सांवला सलोना है!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/
रजनीश जे जैन/

बाज़ार अपना विस्तार कर चुका है। बाज़ार अब बाज़ार से  निकलकर हमारे घरों तक आ  पहुंचा है। यह बाज़ार अपनी यात्रा में सबसे पहले जिसे कुचलता है वे मानवीय संवेदनाएं ही होती है। घटना उत्तर प्रदेश के एक शहर की है। एक महिला ने अपने से उम्र में दो वर्ष बड़े पति को सिर्फ इस बात के लिए जिंदा जला दिया कि उसका रंग सांवला था। भारतीयों की  गोरे रंग के प्रति आसक्ति की यह पराकाष्ठा है। चुनाव के शोर में राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र में अंतिम पेज पर छपी यह लोमहर्षक खबर अगर समाज को आंदोलित नहीं करती तो मान लेना चाहिए कि संवेदनाएं शून्य हो चुकीं हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ बताते है कि ‘गौरवर्ण’ के लिए हमारा उतावलापन न केवल विदेशियों के हम पर ढाई सौ बरस शासन का परिणाम है बल्कि हमारे अवचेतन में भी इस तथ्य का गहरे से उतर जाना है कि गौरवर्णीय लोग ज़्यादा बुद्धिमान, ज़्यादा साहसी और ज़्यादा समझदार रहे हैं। अंग्रेजों की बिदाई के बाद जैसे ही हमारे बाजार विकसित होने लगे हमारे सामने रूसी थे। शासक अंग्रेजों के बाद सहयोगी रुसी भी सुर्ख गोरे थे। जिस ब्रिटिश  शासन और अत्याचारों से हमें नफरत थी उनके रंग से हमें प्यार हो गया था।  बाज़ार ने यह बात गहरे तक उतार दी है कि सांवला रंग, हीन भावना और समाज के निम्न स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। अगर जीवन में कुछ करना है तो वह गोरे  रंग की वजह से ही संभव हो पाएगा। अगर आपका रंग गेहुंआ है तो उसे बदले बगैर आप आगे नहीं  बढ़ सकते।

हमारी इसी कमजोरी को भुनाने के लिए, 1978 में बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनि लीवर ने एक प्रोडक्ट बाजार में उतारा जिसका नाम था  ‘फेयर एंड लवली’ . बीते चालीस वर्षों से यह क्रीम गोरेपन को बेच रही है। इसका उपयोग कर कितने सांवले गोरे हुए इसका स्पष्ट आंकड़ा कंपनी के पास भी नहीं है। लगभग 27 अरब रुपये का व्यवसाय करने वाली यह क्रीम प्रतिवर्ष अठारह प्रतिशत की वृद्धि के साथ हिन्दुस्तानियों को गोरे रंग के सपने बेच रही है। भारत में हर वर्ष त्वचा को गोरा बनाने वाली क्रीम की 233 टन खपत होती है। कोक और पेप्सी से कहीं ज़्यादा खर्च हिन्दुस्तानी अपने चेहरे के लिए कर रहे हैं!

देश के अधिकांश अखबारों में रविवार को प्रकाशित होने वाले वैवाहिकी विज्ञापन हमारे अवचेतन में जमी लालसा का ही विस्तार नजर आते हैं। कोई भी विज्ञापन उठा लीजिए, सभी विवाह योग्य लडकियां श्वेतवर्ण की ही होती हैं वहीं वधु चाहने वाले सारे वर ‘फेयर कॉम्प्लेक्शन’ को ही वरीयता देते नजर आते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसी घटना की पुनरावृत्ति हो जाए तो उसे क्षम्य नहीं माना जाना चाहिए? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाहरी रंग और  आवरण से ज़्यादा व्यक्ति का चरित्र और स्वभाव महत्वपूर्ण होता है। शक्ल सूरत से  ज्यादा टिकाऊ सीरत रही है।

बहुसंख्यक समाज की  मानसिकता को बदल देने में बाज़ार की  शक्तियां किसी भी हद तक जा सकती हैं। मौजूदा समय में फ़िल्मी सितारे और नामचीन क्रिकेटर भी इस तरह के प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन करते नजर आ रहे हैं। अधिकांश विज्ञापनों का  संदेश स्पष्ट होता है कि इसे आज़मा कर उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे हर नामुमकिन काम कर सकेंगे। यकीन नहीं होता है कि कोई खुलेआम भ्रम बेच रहा है और समझदार उसे खरीद भी रहे हैं।

देश में चल रहे रंगभेद पर सबसे पहले फिल्मकार अभिनेत्री नंदिता दास ने आवाज उठाई थी। उन्होंने बाकायदा एक अभियान ‘सांवला सलोना है’ (द डार्क इज़ ब्यूटीफुल) के माध्यम से त्वचा के आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ आरम्भ किया था। सांवले रंग के लोगों को नीचा दिखाने और उन्हें कमतर साबित करने वाले विज्ञापनों के विरुद्ध इस अभियान ने ‘ एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्ड कॉउंसिल ‘ को अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई। जवाब में कॉउन्सिल ने  विज्ञापनों के लिए एक गाइडलाइन जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली । भ्रामक और नस्लभेदी विज्ञापन आज भी बदस्तूर जारी हैं।

यद्यपि चुनिंदा ही सही, कुछ सितारे इस विषय की गंभीरता को समझ कर और लुभावनी रकम ठुकरा कर गोरा बनाने वाली क्रीम का विज्ञापन करने से इंकार कर चुके हैं। उल्लेखनीय सितारों में रणवीर कपूर, रणदीप हुड्डा, कंगना राणावत और अनुष्का शर्मा प्रमुख नाम हैं।

निःसंदेह गोरे रंग का प्रचार करने में फिल्मों की अहम भूमिका रही है। हिंदी फिल्मों के अधिकांश गीत गोरे रंग का ही महिमा मंडन करते रहे हैं ।आर्क लाइट में दमकते नायिका के सौंदर्य ने देश की नवयुवतियों को वैसा ही बनने के लिए प्रेरित किया है। परंतु एक अपवाद भी है । गोरे रंग के शोर के बावजूद  1963 में बनी बंदिनी के एक गीत ‘ मोरा गोरा रंग लेइले, मोहे श्याम रंग दई दे ‘ गा कर सांवली हो जाने की गुजारिश करती महान नूतन इकलौती नायिका नजर आती हैं।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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