मीडिया चाहे जितना जोर लगा ले, नहीं होने जा रहा भारत चीन के बीच निर्णायक युद्ध  

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जितेन्द्र राजाराम/

वैसे दुनिया भर की राजनीती में व्यक्तिवाद जैसे हावी होता दिख रहा है उसमे बहुत भरोसे के साथ युद्ध की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. पर इसके इतर ऐसी कोई वजह नहीं दिखती जो कहे कि चीन और भारत खुद को युद्ध में झोंकने जा रहे है.  इन दोनों देशों के बीच सीमा-विवाद कोई नया नहीं है. भारत और चीन दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताएं हैं. व्यापर और सीमा विवाद को लेकर इन दोनों सभ्यताओं में हमेशा से झगड़े होते रहे हैं.  तब और अब में फर्क बस इतना है कि तब हिमालय पर्वत दोनों सभ्यताओं के बीच सुलह कराने में सक्षम था और अब नहीं हैं. साथ ही  उन दिनों परमाणु हथियार नहीं हुआ करते थे.

मोर्गोलिस (Eric Margolis) ने अपनी किताब “वार अट द टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड” में भारत और चीन के बीच संभावित युद्ध के सभी पहलुओं को लिखा है. युद्ध और व्यक्तिवाद के मनोविज्ञानं के बारे में लिखते हुए इस पुस्तक में लेखक ने स्पष्ट किया है कि पहले सरकार युद्ध के लिए जन मानस को तैयार करती है और फिर जन-गुबार उस युद्ध को सरकारों से हड़प लेता है. ऐसे में उनका यह सवाल है “यदि भारत चीन का युद्ध दोनों देश की सरकारों के नियंत्रण से छूट कर बौखलाई जनता के नियंत्रण में आ गया तो परमाणु बम के उपयोग को कैसे रोका जा सकेगा?”

यहाँ समझने वाली बात ये है कि कैपिटल-इनकम-प्रोडक्शन (पूँजी-आय-उत्पादन) के सूत्र में सिले मुक्त बाजार के दो बड़े केंद्र भारत और चीन किसी भी नियम से युद्ध जैसी गलती नहीं कर सकते. लेकिन व्यक्तिवादी अतिवाद में संचार प्रसारण कंपनियों ने जो भौकाल बना रखा है उसके कुछ डरावने परिणाम भी हो सकते हैं. जैसे गिरते जनाधार की नौबत आने पर भारत के सत्ताधीशों के पास शायद ही कोई रास्ता बचे. ऐसे में, क्या हम अपने बच्चों पर परमाणु बम का हमला सहन कर पायेंगे?

अगर इसका जवाब हां है और आप इतने नासमझ है तो फिर किसी भी सम्भावना के गुणा-गणित पर बात करना बेमानी है. पर इस तनातनी के बहाने कुछ जरुरी तथ्य पर बात करने का मौका नहीं चूकना चाहिए.

युद्ध का अर्थशास्त्र भी कोई बला है!

थॉमस पिकेटि की किताब “कैपिटल इन ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी” में युद्ध काल में धनी हुए अमेरिका की अर्थव्यवस्था को एशिया, यूरोप और दक्षिण एवं उत्तर अमेरिका महादीप के प्रमुख देशों की अर्थव्यस्था से तुलना की गई है. यहीं वह सूत्र छिपा है जो कहता है कि ये दोनों देश युद्ध नहीं करेंगे.

इस किताब की एक महत्वपूर्ण खोज ये है कि युद्ध काल में पूरे विश्व में प्रतिव्यक्ति उत्पादन में अप्रत्याशित वृद्धि हुई थी. उसके बाद सीधे बीसवीं सदी के आखिरी के दो दशक और इक्कसवीं सदी के पहले दशक में ये वृद्धि देखने को मिली.

वैसे तो पिछले 2800 वर्षों में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब दुनिया के किसी न किसी कोने में  युद्ध नहीं हो रहा हो, लेकिन दूसरे  विश्व युद्ध से अफ़ग़ान युद्ध तक का समय यानि वर्ष 1945 से वर्ष 2000 तक के समय को शांति काल माना जा सकता है. हालाँकि इस दौरान भी वियतनाम, खाड़ी युद्ध और शीत युद्ध जैसे कई मोर्चे खुले रहे हैं जिनमे भयंकर विनाश हुए, लेकिन ये युद्ध आमतौर पर अमेरिका ने अपने निजी स्वार्थ के लिए किये थे.

बहरहाल वर्ष 1945 से वर्ष 1970 के दौरान मजबूत हुए पूंजीवादी ढांचे से विश्व के विकास दर ने जो मजबूती पकड़ी उसने विश्व अर्थव्यस्था में मांग और आपूर्ति के सिद्धांत को मानव कल्याण का मूलमंत्र घोषित कर दिया. इस सिद्धांत को और प्रभावी बनाने के लिए मुक्त बाजार की संधि या तो लागू की जाने लगी या फिर थोपी जाने लगी.

आज के विश्व में वो सभी देश आगे बढ़ते दिखाए गए जिन्होंने ने मुक्त बाजार होना स्वीकार किया. इनमे एशिया के चीन और भारत भी अलग-अलग उत्पादनों के साथ मुक्त-बाजार का हिस्सा बन गए. इनके हिस्से की कहानी भी बड़ी रोचक है.

ब्रिटेन के गुलाम रहे भारत ने अंग्रेजी बोलने वाले देशवासियों के दम पर एक शक्तिशाली सर्विस इकॉनमी बनाई वहीँ चीन ने अपने खनिज और मजदूरों को विदेशी कंपनियों को बेच कर उत्पादन जगत का बादशाह बन गया. चूँकि भारत के खनीज पदार्थ के बड़े खरीदार शुरू से ही रूस, जापान, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय एवं एशियाई देश रहे, इस लिए अमेरिका के कंपनियों ने भारत में निवेश कभी दिल खोलकर नहीं किया. वहीँ चीन में अमेरिकी कंपनियों ने अपने खुद के कारखाने खोल कर वह की जमीन, मजदूर और कच्चे माल पर सीधे कब्ज़ा जमा लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि  चीन को बेहद मुनाफ़ा हुआ और भारत चीन से काफी पीछे छूट गया. ज्ञात हो कि इसी समय रूस, जापान और अन्य एशियाई एवं यूरोपीय देशों की खरीदने की शक्ति इतनी कमजोर हो गई कि भारत के खनीज और कच्चे माल का बाजार चीन के मुकाबले पिछड़ता ही चला गया. दूसरी तरफ चीन इतना शक्तिशाली हो गया कि अमेरिका से भी व्यापारिक करार में अपनी शर्ते रखना शुरू कर दिया. “वन चाइना पालिसी” एक ऐसी ही शर्त है जिसके दम पर चीन ने हांगकांग को कब्जे में कर ताइवान को हमेशा के लिए हाशिये पर डालने में कामयाब हुआ.

मांग और आपूर्ति के इस अत्यंत संतुलन वाले सिद्धांत को चीन ने केवल व्यापारिक क्षेत्र में तरजीह दी लेकिन सामरिक, शैक्षणिक, संचार, प्रसारण एवं प्रशासनिक क्षेत्रों में चीन ने कभी किसी भी देश को या बाहरी कंपनियों को खुद पर हावी नहीं होने दिया. इसके विपरीत भारत में लगभग हर क्षेत्र में विदेशी कंपनियों का सीधा हस्तक्षेप होने लगा और भारत कभी भी रक्षा, प्रशासन और प्रसारण जगत में आत्म निर्भर नहीं हो पाया. भारत की रक्षा-प्रसारण प्रणाली में अमेरिका की आईबीएम कंपनी का सीधा और एकछत्र कब्ज़ा है. वहीँ माइक्रोसॉफ्ट नें भारतीय प्रशासन के पूरे आईटी तंत्र को अपना बाजार बना चूका है. इसके बदले में माइक्रोसॉफ्ट ने बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के मार्फ़त मलेरिया और पोलियो उन्मूलन अभियान में निवेश का टोटका थमा दिया है. सनद रहे की वर्तमान युद्ध प्रणाली में क्रूड आयल के भंडार ही निर्णायक जीत हासिल करने का एक मात्र संसाधन है. जहाँ भारत के पास युद्ध लड़ने के लिए सिर्फ 13 दिन का तेल भंडार है वहीँ चीन 5 वर्षों तक भारत से युद्ध करने लिए तेल का भण्डारण कर चूका है. ऐसे में अगर चीन आईबीएम को धौंस दिखा कर यदि भारतीय रक्षा-प्रसारण-प्रणाली को ठप्प करा दे तो भारत बिना युद्ध लड़े ही चीन से हार जाएगा. चीन के कहने पर आईबीएम इसलिए भी धौंस दिखा सकता है क्योंकि आईबीएम के लगभग सभी कारखाने चीन में हैं. ये भी बता दूँ कि आईबीएम वही कंपनी है जिसे हिटलर ने उसके द्वारा मारे गए यहूदियों की लाशों का डेटाबेस प्रबंधन एवं संयोजन का जिम्मा दिया था.  जब प्रतिद्वंदी के पास भिड़ने को इतने रास्ते मौजूद हों  है तो वो भला आमने सामने का युद्ध क्यों करना चाहेगा?

अब थॉमस पिकेटी की बात पर लौटते हैं. उनके मुताबिक दोनों विश्व युद्धों के दौरान विश्व में प्रति-व्यक्ति-उत्पादन (पर कैपिटा प्रोडक्शन) या यूँ कहे कि पूँजी-आय-उपत्पादन (कैपिटल-इनकम-प्रोडक्शन) में अप्रत्याशित वृद्धि हुई. वो इस बात को आगे ले जाते हुए कहते हैं कि “प्रति-व्यक्ति” एक ऐसा औसत अनुमान है जो सभी इंसानों के हित की बात नहीं करता. विश्व युद्ध काल में जितना फायदा अमेरिका और उसकी जनता को हुआ उससे कई गुना नुकसान अफ्रीका और एशिया की जनता को हुआ. लब्बोलुवाब ये है कि अमेरिका दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जो युद्ध से मुनाफ़ा कमाता है. इसकी वजह यह है कि बीसवीं और इक्कसवीं सदी का कोई भी युद्ध अमेरिका की जमीन पर नहीं लड़ा गया. इस तर्क से अगर चीन और भारत जैसे देशों के मन में तनिक भी यह इच्छा है कि ये देश कभी आर्थिक तौर पर दुनिया के सिरमौर बनेंगे तब तो ये मुल्क खुद की जमीन पर कोई युद्ध नहीं करेंगे.

अगर ये दोनों देश बस मोहरा हों पर मूल खिलाड़ी कहीं सात समंदर पार बैठा हो तो अलग बात है. और उस खिलाड़ी को कोई भी संभावित युद्ध मानवीय सभ्यता के नुकसान से अधिक हथियार बेचने के मौके के तौर पर दीखता हो.

 

जितेन्द्र राजाराम  इंदौर में रहते  हैं  और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.

 

 

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