भारतीय फिल्म जगत के पितामह: दादा साहब फाल्के

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

शिखर पर पहुँचने  वाले व्यक्ति की अन्य विशेषताओं के अलावा सबसे महत्वपूर्ण होती है उसके अंदर  ‘जूनून’ की भावना। यूँ तो सभी लोग बेहतर करने का प्रयास करते है और उसे अंजाम पर पहुंचाते भी है परंतु कुछ अलग हटकर करना जिसमे शुरुआत में सिर्फ जोखिम ही हो साहस की बात होती है। महानायक अमिताभ बच्चन को दादा साहेब फाल्के पुरुस्कार से नामित किये जाने पर जिसके नाम पर इस पुरूस्कार की शुरुआत हुई है, उन  घुंडीराज गोविंद फाल्के (1870 -1944 ) के जीवन संघर्ष पर एक नजर दौड़ाना जरुरी है।

बहुमुखी प्रतिभा से लबरेज फाल्के ने ड्राइंग, पेंटिंग, आर्किटेचर, मॉडलिंग, फोटोग्राफी, फोटो प्रोसेसिंग, प्रिंटिंग आदि की विधिवत शिक्षा ग्रहण की थी। उस दौर में  कलर प्रिंटिंग में उपयोग आने वाले ब्लॉक को समझने के लिए वे छः माह तक रतलाम के बाबूराव वरुवालकर के साथ रहे थे। भारत के विश्वप्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा द्वारा देवी देवताओ के  बनाये चित्रों की रंगीन छाया प्रतियां बनाने में उन्होंने काफी सहयोग किया था।

लुमियर बंधुओ द्वारा बनाई पहली फिल्म के बम्बई में प्रदर्शन (1896 ) के दौरान फाल्के उन चुनिंदा दर्शकों  में शामिल थे जिन्होंने चित्रों को  ‘चल चित्र’ में बदलते देखा था। इस अविस्मरणीय घटना के बाद अपनी पहली फिल्म बनाने के लिए फाल्के को लंबा इंतजार करना था।  इस फिल्म को बनने में सत्रह बरस की देर थी।  इस दौरान फाल्के को कई उतार चढ़ाव से गुजरना था। गोधरा में शुरू किया गया फोटो स्टुडियो कुछ दिन बाद इस वजह से बंद हो गया कि यह अफवाह फ़ैल गई थी कि कैमरे के सामने खड़े होने से व्यक्ति की उम्र कम हो जाती है। लोनावाला में शुरू की गई प्रिंटिंग प्रेस साझेदारों के विवाद के बाद छोड़ना पड़ा जबकि फाल्के जर्मनी से खुद इसके लिए कलर प्रिंटिंग का सामान खरीद कर लाये थे। नई प्रिंटिंग प्रेस के लिए पूंजी की जद्दोजहद के दौरान एक दिन वे अपने बड़े बेटे के साथ गिरगांव  में अमेरिका इंडिया पैलेस में ‘अमेज़िंग एनिमल’ फिल्म देखने गए। उनके पुत्र के लिए यह अविश्वसनीय अनुभव था। पुत्र के आग्रह पर अगले दिन सारा परिवार एक बार फिर फिल्म देखने पहुंचा बदकिस्मती कहे या संयोग उस दिन जानवरों के बजाये फ्रेंच फिल्म ‘द लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट’ दिखाई गई। यही वह पल था जब फिल्म देखते हुए फाल्के ने तय कर लिया कि वे भी ‘चलचित्र’ बनायेगे और उनकी कहानियां देवी देवताओ या पौराणिक कथाओ पर आधारित होगी।

अब चलचित्र बनाना चित्र बनाने जितना आसान तो था नहीं इसके प्रशिक्षण और तकनीक जानने के  लिए लंदन जाना जरुरी था लिहाजा अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी और घर का सामान रेहन रखकर दस हजार रूपये जुटाए गए। दो हफ्ते के लंदन प्रवास में किसी तरह ब्रिटिश फिल्मकार सिसिल हेपवोर्थ से मुलाक़ात हुई जिन्होंने फाल्के को अपने स्टूडियो में कही भी आने जाने और सीखने समझने की इजाजत दे दी। पचास पौंड में एक कैमरा खरीद लिया गया और कोडक को नेगेटिव फिल्मों का आर्डर दे दिया गया। भारत लौटने पर 1 अप्रैल 1912 को फाल्के फील्म कंपनी की शुरुआत हो गई।

कुछ प्रयोगात्मक फिल्म बनाने के बाद ‘राजा हरिशचंद्र’ विषय को फिल्माना तय किया गया। दादर में एक बंगला किराए पर लेकर उसे स्टूडियो में परिवर्तित किया गया। इस काम में पूरा फाल्के परिवार जुट गया था। अखबार में अभिनेताओं के लिए विज्ञापन दिए गए, पुरुष तो आ गए परंतु महिलाएं नहीं आई। अंततः  पुरुषों को ही महिला वेश में प्रस्तुत किया गया। राजा हरिशचंद्र के पुत्र की भूमिका फाल्के के पुत्र भालचंद्र ने निभाई। फाल्के साहब पटकथा, निर्देशन, सेट डिजाइनिंग, मेकअप, एडिटिंग और फिल्म  प्रोसेसिंग की जिम्मेदारी एक साथ संभाल रहे थे। श्रीमती फाल्के के जिम्मे पूरी फिल्म कंपनी को दोनों समय भोजन कराने की जवाबदारी थी। तकरीबन सात महीने में फ़िल्मांकन संपन्न हुआ। इस सारी  कवायद पर दस हजार रूपये खर्च हो चुके थे।

3 मई 1913 को गिरगांव के कोरोनेशन सिनेमा में इस फिल्म का प्रदर्शन किया गया। व्यावसायिक रूप से फिल्म सफल रही। ‘राजा हरिशचंद्र’ ने तीस हजार रूपये कमाये! यह सारी रकम सिक्कों के रूप में थी जिन्हे ढोने के लिए बैलगाड़ियों की मदद ली गई। इस फिल्म की सफलता का आलम यह रहा कि ‘वार्नर ब्रदर’ ने उन्हें लंदन में बसने और साझेदारी में चलचित्र बनाने की पेशकश कर डाली। परंतु फाल्के की नियति तो भारत में थी। इस पहली फिल्म ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की नींव रखी। फाल्के अपनी मृत्यु तक फिल्म निर्माण में व्यस्त रहे और उन्होंने 130 फिल्मों का निर्माण किया। स्वाधीनता सेनानी लोकमान्य तिलक फाल्के की प्रतिभा के कायल थे। उनकी फिल्मों के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए वे दो बार सार्वजनिक रूप से आम जनता के बीच उपस्थित हुए।

1969 में भारत सरकार के सुचना प्रसारण मंत्रालय ने इस प्रतिभाशाली संघर्षशील फिल्मकार की स्मृति को चिरस्थायी करने के लिए प्रतिष्ठित ‘दादा साहेब फाल्के पुरूस्कार’ देने की शुरुआत की। यह पुरूस्कार सिनेमा के किसी भी क्षेत्र में सर्वोच्च मुकाम हासिल करने पर प्रतिवर्ष दिया जा रहा है। अंको का दिलचस्प संयोग है कि इस वर्ष इस पुरूस्कार को पचास वर्ष हो रहे हैं और महानायक अमिताभ भी अपने फ़िल्मी सफर के पचास वर्ष पूर्ण कर रहे है।

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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