ईवीएम के बूते चुनावी प्रक्रिया और लोगों में भरोसे के कमी

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जितेन्द्र राजाराम/

पांच राज्यों  में चल रहे विधानसभा चुनाव में पहले चरण का चुनाव छत्तीसगढ़ में हुआ. कुछ छिटपुट घटनाएं ऐसी सामने आयीं कि कई राजनीतिक दलों ने ईवीएम को लेकर वही पुराना सवाल दोहराया. आज मध्य प्रदेश में चुनाव संपन्न हो रहा है और स्वाभाविक है कि ऐसे सवाल यहाँ भी उठेंगे. ऐसे सवालों का असर कम करने के लिए निर्वाचन आयोग कई दिनों से प्रयासरत है. हाल में हुई एक घटना से तनाव के स्तर का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

चुनावी प्रक्रिया में उपयोग होने वाली अति-महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक मशीन वीवीपैट (VVPAT) की जाँच के दौरान हुई एक मामूली मानवीय गड़बड़ी ने पूरे चुनाव शिविर में हड़कम्प मचा दिया. घटना भोपाल दक्षिण पश्चिम विधानसभा-152 के चुनाव की तैयारी के दौरान होने वाली एक प्रक्रिया की है जिसमें सभी दलों के प्रतिनिधियों को चुनाव आयोग विविपैट मशीन की जाँच और तसल्ली के लिए आमंत्रित करता है. यह कार्यवाही चुनाव से तीन दिन पहले होती है. यदि इस प्रक्रिया में कोई भी दल किसी प्रक्रिया में आपत्ति दर्ज कराता है, तो चुनाव आयोग उस आपत्ति को सुलझाने के लिए वचनबद्ध होता है.

इस जाँच प्रक्रिया के दौरान आम आदमी पार्टी की ओर से गए प्रदेश सचिव दुष्यंत दाँगी ने पाया कि विविपैट से निकली पर्ची, इवीएम मशीन में दर्ज मतदान संख्या से एक कम है. दो से तीन बार गिनने पर और वहाँ मौजूद दूसरे अफसरों द्वारा गिने जाने पर भी पर्ची और मतदान में एक मत का अंतर साबित हो रहा था. चुनाव आयोग का कैमरामैन इस घटना को बारीकी से रेकार्ड कर रहा था. इस दौरान वहाँ मौजूद अधिकारी (एसडीएम) और अन्य कर्मचारी वहाँ जमा हो गए. थोड़ी देर के लिए माहौल में ऐसा तनाव हुआ मानो पूरे तंत्र पर सवाल उठने वाले हैं.

खैर, एसडीएम को अपनी चुनावी तैयारी में पूरा भरोसा था वो लगातार कहते रहे कि किसी मानवीय गड़बड़ी से पर्ची इधर-उधर हुई होगी लेकिन 18 अन्य दलों की पर्ची खँगालने के बाद 19वें दल की पर्ची गिने जाने तक सब की साँसे फूलने लगी थी. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए और इसी बीच वो पर्ची मिल गयी. सबने राहत की सांस ली.

चुनावी प्रक्रिया में लोगों को शामिल किये बिना उनका भरोसा नहीं कमा सकता चुनाव आयोग?

लेकिन ध्यान रहे कि ये लोग बंद कमरे में अपनी आँखों से इस प्रक्रिया को देख रहे थे. उनका क्या जो मतदान की इस पूरी प्रक्रिया से, वोट देने भर तक जुड़े हैं. उनको तो सुनी सुनाई बात पर ही भरोसा करना है.

उधर चुनाव आयोग ढेर सारे तकनीकी का इस्तेमाल करने के प्रयास में हैं ताकि चुनाव में होने वाली गड़बड़ियां रोकी जा सकें. मसलन एक मोबाइल ऐप लागाया गया है जिसका नाम सीविगिल है. इससे प्रदेश के किसी भी कोने में शराब, रुपया इत्यादि बाँटना या अन्य आपराधिक घटना को तुरंत विडियो सहित सीधे चुनाव आयोग को भेजा जा सकता है.

टीएन शेषन के दौर को छोड़ दिया जाए तो भारत में ऐसा कम ही देखा गया है जब चुनाव आयोग सख्त और मजबूत दिख रहा हो. अगर मान लीजिये लोगों ने ऐसा विडियो भेज भी दिया और उसमें देश के उच्च पदों पर बैठे लोग कुछ गलती करते पाए गए तो क्या यह संभव है कि आयोग उनके खिलाफ कोई एक्शन लेगा! ऐसा भरोसा आयोग ने नहीं कमाया है.

दूसरी बात है मीडिया. जब चुनाव संपन्न हो जाएगा तो कुछ मीडिया वाले  ऐसी खबरें लायेंगे जिसमे ईवीएम की गड़बड़ी दिखाई जायेगी तो कुछ इसे एकदम सही से कराया गया चुनाव बताएँगे. ऐसे में चुनाव आयोग और इसपर लोगों के भरोसे का क्या! लोकतंत्र पर लोगों के भरोसे का क्या!

इसका एक ही जवाब सूझता है कि आयोग को जाति, धर्म और राजनितिक दल इत्यादि सबका प्रतिनिधित्व ध्यान में रखते हुए, समाज से कुछ लोगों को आमंत्रित करना चाहिए, जो इस पूरी प्रक्रिया पर नज़र रखें. अन्यथा सरकार ने अधिकारियों के बेजा इस्तेमाल करने का तरीका तो कई दशक पहले सीख लिया था.

(जितेन्द्र राजाराम आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. जितेन्द्र इन दिनों भारतीय राजनीति की बारीकियों को समझने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे हुए हैं.)

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