भोजपुरी भाषा की सर्जनात्मकता का सर्वोत्तम आना बाकी है.

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सदानंद शाही/

कवि, आलोचक डॉ. सदानंद शाही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. इन्होने बीएचयू में 2009 में भोजपुरी अध्ययन केंद्र की स्थापना की और ‘भोजपुरी जनपद’ पत्रिका के प्रधान सम्पादक भी हैं. साथ ही हिंदी पत्रिका ‘साखी’ का सम्पादन भी करते हैं. इन्होने क्षेत्रीय भाषाओं खासकर भोजपुरी की आवाज हमेशा बुलंद करने का प्रयास किया है. 

भोजपुरी भाषा का इतिहास हजार वर्षो से अधिक का है . सिद्धों  की कविता में भोजपुरी की ध्वनियां और क्रियारूप  मिलने लगते है. आगे चलकर गोरखनाथ की वाणी में भोजपुरी का विकसित रूप दिखाई देता है. गोरखनाथ की अनेक भोजपुरी कविताएं हमारे सामने हैं. गोरखनाथ के बाद कबीर की भोजपुरी कविताएँ  मिलती हैं. फिर  उन्नीसवीं सदी के अन्त तक निरगुन संतो की लम्बी परम्परा है. धरमदास, कमालदास,पलटू साहेब ,लक्ष्मी सखी, दरिया साहब, शिवनारायन,गुलाल साहब जैसे संतो के यहाँ भोजपुरी कविता सतत विद्यमान है. संतो की वाणी में भोजपुरी कविता का जितना हिस्सा उपलब्ध और प्रकाशित है उससे कहीं ज्यादा अनुपलब्ध है. इसका अधिकांश हिस्सा कैथी लिपि में है. संत शिवनारायन बलिया जिले के थे. बलिया और आसपास के जिलों के ग्रामीण अंचल में शिवनारायणी सम्प्रदाय से जुड़े मठों में और अनुयायियों के घर  में कैथी लिपि में लिखी असंख्य पोथियां मौजूद हैं जिनकी अब केवल पूजा अर्चना ही होती है.

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त से अब तक निरन्तर  भोजपुरी साहित्य रचा जा रहा है. हीरा डोम की सरस्वती पत्रिका में छपी कविता अछूत की शिकायत हो या रघुवीर सहाय की बटोहिया भोजपुरी कविता में नवजागरण की अनुगूंज सुनाई पड़ती है. राहुल सांकृत्यायन से लेकर गोरखनाथ पाण्डेय और प्रकाश उदय तक भोजपुरी की रचनाशीलता सतत मौजूद है. इसका एक आयाम भिखारी ठाकुर के नाटकों और रामेश्वर सिंह कश्यप् के रेडियो रूपकों की अपार लोकप्रियता में भी दिखाई देता है. महाकाव्य से लेकर गीत और कहानी, नाटक, उपन्यास,साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में भोजपुरी सक्रिय रही है. भोजपुरी के लोक साहित्य का प्रचुर भण्डार अलग ही है. राहुल सांकृत्यायन, रामनरेश त्रिपाठी, हीरालाल तिवारी और कृष्णदेव उपाध्याय आदि ने अथक परिश्रम से लोकगीतों,लोककथाओं का संग्रह किया है. भोजपुरी के मुहावरे और कहावतें इस भाषा की अपार सर्जनात्मकता  के चमकते हुए नगीने हैं. लोक गीतों में बहुत उच्चकोटि का साहित्य है. जिन दिनों रामनरेश त्रिपाठी भोजपुरी लोकगीतों का संग्रह कर रहे थे-वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय से मिले. मालवीय जी के पूछने पर त्रिपाठी जी ने बताया कि आजकल भोजपुरी लोकगीतों का संग्रह कर रहा हूँ. मालवीय जी के कहने पर त्रिपाठी जी ने उन्हें यह  गीत सुनाया-

बाबा नीबिया के पेड़ जनि काटऽ

नीबिया चिरइया बसेर !बलइया लेउ वीरन

बाबा बिटिया के जनि केहू दुख देहि

बिटिया चिरइया के नाईं!बलइया लेउ वीरन.

सगरे चिरइया उडि़ जइहैं

रहि जईहें निबिया अकेलि बलइया!बलइया लेउ वीरन.

सगरे बिटीयवा चलि जइहैं

रहि जइहें माई अकेलि !बलइया लेउ वीरन.

मालवीय जी पहले इस गीत को सुन चुके थे. उन्होंने  त्रिपाठी जी को न केवल इस गीत का ठीक ठीक राग बताया बल्कि इसकी व्याख्या भी की. मालवीय जी ने कहा कि भोजपुरी का यह लोकगीत कालिदास की रचना से होड़ लेता है. मालवीय जी ने  अभिज्ञान शाकुन्तलम का वह श्लोक पढ़ा जिसमें शकुन्तला के विदा होते समय कण्व ऋषि के दुख का वर्णन है-

यास्यति अद्य शंकुन्तलेति  हृदयं संस्पृष्ठम  उत्कण्ठया

कण्ठः स्तंभित वाष्पवृत्ति कलुषश्चिन्ता जडं दर्शनम्.

वैक्लव्यम मम तावदीदृर्शमिदं  स्नेहादरण्यौकसः

पीडन्ते गृहिणी कथं नु तनया विश्लेषदुखैर्नवैः.

कण्व ऋषि कह  रहे हैं -शकुन्तला आज चली जायेगी, यह सोच कर हृदय डूब रहा है. आसुओं  से गला इतना रूध गया है कि आवाज नहीं निकल रही है. विकलता के मारे आंखे पथरा गई हैं  आदि आदि. बेटी के विदा होने पर मुझ जैसे वनवासी तपस्वी का यह हाल है तो साधारण गृहस्थों का क्या हाल होगा? कालिदास ने बेटी के विदा होने पर पिता के दुख का वर्णन किया है. यहाँ  विदा  हो रही बेटी स्वयं अपना दुख पिता से कह रही है. कह रही है बाबा नीम का पेड़ मत काटना. नीम के पेड़ पर चिडि़या रहती हैं. बेटियो को कोई दुख न दे. बेटियां चिडि़या की तरह होती है.चिडि़या उड़ जायेगी नीम (भोजपुरी में नीम नीबिया होकर जैसी पीछे छूट गयी कोई बहन या अत्यंत प्रिय सहेली बन गया है )अकेली रह जायेगी. इसी तरह बेटियां विदा हो जायेंगी . घर में माँ  अकेली रह जायेगी. आजकल विस्थापन की बहुत चर्चा होती है. बेटियों  का  जीवन  स्थायी विस्थापन है. इस लोकगीत में उस विस्थापन की पीड़ा भी है. मालवीय जी जैसे हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान को यह गीत कालिदास के टक्कर का लगा. इस प्रसंग से भोजपुरी लोक साहित्य की भाव सम्पदा और कलात्मक उत्कृष्टता का अन्दाज लगता है .

भोजपुरी साहित्य का एक पहलू  वह है जो दुनिया भर में फैले प्रवासी भोजपुरियों के जीवन में मौजूद है. मारिशस, फीजी,हालैण्ड,सूरीनाम आदि देशों में भोजपुरी क्षेत्र से गन्ने की खेती करने के लिए मजदूर ले जाये गये.  इन मजदूरो के कन्धे पर सवार होकर यह भाषा भी सात समुन्दर पार पहुंची. लोकगीतों का खजाना पहुँचा .जो आज भी उनके जीवन  में मौजूद है. जो मजदूर गये थे उनकी सन्ततियाँ  आज उन देशों में राज कर रही हैं .उनके भीतर अपनी भाषा के लिए प्यार है. वे भोजपुरी में लिख पढ़ रहे हैं. हाल ही में मारीशस में भोजपुरी को राजभाषा का दरजा दिया गया है .वहां भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन बनी है. विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक भोजपुरी की पढ़ाई -लिखाई चल रही है.

भोजपुरी भाषा और साहित्य का एक अलग ही रूप भोजपुरी फिल्मों के माध्यम से  प्रकट हो रहा है. आज से पचास साल पहले ए गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबों फिल्म बनी थी. पिछले डेढ दशक में देखते-देखते भोजपुरी फिल्मो का बड़ा बाजार बन गया है. इस सफलता के पीछे भोजपुरी फिल्मों के द्वयर्थी संवाद, अश्लीलता और फूहड़पन की बड़ी भूमिका है, फिर भी भोजपुरी फिल्मों का बाजार एक नयी  सच्चाई हैं .

[spacer height=”20px”]भोजपुरी क्षेत्र का आर्थिक पिछड़ापन भोजपुरी भाषा और संस्कृति के प्रसार का एक प्रमुख कारण है. भोजपुरी क्षेत्र की बड़ी आबादी देश और  दुनिया के प्रायः हर हिस्से में आ जा रही है. उनके साथ भाषा, साहितय,फिल्में ,संगीत आदि की यात्रा हो भी रही है. यह है भोजपुरी भाषा और साहित्य का परिदृश्य.

पिछले दिनों मुझे काशी हिन्दू विश्वविालय में भोजपुरी अध्ययन केन्द्र बनाने का अवसर मिला. इसके लिए काम करते हुए मुझे कुछ सच्चाइयों  का पता चला. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जो भोजपुरी क्षेत्र के हृदय में स्थित है और जिसमें भोजपुरी भाषी लोगों की बहुतायत है वहाँ भी भोजपुरी अध्ययन केन्द्र की स्थापना करते हुए कई तरह के विरोध और आलोचना का सामना करना  पड़ा. प्रमुख आलोचनाएं इस प्रकार थीं-

1-भोजपुरी में पर्याप्त और उच्च कोटि का साहित्य नहीं है, जो है वह लोक साहित्य है.

2-भोजपुरी गवांरू भाषा है ,जिसमें अश्लीलता और फूहड़ता के आलावा कुछ नहीं है. लिहाजा विश्व विद्यालय में पढाये जाने योग्य नहीं है.

यह तर्क देने वाले भोजपुरी क्षेत्र के लोग थे. ऐसी आलोचना पर विचार करते हुए मुझे कुछ बातें समझ में आयीं. उन्हें  यहाँ साझा करना चाहता हूँ. यह सही है कि भोजपुरी में पर्याप्त  साहित्य नहीं है. इस कथन को सापेक्षिक रूप में देखना चाहिए. एक भाषा जिसके बोलनिहार करोड़ों की संख्या में हों  और जो हजार वर्ष से अपने होने का पता दे रही हो- इस नजरिये से भोजपुरी में पर्याप्त नही है. इसकी एक वजह तो यह है कि गोरखनाथ से लेकर निर्गुण  संतो की वाणी का प्रचार जनता के उस हिस्से में रहा जिसके लिए पढ़ने लिखने का न तो अवकाश था और न ही अनुमति. दूसरे इस धारा का साहित्य वर्चस्व की संस्कृति के प्रतिरोध की वैचारिकी प्रस्तावित करता है इसलिए भी उसे वैसा संरक्षण नहीं मिल सका. जैसा कि मैंने पहले ही कहा कैथी लिपि में लिखी निर्गुण  धारा से संबधित भोजपुरी की असंख्य कृतिया अपने उद्धारकर्ता के इन्तजार में यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी हैं. जन स्मृति में सुरक्षित भोजपुरी का विपुल लोक साहित्य भी इस बात की गवाही देता है कि संत साहित्य के अतिरिक्त भी रचनाएं हो रही होंगी. जहाँ तक गंवारू भाषा का सवाल है यह अंग्रेजो द्वारा बनाई गई धारणा है. देशी लोगों और देशी भाषाओं के प्रति अंग्रेजो द्वारा जान बूझ कर फैलाई गयी हीनता ग्रंथि को आजादी के बाद पढ़े लिखे मध्यवर्ग ने इस कदर अपनाया कि बोलियाँ और खासतौर से भोजपुरी के साथ गंवारूपन की धारणा घर कर गयी है .हिंदी फिल्मों में हीरो अंग्रेजी बोलकर रोब गालिब करता रहा है,जबकि घरेलू नौकर,दरबान आदि भोजपुरी बोलते हुए दिखाए जाते रहे हैं. एक तरह का भाषाई सामन्तवाद कायम हुआ . पब्लिक स्कूलों में जिस तरह हिन्दी बोलने पर सजा दी जाती रही है उसी तरह सामान्य स्कूलों में भोजपुरी लहजे का  मजाक उड़या जाता रहा हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि भोजपुरी क्षेत्र से निकलने वाले लेखकों ने भी भोजपुरी में लिखना मुनासिब नही समझा. इस भाषाई सामन्त्वाद को अब जाकर चुनौती मिलनी शुरू हुर्ह है ,जब भोजपुरी में नया उभार सामने आया. जहां तक अश्लीलता का सवाल है उसके दो पहलू है. भोजपुरी जीवन से बहुत गहरे जुड़ी हुई भाषा है.

[spacer height=”20px”] जीवन के गोपन  प्रसंगो का सार्वजनिक प्रदर्शन या उल्लेख अश्लील हो जाता है. द्वयर्थकता भोजपुरी भाषा की ताकत है. यह ताकत जीवन से गहरे जुड़ाव से आती है.  अंग्रेजी या किसी भी दूसरी भाषा के विकास का इतिहास देखें   तो उसमें भी भयानक  अश्लीलता मिलेगी  . बहरहाल भोजपुरी की इस अश्लीलता को  बाजार अपने ढंग से भुना रहा है. अश्लील छवि प्रस्तुत कर रहा है. पढ़ा-लिखा तथाकथित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी औपनिवेशिक हीनता  ग्रंथि का शिकार होने के चलते भाषा को गंवारू समझ कर छोड़ देगा तो  बाजार उसका अपने तरीके  से दुरूपयोग करेगा ही.

इस हीनता ग्रंथि के चलते बाजार की दोहरी मार  भोजपुरी पर पड़ रही है. एक तो मुनाफे के लिए भोजपुरी के अश्लील और फूहड़ पहलू को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया जा  रहा है दूसरी ओर भोजपुरी के श्रेष्ठ साहित्य के प्रकाशन और वितरण का  कोई ठौर ठिकाना नही है,  कोई बाजार नही है. भोजपुरी की रचनाएं प्रायः रचनाकारों के अपने उद्यम से प्रकाशित होती हैं और उन्हीं के द्वारा वितरित की जाती हैं. इसलिए अच्छी से अच्छी रचनाएं भी एक दायरे में सिमट कर रह जाती हैं.

खुशी की बात है कि धीरे-धीरे भोजपुरी को लेकर औपनिवेशिक हीनता  ग्रंथि खत्म हो रही है. एक तरह का राजनीतिक और  साहित्यिक उभार दिखाई पड़ रहा है. भोजपुरी का मुस्तकबिल बदल रहा है. ऐसे समय में कुछ बातें गौरतलब हैं. किसी को यह मुगालता नहीं होना चाहिए कि भोजपुरी का मुस्तकबिल बदलने का मतलब उसे विश्वभाषा राष्ट्रभाषा या ज्ञान-विज्ञान की भाषा बना देना  है. इसका सीधा मतलब है उसे अपनी मातृभाषा के रूप में स्वीकार करना .  मातृभाषा के रूप में  भोजपुरी को स्वीकार करने का तात्पर्य स्वयं को परिभाषित करने से है. यह धारणा गलत साबित हो चुकी है कि भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम होती है. जिस भाषा में हमारी चेतना का विकास होता है वह हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा होती है. औपनिवेशिक हीनता ग्रंथि और भाषाई  सामन्त वाद की वजह से मातृभाषा से हुए अलगाव के नाते भोजपुरी भाषी समाज की बड़ी क्षति हुई है. आज दुनियाभर के शिक्षाविद इस नतीजे पर पहुँचे हैं  कि समझ का सबसे उत्कृष्ट माध्यम मातृभाषाएं है. यूनेस्को ने भी इसे स्वीकार किया है.  देश के प्रमुख शिक्षा शास्त्री कृष्ण कुमार के नेतृत्व में पिछले दिनों एन.  सी. इ. आर. टी ने इस विषय पर गहन विचार मंथन किया और इस नतीजे पर पहुँची कि आरम्भिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए. अभी तक भोजपुरी का  जो साहित्य है वह भोजपुरी की सहज सृजनात्मक प्रतिभा का प्रमाण  है. कम से कम आरम्भिक शिक्षा का माध्यम बनने से भोजपुरी की सृजनात्मक क्षमता का पता लगेगा और उसका उपयोग होगा.

भोजपुरी भाषा की सर्जनात्मकता का सर्वोत्तम आना बाकी है. कबीर से लेकर भिखारी ठाकुर तक के साहित्य में मौजूद व्यंग्य धर्मिता  इस भाषा की असली शक्ति है. इस व्यंग के कारण भोजपुरी में अपार नाट्य संभावनाएं है. इन नाट्य संभावनाओं का उपयोग होना बाकी है. अफ्रीका के जगने के साथ अफ्रीका की छोटी-छोटी भाषाओं में विश्व स्तरीय साहित्य लिखा जा रहा है.  अफ्रीका के महान लेखक और विचारक न्गूगी वा  थ्यागों  ने एक दिन तय किया   कि वे अंग्रेजी में नहीं लिखेंगे. वे सिर्फ और सिर्फ अपनी मातृभाषा गिकियू में लिखेंगे और लिखने लगे. भोजपुरी को अपने  विकास और विस्तार के लिए अपने न्गूगी वा  थ्यागों  का इंतज़ार है.

 

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