धर्मतंत्र में तब्दील होता लोकतंत्र: आम चुनाव 2019 के मार्फत एक पड़ताल

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नरेन्द्र मोदी

चंदन पांडेय/

2019 का बहुप्रतीक्षित चुनाव खत्म हो गया. परिणाम हैरतअंगेज रहे. जिनके पक्ष में रहा, शायद उन्हें भी यकीन न हो रहा हो कि इतनी सीटें कैसे आ गईं.  सत्ताधारी दल विजयी रहा. जवाहर लाल नेहरू और मनमोहन सिंह के बाद नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हुए जिन्होंने दो लगातार चुनाव जीते. अगर इवीएम पर उठने वाले वाजिब और गैर-वाजिब प्रश्नों को एक पल के लिए दरकिनार करें तो कह सकते हैं कि जनता ने मोदी सरकार के ‘पाँच वर्षों की उपलब्धियों’ से खुश होकर मतदान किया और यह भी कह सकते हैं कि मोदी सरकार द्वारा बनाया गया ‘भविष्य का रोडमैप’ इतना लोकप्रिय हुआ कि जागरुक भारतीयों ने उन्हें अपना समर्थन दिया. जनता के विवेक पर प्रश्न उठाना अनुचित होगा क्योंकि मशीन और मनुष्य के बीच का जो गैप है उस पर कोई स्पष्टता नहीं होने से यह जानना मुश्किल है कि जनता आखिर चाहती क्या है. मसलन मान लीजिए आंध्रप्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक जगह इवीएम द्वारा गिनती में एक उम्मीदवार को महज एक वोट मिले हों, इसलिए आप कह सकते हैं कि उस मशीन के जरिए महज एक आदमी ने उसे अपना मत दिया था. इस तथ्य को आधार बनाकर आप न जाने कितने विश्लेषण कर सकते हैं, लेकिन जैसे ही यह पता लगे कि उसी मशीन से निकली पर्चियों (वीवीपैट) की गिनती में उस उम्मीदवार को एक सौ चौरानबे मत मिले तो आपकी राय बदल जायेगी और आपका विश्लेषण भी बदलेगा.

भारत की इवीएम मशीनों में गड़बड़ी पाए जाने से सम्बंधित कोई शोध संभव नहीं हुआ है इसलिए आगे की चर्चा इस जनादेश को लेकर रहेगी लेकिन उससे पहले यह बता देना जरुरी है कि ‘फ्रीडम हाउस (एक अमरीकी संस्था)’ द्वारा 2017 में किये गए  एक रिसर्च में पाया गया कि पिछले एक दशक में लोकतंत्र की गुणवत्ता में गिरावट देखी गई है और इकहत्तर देशों में राजनीतिक अधिकारों और नागरिक आजादी को लेकर यह गिरावट काबिले गौर है. यह एक ऐसा समय है जब तानाशाह ही चुनाव पसंद करने लगे हैं जैसे आजेरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव. ‘नीक चीजमैन और ब्रायन क्लास’ अपनी किताब ‘हाउ तो रिग एन इलेक्शन’ में वर्ष 2013 का वह वाकया लिखते हैं जब आजेरबैजान के दमनकारी शासन के सर्वेसर्वा (राष्ट्रपति) इल्हाम अलियेव ने चुनाव के मार्फ़त अपनी छवि को लोकतान्त्रिक बनाने का बेहतरीन प्रयास किया था. उन्होंने एक ऐप विकसित करवाया जिसका मकसद था कि जनता मतदान के गिनती के दिन ‘रियल टाईम’ अपडेट अपने फोन पर देख सके. निसंदेह यह बेहतरीन काम था. इसमें मुश्किल बस इतनी आई कि मतों की गिनती के एक दिन पहले ही उस ऐप पर सारे परिणाम दिखने लगे थे. प्रश्नों की बाढ़ आ गई. तब वहाँ के निष्पक्ष अधिकारियों ने (जैसे अपने यहाँ चुनाव आयोग है) ने प्रेस को बताया कि ये परिणाम जो आज दिख रहे हैं वो दरअसल पिछले चुनावों के परिणाम हैं. बाद में जब यह पूछा गया कि उम्मीदवारों के नाम जो दिख रहे हैं वो सब इस वर्ष वाले हैं, पिछले चुनावों के नहीं तब अधिकारियों को जवाब देते नहीं बना था.

लेकिन हकीकत यही है कि भारत की इवीएम मशीनों में गड़बड़ी पाए जाने पर कोई शोध इस लेख के लिखे जाने तक संभव नहीं हुआ है, ऐसे में इस जनादेश को आधार बनाकर देखें तो इस प्रचंड जीत के दस कारण जो समझ में आते हैं वो निम्नलिखित हैं:

1- आख्यान: लोकसभा का यह चुनाव अपने आख्यानों (नैरेटिव्स) के लिए याद किया जाएगा. यह पहला ऐसा चुनाव था जिसमें मुद्दे नहीं थे, गल्प था. ‘देश पर कोई संकट मंडरा रहा है और देश का संचालन अब तक गलत हाथों में रहा है’ यही बिगुल था, यही शंखध्वनि थी. विपक्ष में होते हुए भाजपा जो मुद्दे उठाया करती थी जैसे महंगाई, रोजगार आदि वो सब सिरे से नदारद थे. राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ वाले नारे और उसके पीछे तथ्यों को छोड़ दें तो कांग्रेस के पास कोई दूसरा मुद्दा नहीं था. भाजपा देशभक्ति के अपने लोकप्रिय पिच पर थी इसलिए उसे अन्य मुद्दों की जरुरत भी नहीं थी. यह चुनाव गल्प पर लड़ा गया.

2- धर्म और जाति की जकड़न: लेखक के होश में यह पहला चुनाव था जब लगभग सबने अपनी जाति के हिसाब से अपना दल चुन लिया था. उनके लिए मुद्दे नहीं थे. सवर्णों का एका द्रष्टव्य था. उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है. ओबीसी की बात करें तो उत्तर प्रदेश में में यादव बनाम नॉन-यादव का कार्ड चला वहीं बिहार में यह बँटवारा नहीं था लेकिन उनका समर्थन इस बार भाजपा को था.

3- पाकिस्तान: यह एक बार फिर साबित हुआ कि पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर चुनाव अब भी जीता जा सकता है और यह चुनाव भी इस नियम को तोड़ नहीं पाया. पाकिस्तान के खिलाफ बोलते हुए जब नेताओं के गले की नशें फूलती थीं तो जनता की धमनियों में खून और देशभक्ति दौड़ने लगती थी. उस जनता के लबों पर आए प्रश्न तालु में चिपक कर कहीं रह जाते थे. जनता को मीडिया, सोशल मीडिया, चुनाव प्रचार से यह स्पष्ट सन्देश गया कि मोदीजी पाकिस्तान को सबक सिखा देंगे.

4- पुलवामा: चुनाव की घोषणा के ठीक पहले हुए पुलवामा सैन्य कैम्प पर हमले ने भारतीयों को भीतर तक चोट पहुंचा दी. हमलावर जो भी रहा हो लेकिन अपने चालीस, बयालीस बेटों की शहादत ने अपने देश के नागरिकों को खून के घूँट रुला दिए. देश का बच्चा बच्चा यह जान गया था कि बालकोट पर की गई कार्रवाई में नरेंद्र मोदी का योगदान है और इसलिए नागरिकों ने उन्हें चुना.5- महागठबंधन: उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा का एकजुट हो जाना इस लोकसभा चुनाव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम था. इस ऐतिहासिक कदम के लिए सुश्री मायावती और अखिलेश यादव बधाई के पात्र हैं. इसके परिणाम दूरगामी होंगे लेकिन इस चुनाव के लिए यह कदम देरी से उठाया गया. मैनपुरी की वह रैली जिसमें मुलायम सिंह यादव ने हिस्सा लिया था उस रैली ने पहली बार गठबंधन के सन्देश को नीचे तक ले जाने का काम किया. सपा बसपा का मिलना उनके मतदाताओं का मिलना नहीं था. इसके लिए जरुरी प्रयास किये जाने थे जो शायद नहीं हो पाए.

6- अन्य विपक्ष: विपक्ष ने अपने सीमित संसाधनों से चुनाव प्रचार में अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन परिणाम मनोनकुल नहीं रहे. कांग्रेस राहुल प्रियंका के इर्द-गिर्द घूमती रही. राहुल गांधी ने प्रभावित किया. उनके कैम्पेन, उनके लहजे, उनके अंदाज में एक नई बात थी. सुकून था. और तो और, उनकी शब्द-सम्पदा भी बेहतरीन थी. धारदार मुहावरे और तीक्ष्ण अंदाज.शुरु में तो उन्हें नकारने की भरपूर कोशिश की गई लेकिन थक-हार कर मीडिया को उन्हें ‘स्पेस’ और समय देना पड़ा. उधर तृणमूल ने और मूलतः ममता बनर्जी ने गजब का जज्बा दिखाया लेकिन बंगाल में बदलाव की बयार बह रही है और उसका खामियाजा ममता दीदी को आने वाले विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है. स्टालिन की पार्टी डीएमके ने तमिलनाडु में बेहतरीन प्रदर्शन किया. बिहार में यूपीए की पराजय अविश्वसनीय है.

7- संसाधन: भौतिक संसाधन में तो भाजपा अव्वल रही ही दूसरे जो अभौतिक संसाधन थे जैसे मीडिया, सोशल मीडिया उस पर भी भाजपा हावी रही. हर तरफ मोदी, मोदी, मोदी ही रहे. अक्षय कुमार से लेकर अर्नव गोस्वामी तक, सभी कमुनिकेशन व्यवसायी मोदी जी का झंडा थामे रहे. मीडिया ने जनता को यह सोचने का अवकाश ही नहीं दिया कि जनता के अपने भी कुछ मुद्दे हो सकते हैं.

8- आरक्षण: गरीब सवर्णों को मिला दस प्रतिशत का आरक्षण भाजपा के लिए संजीवनी का काम किया. यह ऐसा निर्णय था जो बालकोट पर हमले से भी अधिक प्रभावकारी रहा. दूसरी तरफ, उदारीकरण के पश्चात प्राईवेट सेक्टर में ओबीसी और एससी/एसटी को आरक्षण न देकर कांग्रेस ने जैसे आत्मघात कर लिया था. कांग्रेस को उसके दुष्परिणाम अब दिख रहे हैं. एक विशाल मध्यवर्ग और उच्च मध्यवर्ग तैयार हुआ है जहाँ सिर्फ सवर्ण हैं जिन्हें अब धर्म की चिंता सता रही है और उस खाँचें में सिर्फ भाजपा फिट बैठती है.

9- सोशल मीडिया: इस नए प्रेत का तो कहना ही क्या! किसी जहरीले साँप का जहर भी उतनी तेजी से नहीं फैलता जितनी तेजी से सोशल मीडिया पर जहर फैल रहा है. भाड़े के टट्टू दिन रात मिम्स बनाने में लगे रहे. अतीत से खिलवाड़ जारी रहा और हर फरेब का जिम्मेदार कोंग्रेस को बनाने वाले सन्देश हवा में टहलते रहे.

10- सरकारी मशीनरी: यह बेहद आपत्तिजनक रहा कि बहुत से लोगों ने केन्द्रीय चुनाव आयोग का नाम बदल कर केचुआ बना दिया. हो सकता है कुछ त्रुटियाँ इस आयोग से हुई हों लेकिन अपनी संस्थाओं का यों मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं. हो सकता है, चुनाव आयोग में सरकार का दखल रहा हो और चुनाव कार्यक्रम उसके अनुसार ही बनाया गया हो लेकिन यह उस संस्था के मजाक उड़ाने का आधार तो नहीं हो सकता. यह गलत था.

11- प्रज्ञा: भोपाल से विजयी इस उम्मीदवार का परिचय यह है कि मालेगांव बम धमाकों के मामले में अभियुक्त हैं और अभी बीमारी के सिलसिले में बेल पर रिहा है. इसकी जीत ने भारत का नया चेहरा सामने किया है. धर्म किस कदर लोकतंत्र में घुस आया है उसे जानना हो तो आप इनकी जीत देख सकते हैं या फिर किसी जंगल में जाईये और कोई ऐसी लकड़ी खोजिए में जिसमें घुन ‘नहीं’ लगे हों.

इस चुनाव परिणाम में अगर कोई सन्देश छुपा है तो यही कि जनता ने नोटबंदी और जीएसटी के निर्णयों पर सहमति की मुहर लगाई है. वो कोई और लोग थे जो इन निर्णयों के प्रभाव् में अपना जीवन या अपना रोजगार गँवा बैठे. इस चुनाव के प्रचार में सर्वाधिक अखरने वाली बात थी वो यह कि विपक्ष ने मोब लिंचिंग और गाय के नाम पर हत्याओं को मुद्दा नहीं बनाया, जो अमानवीय और नृशंस हत्याएं थी उसे न जाने किस भय से विपक्ष ने उठाया तक नहीं, जैसे उन्हें लगा हो कि इन मुद्दों पर बात करने से उनकी सीटें कम हो जायेंगी.

यह चुनाव इसलिए भी याद रखा जाएगा कि बिना किसी स्वप्न के, बिना किसी मुद्दे के चुनाव लड़ा जा सकता है.

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