सरपंच और मुखिया बनने के लिए डिग्री चाहिए तो विधायक और सांसद बनने के लिए क्यों नहीं!

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उमंग कुमार/

हाल ही में जब आदर्श आचार संहिता के दरम्यान नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को संबोधित कर बताया कि भारत दुनिया का चौथा देश बना जिसने अंतरिक्ष में एक सैटेलाईट मार गिराया है. तब देश में तरह-तरह की बातें हुईं. यह भी कि कांग्रेस के जमाने में ही देश ने यह क्षमता अर्जित कर ली थी. विरोध-प्रतिरोध की इस लड़ाई में कुछ लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर यह भी लिखते पाए गए कि जिस सरकार ने पंचायत चुनाव में भाग लेने के लिए जरुरी शिक्षा की सीमा ख़त्म कर दी हो वह सरकार देश की वैज्ञानिक उपलब्धि का श्रेय लेना चाहती है.

इन लोगों का इशारा राजस्थान में नव-निर्वाचित अशोक गहलोत सरकार की तरफ था. कांग्रेस ने राजस्थान में सरकार बनाने के बाद जो तत्काल फैसले लिए उसमें एक फैसला यह था कि अब से स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई. अब राजस्थान का कोई भी नागरिक स्थानीय चुनाव में उम्मीदवार बन सकता था.

साल 2014 के पहले भी यही स्थिति थी पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने 21 दिसंबर, 2014 को, एक अध्यादेश के माध्यम से जिला परिषद, पंचायत समिति और पंचायत के चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों पर कई शर्ते थोपी थीं. इसके अनुसार जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को 10 वीं कक्षा पास होना ही चाहिए. इसी तरह सरपंच का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को कक्षा आठवीं  पास होना अनिवार्य कर दिया गया. इसके बाद राजस्थान सरकार ने उनलोगों को भी चुनाव लड़ने से रोक दिया जिनके घरों में शौचालय नहीं था. राजस्थान के पदचिन्हों पर चलते हुए हरियाणा ने भी स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए भी इसी तरह के कानून बना दिए.

साल 2007 तक मध्य प्रदेश में लगभग 900 महिलाओं और छत्तीसगढ़ में 800 लोगों को दो-बच्चे के मानक का उल्लंघन करने के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया था 

ऐसे बेतुके कानून की शुरुआत नब्बे के दशक में ही हो गई थी. कई राज्यों में दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिता को नगरपालिका और पंचायत चुनाव लड़ने से रोक दिया गया. वैसे तो यह सब जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर किया जा रहा था. इससे जनसँख्या कितनी नियंत्रित हुई यह तो नहीं पता चला पर यह जरुर हुआ कि कई लोग चुनाव लड़ने से वंचित हो गए. इनमें अधिकतर हाशिए पर मौजूद लोग थे. जैसे महिला, दलित और अल्पसंख्यक. दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था ने एक अध्ययन किया और पाया कि साल 2007 तक मध्य प्रदेश में लगभग 900 महिलाओं और छत्तीसगढ़ में 800 लोगों को दो-बच्चे के मानक का उल्लंघन करने के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया गया था.

खैर, राजस्थान और हरियाणा पर आते हैं. इन सरकारों के इन फैसलों की व्यापक आलोचना हुई. इन फैसलों के खिलाफ लोग अदालतों में भी गए. हालांकि, दिसंबर 2015 में, राजबाला बनाम हरियाणा राज्य में सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीश पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम में संशोधनों की वैधता को बरकरार रखा. इस विवादित फैसले में न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर ने कहा कि प्रशासनिक कार्यों को बेहतर तौर पर निपटाए जाने के लिए शैक्षिक योग्यता के नियम लगाना उचित है. साथ ही यह भी कि ऐसा करने से संविधान में निहित समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है.

गहलोत सरकार के ताजा फैसले से एक बार फिर इस तरह की पाबंदियों की निष्पक्षता पर बहस तेज हो गई है.

चुनाव लड़ने के लिए शैक्षिक योग्यता की सीमा तय करना गलत है. कायदे से देखा जाए तो ऐसा करना मौलिक रूप से नागरिकों को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित करना है. यह लोकतंत्र की मूल भावना के ही खिलाफ है. इसके लिए कई तर्क हैं.

अव्वल तो यह कि चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित करना एक नागरिक के अधिकार को उसकी पसंद के उम्मीदवार को वोट देने के लिए प्रतिबंधित करता है. दूसरा यह कि देश की आधी से अधिक आबादी इस प्रतिबन्ध के बाद चुनाव लड़ने योग्य नहीं रह जायेगी. इसके अलावा, यह समाज के वंचित समुदाय जैसे महिलाओं, दलितों और गरीबों का अपमान करने जैसा है. अगर आधी से अधिक आबादी आठवीं तक नहीं पढ़ी है तो इसमें उनका दोष नहीं है. उनके नहीं पढ़े होने के पीछे पूरी व्यवस्था का दोष है जिसकी वजह से उनको सजा नहीं दी जा सकती.

विधान सभा और लोक सभा के उम्मीदवारों के लिए कोई ऐसी सीमा नहीं है. एक रिपोर्ट के अनुसा, वर्तमान लोकसभा में, 13% सांसदों के पास दसवीं की डिग्री नहीं है

इस मुद्दे को इस तरह भी देखा जाना चाहिए. विधान सभा और लोक सभा के उम्मीदवारों के लिए कोई ऐसी सीमा नहीं है. दी हिन्दू नाम के अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार इस वर्तमान लोकसभा में, 13% सांसदों के पास दसवीं की डिग्री नहीं है. इसका तात्पर्य तो यही हुआ कि प्रशासनिक कार्यों को बेहतर तौर पर निपटाए जाने के लिए डिग्री की जरुरत बड़े स्तर पर नहीं होती पर पंचायत स्तर पर है.

या यह कहा जाए कि न्यायालय और नीति निर्माता स्थानीय निकाय और पंचायत को लोकतंत्र का हिस्सा नहीं मानते. या यह माना जाए कि ऐसी नीतियाँ बनाने वाले लोग इस गलतफहमी में है कि औपचारिक शिक्षा वाले लोग पंचायतों को चलाने में बेहतर साबित होंगे. ऐसा मानने वालों की तो समझ पर भी सवाल खड़ा किया जा सकता है.

ऐसा करना संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन के जो उद्देश्य थे उसके भी खिलाफ है. इन संशोधनों का उद्देश्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं को पंचायतों और नगर पालिकाओं के के चुनाव में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना था.

इसलिए अशोक गहलोत सरकार के द्वारा उठाये गए इस तर्कसंगत कदम का स्वागत होना चाहिए न कि भर्त्सना. इस कदम से स्थानीय चुनाव में अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होती है.

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