धारा 497 पर न्यायालय का फैसला: अनैतिक और अपराध के बीच का अंतर समझना जरुरी

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जितेन्द्र राजाराम/

जिस्मानी संबंध दो ही वजहों से आम चर्चा का मुद्दा बनते हैं. या तो फूहड़ मजाक के रूप में या फिर नैतिकता की बेदी पर पितृसत्ता को सही ठहराने के लिए. धारा 377 और 497 पर आये सर्वोच्च न्यायलय के हालिया फैसले को भी इन्ही दो कसौटियों पर तौला जा रहा है. कई जागरूक और सवेदनशील सामाजिक कार्यकर्ता भी धारा 497 को अपराध की श्रेणी से बाहर करने को लेकर सर्वोच्च न्यायलय की भर्त्सना कर रहे हैं. लेकिन इन लोगों की नज़र एक मामूली सी बात पर नहीं जा रही है.

न्यायिक संस्था दो पक्षों के बीच में हुए किसी विवाद को सुलझाने के लिए विधि-विधान के आधार पर फैसले सुनाता है. न्यायिक प्रक्रिया के मूल में दो या दो से अधिक पक्षों के द्वारा पेश किया गए दावे की पैरवी या विरोध में ही दलील होती है. इस मुद्दे में दो पक्ष केवल पुरुष ही हैं. इसका तात्पर्य यह हुआ कि एक महिला के साथ कौन पुरुष संबंध रख सकता है इसकी पैरवी दो पुरुषों में से किसी एक पुरुष के हित में ही होगी.

ऐसा इसलिए कि सन 1860 में बने इस कानून में सम्बंधित महिला के पक्ष समझने की कोई कोशिश नहीं की गई थी और यह अपने मूल में समानता के अधिकार का हनन करता है. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ऐसे भी समझा जाना चाहिए कि यदि शादी के बाहर बनाया गया संबंध उक्त विवाहित दम्पति में से किसी भी एक व्यक्ति के अधिकारों की उपेक्षा करता है तो वह व्यक्ति विवाह विच्छेद की अपील कर सकता है, लेकिन ऐसे जिस्मानी संबंधों को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

27 सितम्बर को सुनाया गया फैसला न सिर्फ विवाह संस्था की रक्षा करता है, बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों के समानता के अधिकार की भी रक्षा करता है.

तात्पर्य यह कि 27 सितम्बर को सुनाया गया फैसला न सिर्फ विवाह संस्था की रक्षा करता है, बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों के समानता के अधिकार की भी रक्षा करता है.

ये फैसला सन 1860 से लेकर सन 2018 के बीच विकसित हुए भारतीय जन मानस में महिलाओं के अधिकार, पितृसत्ता की निरंकुशता से स्वाभाविक न्याय की तरफ तय की गई दूरी को दर्शाता है.

जो लोग इस फैसले को परिवार के विघटन का कारक मानते है, वे वैवाहिक जीवन को सशक्त बनाने के लिए समाज के दायित्व को महत्वहीन मान रहे हैं. उन लोगों के लिए बस एक सूत्र है कि अनैतिक और अपराध के बीच के फासले को समझे. अदालत इस फर्क को बेहतर समझ रही है.

यदि कोई विवाहित व्यक्ति विवाह से परे कोई रिश्ते बनता है तो अनैतिक जरुर है. पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस्मानी संबंध बनाना किसी भी व्यक्ति का निजी और मौलिक अधिकार भी है.

जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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