाएगा. लेकिन किसी ने इस पर जोर नहीं दिया कि वो अन्दर किसकी लापरवाही से घुसे इसलिए नैतिक जिम्मेदारी लेने की जरुरत ही नहीं पड़ी.
पहली बार सुरेश प्रभु आगे आये हैं और नैतिक जिम्मेदारी ले रहे हैं. सवाल यह है कि क्या भाजपा ऐसे कर्म पचा पाएगी?

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