देश के सारे चुनाव एक साथ कराने का मतलब लोकतंत्र को काबू में करना है

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उमंग कुमार/

देश में चारों तरफ अचानक से सारे चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश शुरू हो गई है. जहाँ हाल ही में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ समाचार चैनलों को साक्षात्कार में इसकी वकालत करते दिखे, वहीँ दूसरी तरफ एक ऐसे शख्स (ओम प्रकाश रावत) को देश का मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया है जो देश के सारे चुनाव को एक साथ कराने का समर्थक है. इन्हीं दिनों अचानक से मुम्बई में दो-दिवसीय संगोष्टी का आयोजन भी हो जाता है जहां देश के सारे चुनाव एक साथ कराने पर बल दिया जाता है. पिछले साल नवम्बर में नीति आयोग ने भी एक पर्चा प्रकाशित कर इसका समर्थन किया.

क्या यह सब सुनियोजित नहीं लगता? इसका मतलब है कि सरकार पूरा मन बना चुकी है कि वो देश में होने वाले सारे चुनाव एक साथ ही कराएगी. पक्ष-विपक्ष पर बात करने के पहले इसके ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझ लें.

देश की आजादी के बाद लोकसभा के चुनाव और राज्यों के चुनाव करीब डेढ़ दशक तक साथ होते रहे. यानि कि सन् 1950 से लेकर सन् 1967 तक. वर्ष 1971 में लोक सभा अपने तय समय से एक साल पहले ही भंग कर दिया गया और इस तरह राज्यों और केंद्र का चुनाव अलग-अलग होने लगा. धीरे-धीरे राज्यों का बंटवारा भी होता गया और उनके स्थानीय वजहों से समयकाल बदलता गया.

मालूम होना चाहिए कि किसी राज्य या केंद्र सरकार के अल्पमत में आ जाने के बाद छः महीने के अन्दर चुनाव कराना होता है. देश में होने वाले चुनाव अपनी दिशा तय कर रहे थे कि अचानक आजकल राजनितिक गलियारे में इन चुनावों को दिशा देने की तैयारी की जा रही है.

एक साथ लोक सभा और विधान सभा के चुनाव चाहने वाले लोगों के तीन तर्क हैं. आईये पहले इन तर्कों को समझते हैं.

बिबेक देबरॉय जो प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार समिति के चेयरमैन हैं, ने नवम्बर 2017 महीने में एक परचा प्रकाशित किया. इस पर्चे के अनुसार देश में लागातार चुनाव होने से अव्वल तो विकास बाधित होता है. बार-बार अचार संहिता लागू किया जाता है जिससे कई सारे विकास से जुड़े फैसले प्रभावित होते हैं.

दूसरे, इन चुनावों पर बहुत खर्चे आते हैं. इस पर्चे में दिए गए ब्योरे के अनुसार, 2009 के लोक सभा चुनाव में केंद्र सरकार को 1,115 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे. वहीं महज़ पांच साल बाद हुए चुनाव यानि 2014 के लोक सभा चुनाव में केंद्र सरकार ने 3,870 करोड़ रुपये खर्च किये. राज्यों में होने वाले चुनाव के खर्चे का उदाहरण देते हुए यह परचा बताता है कि बिहार में 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य सरकार को करीब 300 करोड़ खर्च करना पड़ा था. वहीं गुजरात चुनाव में करीब 240 करोड़ खर्च होने का अनुमान लगाया गया है.

तीसरी वजह में सुरक्षाकर्मियों के बार-बार चुनाव में व्यस्तता को बताया गया है. जैसे 16वें लोकसभा के चुनाव में करीब एक करोड़ लोगों को चुनाव कराने में शामिल किया गया था. ये लोग 9,30,000 पोलिंग बूथ पर लगाए गए थे. मतलब हर पोलिंग बूथ पर औसतन 10-11 कर्मचारी.

इसके अतिरिक्त बिबेक देबरॉय कुछ और मुद्दों की तरफ इशारा करते हैं जो बार-बार चुनाव की वजह से सामने आता है. इससे लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त होता है.  देश में बार-बार चुनाव होने से जाति, धर्म और सांप्रदायिक मुद्दे उछलते हैं.

लेकिन क्या लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ इन्हीं वजहों से होंगे या नहीं होंगे. क्या लोग किसी राजनितिक पार्टी को एक बार पांच साल के लिए सत्ता सौंपने के लिए तैयार हैं? क्या कोई दल एक बार चुन लिए जाने के बाद साढ़े चार साल के बीच जनहित के फैसले ले सकेगा. इसके लिए हालिया उदाहरण हैं जीएसटी और गुजरात चुनाव. सरकार ने बिना तैयारी के नई कर प्रणाली जीएसटी लागू कर दिया और तब तक लोगों की समस्या पर विचार नहीं किया, जब तक गुजरात चुनाव में उन्हें अपने खिलाफ माहौल बनता नहीं दिखा. अगर गुजरात चुनाव नहीं आता तो क्या लोग उस गलत फैसले के शिकार होते रहते? वर्तमान सरकार के ढेरों ऐसे फैसलें है जिसका जवाब उन्हें चुनाव में देना पड़ा है.

सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि देश की किसी राजनितिक पार्टी ने जनता का भरोसा नहीं कमाया है जिनको एक बार चुनकर देश के भविष्य की चाभी पांच साल के लिए सौंप दी जाए

रह गई बात पैसे की. तो क्या करीब 16 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था के लिए 50 हज़ार करोड़ रुपये लोकतंत्र की आत्मा बचाए रखने से अधिक महत्वपूर्ण हैं. दूसरे, ये पैसे आखिर कहाँ खर्च होंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि इन पैसों से देश की अर्थव्यवस्था में तरलता बढती है. बिबेक अपने पर्चे में यह जिक्र जरुर करते हैं कि राजनितिक दल ढेर सारा पैसा चुनाव पर खर्च करते हैं लेकिन वह राजनितिक पार्टियों के खर्चे को नियंत्रित करने की जगह आम जनता के अधिकार को अधिक नियंत्रित करना पसंद करते हैं.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भारतीय जनता पार्टी भविष्य में होने वाले चुनावों से डरी हुई है इसलिए चाहती है कि एक बार में पांच साल सुरक्षित कर ले. यह भी मालूम रहे कि यह राजनितिक दल कुछ ऐसे विवादित मुद्दों को भी हवा देता रहा है जो संविधान की भावना से मेल नहीं खता. जैसे अयोध्या में राम मंदिर बनाने का वादा. अयोध्या विवादित विषय है और सर्वोच्च न्यायालय इसकी सुनवाई कर रहा है. ऐसे में किसी राजनितिक दल का इस मुद्दे को हवा देना असंवैधानिक श्रेणी में आएगा.

सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि देश की किसी राजनितिक पार्टी ने जनता का भरोसा नहीं कमाया है जिनको एक बार चुनकर देश के भविष्य की चाभी पांच साल के लिए सौंप दी जाए. ये ऐसे मुद्दे हैं जिनपर बहस के बिना सारे चुनाव एक साथ कराने की गंभीरता को नहीं समझा जा सकता.

इसके अतिरिक्त कुछ मुद्दे ऐसे हैं जैसे, मान लीजिये छः महीने के अन्दर ही किसी राज्य में सरकार अल्पमत में आ जाती है तो वहाँ कौन शासन करेगा? क्या वहां चुनाव अगले साढ़े चार साल के लिए स्थगित हो जाएगा? या केंद्र सरकार उस राज्य पर इतने लम्बे अंतराल के लिए शासन करेगी?

शायद इन्हीं वजहों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विपक्षी राजनीतिक दलों ने लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के विचार का सोमवार को विरोध किया. कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय पर संसदीय स्थायी समिति की बैठक में कांग्रेस, मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए जा रहे इस विचार पर अपना विरोध जताया.

एक विश्वस्त सूत्र से मिली जानकारी के मुताबिक, विपक्षी सदस्यों ने कहा कि वर्तमान में ऐसा करना संभव नहीं है. विपक्ष के कई सदस्यों को लगता है कि एक साथ चुनाव कराना यथार्थवादी नहीं है और वर्तमान हालात में संभव भी नहीं है.

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  1. एक साथ चुनाव होने की स्थिति में लोकसभा और राज्यसभा दोनो में एक ही राजनीतिक दल का कब्जा होने की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में सरकार का निरंकुश हो जाना बेहद आसान हो जाता है।

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