गोरखपुर में बच्चे मर रहे हैं पर पूरा उत्तर प्रदेश है बहुत बीमार

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इस राज्य पर शासन करने वालों ने पिछले 15 सालों में इसे खूब छला है.

शिखा कौशिक/

आज जब गोरखपुर के अस्पताल में अचानक 30 के करीब बच्चे एक रात में मरते हैं तो सबको हैरानी हो जाती है. सब चिल्लाने लगते हैं. विपक्ष भी. वही विपक्ष जो पिछले पंद्रह-बीस सालों से इस राज्य पर शासन करता रहा है. इसमें समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों ही  शामिल हैं जिन्होंने योगी सरकार से राज्य के स्वास्थय मंत्री का इस्तीफ़ा माँगा है.

हर साल इस अस्पताल में 500 से अधिक बच्चे मरते हैं. वर्ष 2013 में कुल 650 बच्चे और उसके तीन साल बाद यानि पिछले साल 641 बच्चे मरे. इस साल भी अगस्त 11 और 12 को जब ऑक्सीजन की किल्लत हुई थी उस घटना के बाद भी मरने वाले बच्चों की संख्या सैकड़ा पार कर चुकी है. ऑक्सीजन आ जाने के बाद भी इतने बच्चे क्यों मर रहे हैं?

इस पर तमाम विचार परोसे जा रहे हैं. आपको यह जानकार हैरानी होगी कि मरने वाले अधिकतर बच्चे किसी बड़े बीमारी से ग्रसित नहीं थे. बड़ी बिमारी से तात्पर्य दिमागी बुख़ार इत्यादि जो गोरखपुर अस्पताल का जिक्र आते ही सबके दिमाग में आ जाता है. जैसे अगस्त 11-12 को मरने वाले अधिकतर बच्चे या तो मामूली इन्फेक्शन से प्रभावित थे या समय से पहले पैदा हो गए थे. इन बच्चों को अगर सही समय पर सटीक इलाज मिला होता तो इन्हें आइसीयु में भर्ती होने की नौबत ही नहीं आती. ऐसा नहीं हुआ और इन मासूमों को आइसीयु में भर्ती कराना पड़ा जहां ऑक्सीजन की कमी पड़ी और ये बच्चे इस नए भारत में मामूली बिमारी की वजह से अपनी जान गँवा बैठे.

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा हैं? इसको समझने के लिए आपको गोरखपुर के  मेडिकल कालेज में हुए हादसे को ऐसे देखना होगा जैसे यह घटना हूइ ही इसलिए ताकि आपकी नज़र एक साज़िश पर जाए जो अगर ऐसे ही चलती रही तो आने वाले समय में और बड़े हादसे होंगे. साथ में यह भी बताते चलें कि इस अस्पताल में अगस्त के महीने में औसतन 20 बच्चे रोज मरते हैं. यह सिलसिला पिछले कई सालों से चल रहा है.

अस्पताल के नाम पर बच्चों के इस कब्रगाह के आंकड़े डराते हैं. देखिये, इस साल के जुलाई तक इस अस्पताल के पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट में कुल 3,878 बच्चे भर्ती हुए जिनमे से 596 को अपनी जान गंवानी पड़ी. इस अस्पताल के निओनेटल (नवजात शिशु) इंटेंसिव केयर यूनिट में तो और भयानक स्थिति उभर कर सामने आती है. यहाँ कुल 2,386 बच्चे भर्ती हुए जिसमे डॉक्टर और नर्स के सामने 931 बच्चे मर गए.

ऐसी डरावनी स्थिति क्यों?

इसको समझने के लिए पहले ये समझिये कि यह वही अस्पताल है जहां पीक सीजन (जुलाई से अक्टूबर तक) में एक एक विस्तर पर करीब चार-चार बच्चे देखे जाते हैं. ये बच्चे कहाँ से आते हैं? मालूम होना चाहिए कि इस मेडिकल कॉलेज में आसपास के करीब 17 जिलों से बच्चे मामूली बीमारीयों के इलाज के लिए आते हैं. ये जिले अपने यहाँ पैदा हो रहे बच्चों की मामूली से मामूली बीमारी जैसे इन्फेक्शन वगैरह भी ठीक नहीं कर पा रहे. और यह कहानी सिर्फ इन पूर्वांचल के जिलों की ही नहीं हैं बल्कि पूरा प्रदेश एक बहुत बड़े छल का शिकार हुआ है.

पूरे उत्तर प्रदेश में मर रहे हैं बच्चे

याद रहे कि उत्तर प्रदेश नवजात शिशु मृत्यु दर में देश के सबसे खराब राज्यों में एक है. अभी वर्ष 2015-16 में आये राष्ट्रीय परिवार स्वस्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक इस राज्य में अगर 1000 बच्चे जन्म लेते हैं तो उनमें से 78 को बच्चों को मजबूरन मरना पड़ता है. इस समय हमारे देश का नवजात शिशु मृत्यु दर महज 41 है.

ऐसा इसलिए है कि इस राज्य के साथ इसके शासक पिछले 15-20 सालों से छल किये जा रहे हैं. पिछले 15 सालों में जहां राज्य की जनसँख्या में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है वहीँ सरकारी अस्पतालों की संख्या 8 प्रतिशत घटी है.

वर्ष 2017 में आये टाटा ट्रस्ट एंड पूअरेस्ट एरियाज सिविल सोसाइटी (पीएसीएस) प्रोग्राम की एक रिपोर्ट के अनुसार अनुसार, प्रदेश में महिलाओं और बच्चों से सम्बंधित स्वास्थय सुरक्षा की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है.

सार्वजनिक स्वास्थय सुविधाओं के हिसाब से नागरिकों का पहला संपर्क केंद्र उपकेंद्र या कहें सबसेंटर होते हैं. लेकिन पिछले 25 सालों में इसमें महज दो प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि राज्य की जनसँख्या इस दरम्यान करीब 51 प्रतिशत बढ़ी.

ग्रामीण स्वास्थय सांख्यिकी 2015 के हिसाब से 20 करोड़ से ऊपर आबादी वाले इस राज्य में करीब 31,037 उपकेन्द्र, 5,172 प्राथमिक स्वास्थय केंद्र और  1,293 सामुदायिक स्वास्थय केंद्र की जरुरत है. लेकिन राज्य में 33 प्रतिशत उपकेंद्रों और प्राथमिक स्वास्थय केंद्र की कमी है. इसी तरह सामुदायिक स्वास्थय केन्द्रों में भी 40 प्रतिशत की कमी है.

विश्व स्वास्थय संगठन (WHO) के मुताबिक प्रति हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए जबकि इस राज्य में प्रत्येक डॉक्टर पर 500 लोगों का अतिरिक्त बोझ है.

ऐसा इसलिए हुआ है कि पिछले पंद्रह सालों में राज्य में सार्वजनिक स्वास्थय सेवाओं का लगभग कोई विस्तार नहीं हुआ है. मालूम होना चाहिए कि राज्य की 85 प्रतिशत स्वास्थ्य जरुरतें निजी क्षेत्र से पूरी होती हैं. यह बताने की जरुरत नहीं होगी कि निजी अस्पतालों में इलाज कराना ग्रामीण और गरीब जनता पर कितना भारी पड़ता है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश के ह्रदय प्रदेश कहे जाने वाले इस राज्य में लोगों पर उप केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज कराने का खर्चा देश के औसत इलाज के खर्चे का दोगुना होता है. जहाँ देश का औसत खर्च है 312 रुपये, वहीं उत्तर प्रदेश में यह खर्चा जहां 660 रूपया है .

पीएसीएस प्रोग्राम की वही रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश में पैदा हुए एक बच्चे के पडोसी राज्यों जैसे बिहार में पैदा हुए बच्चे से चार साल कम जीने की सम्भावना है. हरियाणा से तुलना करने में यह अंतर पांच साल का हो जाता है. यानि अगर आपका बच्चा उत्तर प्रदेश में पैदा हुआ है तो उसकी आयु हरियाणा में पैदा हुए बच्चे से उसकी आयु औसतन करीब पांच साल कम होगी. हिमाचल से तुलना करने पर यह अंतर बढ़कर सात साल हो जाता है.

पिछले पंद्रह सालों से वही लोग शासन कर रहे थे जो आज राज्य के स्वास्थय मंत्री का इस्तीफ़ा मांग रहे रहें है. इन्होने कमजोर तबके का वोट तो माँगा पर उनके लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार की कि वे गरीब जिन्होंने इनको वोट दिया था, उन्हीं के बच्चे आज मरने के लिए मजबूर हैं.

देखना यह होगा कि वर्तमान शासन जो बड़े-बड़े वादों के साथ आया है क्या कोई परिवर्तन ला पाता है. वैसे इस नए शासन के शुरूआती कदम तो निराश ही करते हैं.

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