जैसा प्रधानमंत्री ने बोला उसके लिए वाकई 56 इंच का सीना चाहिए

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उमंग कुमार/

इंसानी दुनिया में शर्म की दीवार सबसे बड़ी और ऊँची होती है जिसे सामान्य आदमी नहीं लांघ पाता. जिंदगी की दौड़ में शायद इसीलिए पीछे भी रह जाता है. शायद इसी को महसूस करते हुए ग़ालिब ने मशहूर शेर लिखा होगा. ‘काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’/ शर्म तुमको मगर नहीं आती.’

लेकिन सब पर यह नियम नहीं लागू होता. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इस शर्म की दीवार को बारम्बार लांघते रहते हैं, चाहे वह दीवार कितनी भी ऊँची और मोटी क्यों न हो.

उदाहरण यहीं अपने देश में मौजूद है. देश की राजधानी में सप्ताह भर पहले लाखों आन्दोलनरत किसान जमा हुए. अपने इसी देश में किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने को मजबूर हैं. कुछ ऐसे कि सरकार पिछले तीन सालों से किसानों के आत्महत्या का आंकड़ा जारी नहीं कर रही है. उसी सरकार का मुखिया 70 साल पुराने समय को याद करते हुए देश के पहले प्रधानमंत्री पर इल्जाम लगाता हो कि ‘गुलाब का फूल लगाने वालों को खेती का कोई ज्ञान नहीं था.’ मजेदार यह कि कपडे में गुलाब के फूल से परेशान देश के यही प्रधानमंत्री दस लखिया सूट भी पहनते हैं. एक पर तो छोटे-छोटे अक्षरों में ‘मोदी’ भी छपा हुआ था.

मोदी का ऐसा कहना क्या आसान काम है? इनकी जगह अगर कोई साधारण इंसान रहे तो इस मुद्दे को छेड़ेगा नहीं. यह सोचकर कि इससे लोगों का ध्यान खेती और किसानी की बदहाली पर नहीं जाएगा.

लेकिन यहाँ तो देश के ताकतवर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं.  इनके लिए कोई भी काम असंभव नहीं है. इन्होंने एक बार पुरानी उत्तरप्रदेश की सरकार को ललकारते हुए दावा भी किया था कि इनका सीना छप्पन इंच का है.

आज के दौर के प्रधानमंत्री को नेहरु को किसानी के गुर सीखाने के क्या मायने हैं इसके लिए कुछ और उदाहरण से होकर गुजरना होगा. यही सरकार है जिसने अपने शुरूआती दौर में किसानों की आमदनी दोगुना करने का वादा किया था. यही सरकार है जिसके कार्यकाल में जब महज पांच महीने बचे हैं तो महाराष्ट्र के एक किसान की यह स्थिति है कि वह 750 किलो प्याज बेचता है और उसे महज 1,064 रुपये मिलते हैं. यानी 1.41 रूपया प्रति किलो. अपना विरोध दर्ज कराने के वास्ते, संजय साठे नाम का यह किसान रविवार को यह रकम प्रधानमंत्री कोष को दान में देने की बात करता है और बस दो दिन बाद यानी मंगलवार को प्रधानमंत्री मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु पर यह तंज कसते हैं कि वो अपने जैकेट में गुलाब का फूल लगाते थे और उनके पास बागवानी का इल्म था, किसानी का नहीं.

यही सरकार है जिसके कार्यकाल में जब महज पांच महीने बचे हैं तो महाराष्ट्र के एक किसान की यह स्थिति है कि वह 750 किलो प्याज बेचता है और उसे महज 1,064 रुपये मिलते हैं. यानी 1.41 रूपया प्रति किलो

आप खुद को मोदी जी की जगह पर रखकर देखिएगा आपके पूरे बदन में झुरझुरी हो जाएगी. ऐसी विपरीत स्थिति में एक साधारण आदमी अगर शासन में रहता और ऐसा बोलता तो शर्म से कम से कम कुछ दिनों के लिए विदेश यात्रा पर तो निकल ही जाता. देश तब तक नहीं लौटता जब तक लोग किसानों की इस दुर्दशा से अन्य मुद्दे पर भटक नहीं जाते. ये तो नरेन्द्र मोदी हैं कि खड़े हैं और उसी समय में किसी और को किसानी का मतलब समझा रहे हैं.

इसे और बेहतर ढंग से समझने के लिए वर्तमान सरकार के किसानों के प्रति समर्पण के भी कुछ उदाहरण देने होंगे. जैसे फसल के समर्थन मूल्य का मामला ही लें. किसानों के मुद्दे पर काम करने वाले देश के मशहूर पत्रकार पी साईंनाथ इसका ब्यौरा देते हैं. करीब दो महीने पहले वर्धा में बोलते हुए साईंनाथ ने जो कहा था उसे आप इन खास बिन्दुओं से बेहतर समझ सकते हैं.

– वर्तमान सरकार जब विपक्ष में थी तो इसने वादा किया था कि किसानों को फसल का डेढ़ गुना दाम दिया जाएगा. ये 2014 चुनाव से पहले कहा गया.
-सत्ता में आने के बारह महीने के अन्दर सरकार ने अलग-अलग मौकों पर दो बार कहा कि फसल का डेढ़ गुना दाम देना संभव ही नहीं है. एक आरटीआई के जवाब में और एक कोर्ट में याचिका के जवाब में.
– बल्कि सरकार ने यह तक कह दिया कि अगर किसानों की फसल का डेढ़ गुना दाम दिया जाने लगा तो फसलों की बाज़ार कीमत पर बुरा असर होगा. यह 2015 की बात है.
-साल 2016 में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने यह कहा कि हमने ऐसा वादा कभी किया ही नहीं. यानि कि भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी ने कभी ऐसा वादा ही नहीं किया कि वे किसानों की फसल का डेढ़-गुना दाम देंगे.
-साल 2017 में सरकार और उनके बुद्धिजीवी लोग यह कहते पाए गए कि स्वामीनाथन रिपोर्ट को मारो गोली और मध्य प्रदेश जाकर देखो. मध्य प्रदेश में एक ऐसी योजना आई है जो किसानों की भलाई करने के मामले में स्वामीनाथन रिपोर्ट से कहीं आगे है. यह मध्यप्रदेश के भावान्तर योजना के बारे में कहा जा रहा था.
-उसी भावान्तर योजना पर एक पुस्तक भी प्रकाशित हो गई. उसी पुस्तक का विमोचन दिल्ली में हो रहा था जिस रोज मध्यप्रदेश के मंदसौर में आन्दोलनरत किसानों पर पुलिस ने गोली चलाई और पांच किसान शहीद हो गए.
–  साल 2018 के जनवरी में बजट पढ़ते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा कर दिया कि उनकी सरकार पहले से ही किसानों की फसल का डेढ़ गुना दाम दे रही है. पूरा देश भौंचक. कब, कहाँ और किसको मिला डेढ़ गुना दाम!
-वही सरकार फिर जुलाई में कहती है कि हम डेढ़ गुना दाम वाले वादे को पूरा करने वाले हैं.
यह सब पढ़ कर आपका दिमाग भी चकरा जाएगा कि आखिर डेढ़ गुना दाम पर सरकार का क्या रुख है. फसल का डेढ़ गुना दाम देने पर इतना पैंतरा बदलना भी किसी तीस-बत्तीस इंच के सीने वाले के बूते की बात नहीं है. इसके लिए भी या तो छप्पन इंच का सीना वाली सरकार चाहिए.

यह किसानों की वही हमदर्द सरकार है जिसके शासनकाल में किसानों ने चार बार जबरदस्त आन्दोलन किये हैं और नवम्बर 29 और 30 वाले आन्दोलन में तो किसानों ने सिर्फ कृषि के मुद्दे पर संसद के विशेष अधिवेशन की मांग कर दी. ऐसा जवाहरलाल नेहरु के समय में किया था कि नहीं यह नहीं मालूम. ऐसे में वर्तमान प्रधानमंत्री के द्वारा देश के पहले प्रधानमंत्री को कृषि और किसानों के दर्द को समझाना, उसके लिए एक सलाम तो बनता ही है.

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