प्रतीक को प्रतीक से बदलने की कोशिश

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उमंग कुमार/
बाबरी मस्जिद विध्वंस में जो ‘ओपन सीक्रेट’ है वो है इस विध्वंस की तारीख. दुनिया इस पर बात करती है लेकिन एक दम हल्लाबोल तरीके से यह बात स्थापित नहीं हो पा रही कि बाबा साहब के परिनिर्वाण दिवस के दिन को ही इस विध्वंस के लिए क्यों चुना गया? रचनाकारों को इस दृष्टि से भी बाबरी विध्वंस की घटना को देखना चाहिए. यह बात स्थापित की जानी चाहिए कि यह विध्वंस समाज के बड़े नायक और उनके चाहने वालों से एक प्रतीक दिवस छीनने की कोशिश थी. जैसे अभी पिछले दिनों दो अक्तूबर को स्वच्छता दिवस घोषित कर गाँधी जयंती से ध्यान हटाने की कोशिश हुई. या लालबहादुर शास्त्री को इतना बड़ा कद देने की कोशिश हर दो अक्टूबर को हुआ करती है.
आज की तारीख में अम्बेडकर की रचनाओं का पाठ होना चाहिए. उनसे जुड़े नाटक खेले जाने चाहिए. उन पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन होना चाहिए.
कायदे से देखें तो समाज के बड़े तबके को तारीख रिकलेम करने की कोशिश करनी चाहिए. आज की तारीख में अम्बेडकर की रचनाओं का पाठ होना चाहिए. उनसे जुड़े नाटक खेले जाने चाहिए. उन पर बनी फिल्मों का प्रदर्शन होना चाहिए. समवेत प्रयास हो.
बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण संबंधित संघर्ष के समानान्तर यह संघर्ष भी रहे. यह फासिस्ट ताकतों पर दोतरफा हमला होगा.
अयोध्या में मंदिर की राजनीति करने वाले अगर सच में अयोध्यावासियों के लिए भी सच में गंभीर होते तो वहाँ के लोगों की स्थिति इतनी बुरी नहीं होती.

देखिये फैजाबाद जिले से जुड़े आंकड़े:

  •  यहाँ 35 प्रतिशत स्त्रियों ( छः या उससे अधिक उम्र) ने स्कूल का मुंह देखा तक नहीं है.
  • पिछले कुछ सालों में जिले में लिंगानुपात बिगड़ा है. कुल जनसँख्या में प्रत्येक हजार पुरुष पर 1,057 महिलायें हैं पर पांच साल तक के उम्र के बच्चों में प्रत्येक हज़ार लड़कों पर महज 918 लडकियां हैं.
  • करीब 35 प्रतिशत घरों में बिजली नहीं पहुँच पायी है.
  • करीब 76  प्रतिशत घरों में शौचालय नहीं है.
  • इस एलपीजी युग में 75 प्रतिशत से ऊपर घरों में जलावन के लिए लकड़ी, उपले इत्यादि का इस्तेमाल होता है.
  • जहाँ 37 प्रतिशत महिलायें असाक्षर हैं वहीं करीब 18 प्रतिशत पुरुष असाक्षर हैं.
  • करीब 27 प्रतिशत महिलाओं का बाल विवाह हुआ है
  • महज सात प्रतिशत महिलाएं यहाँ अपने गर्भवती होने के दौरान सरकार के द्वारा जरुरी बताये जाने वाले फोलिक  एसिड की दवा लेती हैं.
  • 23 महीने तक की उम्र के कुल बच्चों में महज 48 प्रतिशत बच्चों को जरुरी टीका लग पाया है.
  • करीब 50 प्रतिशत बच्चे अभी कुपोषित हैं.
  • 30 प्रतिशत महिलायें और 33 प्रतिशत पुरुष कुपोषित हैं
  • पांच साल तक की उम्र के बच्चों में 61 प्रतिशत से अधिक एनीमिया से प्रभावित हैं वहीँ 60 प्रतिशत महिलायें और 38 प्रतिशत पुरुष एनीमिया से ग्रसित हैं. एनीमिया से तात्पर्य खून की कमी होती है.

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