कड़वी हवा में कड़वा सच

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एम. रतिश/

जलवायु परिवर्तन एक ऐसी विषाक्त परिस्थिति है जिसमे मौसमी दशाओ मे गंभीर बदलाव आते है. यह बदलाव मूलत: मनुष्य के विभिन्न क्रियाकलापो के वजह से हो रहे है.

अद्योद्यिक क्रांति ने भले ही दुनिया मे रोजगार को काफी बढावा दिया है, पर इसी क्रांति ने प्रदूषण को भी बहुत बढ़ा दिया है. ग्रीनहाउस प्रभाव और वैश्विक तापमान मे इजाफा भी इसी की देन है. कार्बन डाई ऑक्साइड की बढती मात्रा भी हवा को बुरी तरह दूषित कर रही है. मनुष्यों की बात तो और है, बेचारे पशु पक्षी भी इस प्रदूषण की मार झेल को मजबूर हैं.

इस जलवायु परिवर्तन का सीधा असर पानी पर भी हो रहा है. भूजल की मात्रा दिन-प्रतिदिन इस परिवर्तन के कारण कम होते जा रही है. पानी को किसी ने नही बनाया और ना ही बनाया जा सकता है, पर इसे बचाने मे हम अहम भूमिका निभा सकते है.

इन सारी बातों का सबसे भयावह असर कृषक समाज पर पड़ा है. नेशनल क्राईम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकडो के मुताबिक किसान आत्महत्या का स्तर काफी भयावह है.

सन् 2015 के आंकडो को अगर देखा जाये तो देश के कुछ राज्यो मे किसान आत्महत्या का लेखा-जोखा कुछ इस प्रकार है-

महाराष्ट्र -3030,  तेलंगाना -1358,  कर्नाटक – 1197, छत्तीसगढ – 854, आंध्रप्रदेश – 576, मध्यप्रदेश – 581. इन आंकडो को अगर देखा जाए तो सबसे ज्यादा भयावह मंजर महाराष्ट्र मे है.

सन् 2009 से लेकर 2016 तक कुल मिलाकर 23,000 किसानो ने अपने प्राण लिए है वो भी अकेले महाराष्ट्र मे. आंकडे काफी भयावह है और इसकी रोकथाम बेहद जरुरी है.

टामा कार्लटन जो की एक रिसर्चर है केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले मे, अगर उनकी माने तो बीते 30 सालो मे संपूर्ण भारत मे कुल 59,000 किसानो ने अपनी जान दी है.

किसान आत्महत्या का मूल कारण वर्षाजल का अभाव है. पुराने जमाने के राजाओ ने जो कुँए और बावडिया बनाई थी, अब उन सबका इस्तेमाल वर्षाजल संचयन मे किया जा सकता है, ताकि हमारे किसानो का जीवन बचाया जा सके.

नील माधब पंडा के सशक्त निर्देशन मे बनी फिल्म “कडवी हवा” का केंद्रीय बिंदु भी उत्तरप्रदेश के महुआ जिले के खेडा गाँव के किसानो की दुर्दशा ही है.

संजय मिश्रा और रणवीर शौरी का अभिनय एक तीक्ष्ण कटाक्ष है जो एक कृषक के जीवन का ब्यौरा डेटा है. मिश्रा ने तो अपने अभिनय से मेरी अंतरआत्मा को झकझोर कर रख दिया है, उनके अभिनय जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन. रणवीर शौरी ने भी दिल जीत लिया है.

जलवायु परिवर्तन और पानी की किल्लत का इस प्रकार का मार्मिक चित्रण बेहद सराहनीय है. अभी भी बहुत वक्त है, हमे सचेत होने की आवश्यकता है ताकि हमारे किसान सुरक्षित रहे.

 (लेखक मुम्बई में रहते हैं और एक मल्टीनेशनल के साथ जुड़े हुए हैं)

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